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विभाजन से पूर्व 'कटासराज धाम' में लगता था बैसाखी का ऐतिहासिक मेला

चकवाल (पाकिस्तान) में स्थित है महाभारत कालीन तीर्थ, बंटवार से प्रभावित हुई उत्सवों की परंपरा

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पाकिस्तान में स्थित ऐतिहासिक कटासराज धाम।
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बैसाखी के पावन पर्व की पूर्व संध्या पर केंद्रीय सनातन धर्म सभा उत्तरी भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं कटासराज यात्रा के संयोजक शिव प्रताप बजाज ने देश विभाजन से जुड़ी यादों और धार्मिक परंपराओं को साझा किया। उन्होंने बताया कि 1947 से पूर्व बैसाखी का पर्व न केवल भारत, बल्कि वर्तमान पाकिस्तान के क्षेत्रों में भी पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता था। शिव प्रताप बजाज ने बताया कि विभाजन से पहले पाकिस्तान के चकवाल जिले में स्थित महाभारत कालीन ऐतिहासिक तीर्थस्थान कटासराज धाम का बैसाखी मेला पूरे उत्तरी भारत में विख्यात था। इस मेले में केवल पंजाब के ही नहीं, बल्कि उत्तरी भारत के सभी प्रांतों से श्रद्धालु भारी संख्या में पहुंचते थे। मेले से एक सप्ताह पूर्व ही वहां चहल-पहल शुरू हो जाती थी। विभिन्न अखाड़ों के साधु-महात्मा, संन्यासी और नागा समाज इस तीर्थ स्थान पर जुटते थे। बजाज ने अफसोस जताते हुए कहा कि बंटवारे के बाद भाईचारे और एकता का प्रतीक यह पर्व बुरी तरह प्रभावित हुआ। टीला गुरु गोरखनाथ, सादबेला और सहादूनी दरबार जैसे दर्जनों धर्म स्थानों पर लगने वाले मेलों व उत्सवों को विभाजन के बाद की नई व्यवस्थाओं ने सीमित या बंद कर दिया।

उन्होंने कहा कि कटासराज धाम का संबंध पांडवों के वनवास काल से भी जोड़ा जाता है। आज वहां वह पुरानी रौनक और चहल-पहल नजर नहीं आती। उन्होंने कहा कि बैसाखी का त्यौहार हम सबको मिलकर मनाना चाहिए। यह केवल फसल कटाई का उत्सव नहीं, बल्कि हमारी गौरवशाली विरासत का प्रतीक है। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों को इस दिन के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के बारे में जरूर बताएं, ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहें।

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