हिरासत में मौत पर सरकार देगी 7.5 लाख, दोषी पुलिसकर्मी से वसूलेगी आधा मुआवजा
Haryana News: नायब कैबिनेट के फैसले के बाद गृह विभाग ने जारी की गजट अधिसूचना
Haryana News: हरियाणा में पुलिस हिरासत में मौत होने पर अब पीड़ित परिवार को मुआवजे के लिए अलग-अलग स्तरों पर भटकना नहीं पड़ेगा। नायब सिंह सैनी मंत्रिमंडल के हालिया फैसले के बाद गृह विभाग ने पुलिस हिरासत में मृत्यु पर 7.5 लाख रुपये मुआवजे की नीति को गजट नोटिफिकेशन के जरिये लागू कर दिया है।
नीति का सबसे अहम पहलू यह है कि यदि हिरासत में मौत पुलिस की यातना या मारपीट से हुई तो सरकार द्वारा दिए जाने वाले मुआवजे की कम से कम 50 प्रतिशत राशि दोषी पुलिस अधिकारी या कर्मचारी के वेतन से वसूली जाएगी। यानी अब हिरासत में मौत के मामले में सरकार की ओर से पीड़ित परिवार को राहत के साथ दोषी पुलिसकर्मी की व्यक्तिगत आर्थिक जवाबदेही भी तय होगी।
चार परिस्थितियों में मिलेगा 7.5 लाख
नई नीति के तहत पुलिस हिरासत में मौत होने पर मृतक के कानूनी उत्तराधिकारी अथवा निकटतम परिजन को 7.5 लाख रुपये दिए जाएंगे। इसमें पुलिस कर्मचारियों की यातना या मारपीट से मौत के अलावा हिरासत में बंदियों के आपसी झगड़े, आत्महत्या तथा पुलिसकर्मियों या मेडिकल स्टाफ की लापरवाही से हुई मौत भी शामिल है। लापरवाही के मामले में मजिस्ट्रियल जांच में इसकी पुष्टि जरूरी होगी। हालांकि प्राकृतिक बीमारी से मौत, हिरासत से भागने के प्रयास के दौरान मृत्यु और प्राकृतिक आपदा से हुई मौत को मुआवजे के दायरे से बाहर रखा गया है।
आयोग के एक मामले के बाद बढ़ा दबाव
नीति के पीछे हरियाणा राज्य मानवाधिकार आयोग में चली एक शिकायत भी अहम कड़ी रही। शिकायत संख्या 1232/14/2025 में पिंजौर निवासी परवेश शर्मा ने आरोप लगाया था कि कालका अदालत से नियमित जमानत मिलने के बावजूद उन्हें 15 जुलाई, 2025 को कथित रूप से अवैध हिरासत में रखा गया और थाने में मारपीट व थर्ड डिग्री टॉर्चर किया गया। मामले की सुनवाई आयोग के सदस्य दीप भाटिया ने की। गृह विभाग द्वारा मुआवजा देने से इनकार और संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई को आयोग ने अपर्याप्त माना। आयोग ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 18 के तहत उपलब्ध राहत के प्रावधानों का हवाला देते हुए प्रभावी मुआवजे और जवाबदेही की जरूरत पर जोर दिया।
अब मुआवजे की व्यवस्था संस्थागत
मंत्रिमंडल के फैसले के बाद गृह विभाग की अधिसूचना ने हिरासत में अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों में मुआवजे का एक स्पष्ट ढांचा तय कर दिया है। आयोग सदस्य दीप भाटिया ने सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि स्पष्ट नीति से पीड़ित परिवारों को राहत देने और हिरासत में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में जवाबदेही तय करने का रास्ता मजबूत हुआ है। नई व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि हिरासत में मौत पर राहत केवल सरकारी खजाने से नहीं जाएगी; यातना या मारपीट साबित होने पर दोषी पुलिसकर्मी को भी उसकी आर्थिक कीमत चुकानी होगी।

