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संवाद और संस्कार ही समाज की असली ताकत : मोहन भागवत

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में संघ शताब्दी वर्ष की संगोष्ठी

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कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते संघ प्रमुख मोहन भागवत।  -ट्रिन्यू
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सरसंघचालक बोले—संघ को बाहर से नहीं, भीतर के कार्य और पद्धति से समझें

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि संघ को सही अर्थों में समझने के लिए उसकी कार्य पद्धति को भीतर से जानना आवश्यक है। केवल दूर से देखकर, कल्पना करके या बाहर बनाए गए नैरेटिव के आधार पर संघ की वास्तविकता को नहीं समझा जा सकता। वे शनिवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के श्रीमद्भगवद्गीता सभागार में आयोजित संघ शताब्दी वर्ष की ‘प्रमुख जनगोष्ठी’ को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर प्रदेश के प्रतिष्ठित शिक्षाविद, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी, न्यायाधीश और सामाजिक चिंतक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। मंच पर उत्तर क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल और प्रांत संघचालक प्रताप सिंह भी मौजूद थे। सभागार के बाहर संघ की 100 वर्ष की यात्रा पर आधारित एक विशेष प्रदर्शनी और वृत्तचित्र का आयोजन किया गया। इसमें डॉ. हेडगेवार से लेकर वर्तमान तक के विकास क्रम और स्वदेशी जागरण मंच, संस्कार भारती, एबीवीपी व विश्व हिंदू परिषद जैसे आनुषंगिक संगठनों की कार्ययात्रा को दर्शाया गया।

सरसंघचालक ने ‘कुटुंब प्रबोधन’ के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि परिवार में संवाद और मूल्य-निर्माण ही समाज की मजबूत नींव है। उन्होंने कहा कि घरों में मन से मन का संवाद होना चाहिए। बच्चे केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि संस्कारयुक्त वातावरण से सीखते हैं। उन्होंने मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा कि संपत्ति में तो सभी साथ खड़े हो जाते हैं, लेकिन विपत्ति में साथ देने की सीख परिवार से ही मिलती है। समाज में ऐसा माहौल बनाना जरूरी है जहां आत्मीयता और जिम्मेदारी के भाव सहज रूप से विकसित हों। मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि एक लाख से अधिक सेवा कार्यों के बावजूद संघ केवल एक सेवा संगठन नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ सत्ता प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि समाज के संगठन के लिए कार्य करता है। संघ किसी प्रतिस्पर्धा या प्रतिक्रिया से नहीं, बल्कि विचार और मूल्य आधारित पद्धति से चलता है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उनका स्वाभिमान और राष्ट्रभाव ही संघ का आधार है। संघ कागजों में नहीं, लोगों के दिलों में बसता है।

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नागरिकों का चरित्र ही राष्ट्र की शक्ति : ले. जनरल जायसवाल

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कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) बीएस जायसवाल ने कहा कि राष्ट्र की असली शक्ति सेना या उद्योग से नहीं, बल्कि नागरिकों के चरित्र, अनुशासन और नैतिकता से तय होती है। उन्होंने विभाजन, 1962 के युद्ध और कारगिल संघर्ष के दौरान संघ स्वयंसेवकों की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय सेना की तरह संघ में भी अनुशासन और राष्ट्रभक्ति सर्वोपरि है।

 

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