आजादी के 7 दशक तक तिरंगे से दूर रहे रोहणात के लोग 5वीं बार मनाएंगे जश्न : The Dainik Tribune

आजादी के 7 दशक तक तिरंगे से दूर रहे रोहणात के लोग 5वीं बार मनाएंगे जश्न

अंग्रेजों के जुल्म के गवाह गांव को आजादी के बाद भी नहीं मिला न्याय, विरोध में नहीं फहराया तिरंगा, सीएम मनोहरलाल ने 23 मार्च 2018 को किया था पहली बार ध्वजारोहण

आजादी के 7 दशक तक तिरंगे से दूर रहे रोहणात के लोग 5वीं बार मनाएंगे जश्न

भिवानी के गांव रोहनात का ऐतिहासिक पेड़ व तालाब। -हप्र

अजय मल्होत्रा/हप्र

भिवानी, 12 अगस्त

जहां एक ओर पूरा देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है, वहीं जिले के गांव रोहनात के लोग आजादी की 5वीं वर्षगांठ मनायेंगे। आजाद भारत के इतिहास में पांचवीं बार गांव रोहणात के लोगों ने स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण कर जश्न मनाने का फैसला लिया है। दरअसल, यह वो गांव है जिसने आजादी की पहली लड़ाई यानी 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में सबसे ज्यादा कुर्बानियों के बदले वो सब खोया जो शायद किसी गांव या कस्बे ने नहीं खोया होगा। राहत की बात ये रही कि इस गांव ने सरकार के आश्वासन के बाद खुद को गुलामी की मानसिकता से निकाल कर आजाद लोगों की श्रेणी में खड़ा करते हुए स्वतंत्रता दिवस मनाने का फैसला किया है।

बता दें कि देश की आजादी के लिए पहली बड़ी लड़ाई 1857 में लड़ी गई। इसे 1857 की क्रांति का नाम दिया गया। पूरे देश के लोगों के साथ इस क्रांति में भिवानी जिले के रोहणात गांव के लोगों का भी अहम योगदान रहा। यहां के लोगों ने आजादी की पहली लड़ाई में सबसे ज्यादा बगावती तेवर अख्तियार कर सबसे ज्यादा कुर्बानी दी थी। इस गांव के वीर जांबाजों ने बहादुरशाह जफर के आदेश पर 29 मई, 1857 के दिन अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी। इस दिन ग्रामीणों ने जेलें तोड़कर कैदियों को आजाद करवाया। 12 अंग्रेजी अफसरों को हिसार व 11 को हांसी में मार गिराया। इससे बौखलाकर अंग्रेजी सेना ने गांव पुठी के पास तोप लगाकर गांव के लोगों को उड़ा दिया। सैकड़ों लोग जलकर मर गए, मगर फिर भी ग्रामीण लड़ते रहे।

अंग्रेजों ने गांव के बच्चों, महिलाओं व अन्य लोगों को फांसी के फंदे पर लटकाया। अंग्रेजों के जुल्मों से तंग महिलाओं ने कुएं में कूदकर जान दे दी थी। गांव में कुएं व पेड़ आज भी अंग्रेजों के अत्याचार के गवाह हैं। अंग्रेजों ने इसके बाद भी अपने जुल्म जारी रखे। इस गांव के लोगों पर अंग्रेजों के अत्याचार की सबसे बड़ी गवाह हांसी की एक सड़क है।

इस सड़क पर बुल्डोजर चलाकर गांव के अनेक क्रांतिकारियों को कुचला गया था जिससे यह रक्त रंजित हो गई थी और इसका नाम लाल सड़क रखा गया था। गांव के लोगों की आंखें उस मंजर को याद कर छलछला उठती हैं। दर्द ये है कि जिस गांव ने देश के लिए इतना कुछ किया उस गांव के लिए सरकारों ने कुछ भी नहीं किया। गांव के हर उम्र तबके के लोगों का कुछ ऐसा ही कहना था। गांव की पूर्व सरपंच नीनू का कहना है कि ग्रामीणों को सीएम मनोहरलाल के आश्वासन पर भरोसा है। गांव की जमीन का मालिकाना हक वापस ग्रामीणों को देने के लिए प्रक्रिया जारी है। जिस दिन यह कार्य पूरा होगा ग्रामीण जोर-शोर से स्वतंत्रता दिवस मनायेंगे। उन्हें उम्मीद है कि मुख्यमंत्री अपने वादे को पूरा करेंगे।

ग्रामीणों के दिल का वह दर्द, जिसने नहीं मनाने दिया स्वतंत्रता दिवस

ग्रामीणों के अनुसार देश की आजादी के आंदोलन में सबसे अधिक योगदान के बावजूद उनके साथ जो हुआ, उसकी कसक आज भी उनके दिल में है। 14 सितंबर, 1857 को अंग्रेजों ने इस गांव को बागी घोषित कर दिया व 13 नवंबर को पूरे गांव की नीलामी के आदेश दे दिए गए। 20 जुलाई, 1858 को गांव की पूरी 20656 बीघे जमीन व मकानों तक को नीलाम कर दिया गया। इस जमीन को पास के पांच गांवों के 61 लोगों ने महज 8 हजार रुपये की बोली में खरीदा। अंग्रेज सरकार ने फिर फरमान भी जारी कर दिया कि भविष्य में इस जमीन को रोहनात के लोगों को न बेचा जाए। हद तब हुई जब करीब 90 साल बाद देश आजाद हुआ। इस गांव के लोगों को धीरे-धीरे लगने लगा कि उनके बुजुर्गों की आजादी के लिए दी गई शहादत बेकार गई क्योंकि उन्हें आजादी के बाद भी अपनी पुश्तैनी जमीन नहीं मिली। इसको लेकर इस गांव में आजादी के बाद कभी भी राष्ट्र ध्वज नहीं फहराया गया। ये लोग आज 70 से भी अधिक सालों तक अपने आप को आजाद देश का गुलाम समझते रहे। जैसे-तैसे रिश्तेदारों व अन्य लोगों की बदौलत उन्होंने गुजारे लायक जमीन ली पर गुलामी का दंश सात दशक तक झेलते रहे। सरकारें आई व गई, मगर रोहनातवासियों के दर्द को किसी ने नहीं महसूस किया। इन लोगों के दिलों में एक कसक रही कि आखिर उनके पुरखों ने अपना सब कुछ देश की आजादी के लिए न्यौछावर कर दिया था, फिर भी उन्हें उनकी पुश्तैनी जमीन तक औने-पौने दाम देकर दोबारा खरीदनी पड़ रही है। इसके बाद मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने 23 मार्च 2018 को गांव में आकर पहली बार ध्वजारोहण कर लोगों को भी ध्वजारोहण के लिए प्रेरित किया था और उनका हक उन्हें दिलवाने का भरोसा दिया था। इसके बाद लोगों ने खुद भी पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाया था। गांव के लिए सीएम ने अनेक घोषणाएं की थी। अब उन घोषणाओं में से कई पूरी हो चुकी हैं तो कई बाकी हैं। गांव की वेबसाइट बनाई गई है और गांव के इतिहास को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।

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