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National Voluntary Blood Donation Day: सेब-केले के लालच में पहली बार दिया खून, अब 110 बार रक्तदान कर चुके हैं डॉ. नवीन नागपाल

राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस पर विशेष, हरियाणा के सरकारी शिक्षक की मुहिम से 700 से अधिक युवा बने नियमित रक्तदानी; मां की जिंदगी बचाने वाले अजनबी रक्तदाता से मिली प्रेरणा

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National Voluntary Blood Donation Day: बचपन में रक्तदान के बदले सेब और केले खाने की ललक में कभी 118 किलो वजन वाले ‘मोटू’ कहलाने वाले नवीन नागपाल आज 110 बार रक्तदान करने वाले रक्तदानियों में शुमार हैं। पेशे से हरियाणा में सरकारी अध्यापक इस शख्स ने रक्तदान के जरिए क्षेत्र में अलग पहचान बनाई है। उनकी प्रेरणा से अब तक 700 से अधिक युवा नियमित रक्तदानी बन चुके हैं।

डॉ नवीन नागपाल के प्रेरणादायक सफर का अपना एक दिलचस्प इतिहास है। कभी रक्तदान से रोकने पर वे अपनी ही दादी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने पुलिस थाने तक पहुंच गए थे।

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नवीन नागपाल के रक्तदान के संकल्प के पीछे मां से जुड़ी भावुक घटना है। बचपन में शरारत करने पर मां राजरानी अक्सर कहती थीं, “तू जिंदा बच गया, इसलिए आज हमें तंग करता है।”

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बड़े होने पर नवीन ने मां से इसका कारण पूछा। तब मां ने बताया कि 30 अप्रैल 1973 को फिरोजपुर के मिशन अस्पताल में सिजेरियन ऑपरेशन से उनके जन्म के समय दोनों की हालत गंभीर थी और खून की सख्त जरूरत थी। किसी अजनबी रक्तदाता ने रक्तदान कर दोनों की जान बचाई थी।

मां ने बेटे से वचन लिया कि जब भी किसी जरूरतमंद को खून की जरूरत पड़े, पीछे नहीं हटना। मां के इसी वचन ने उन्हें रक्तदान के रास्ते पर ला दिया। उनका नाम ‘नेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में दर्ज है। दो मानद डॉक्टरेट सहित उन्हें राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सम्मान मिल चुके हैं।

नवीन बताते हैं कि युवावस्था में उनका वजन 118 किलो हुआ करता था और लोग उन्हें ‘मोटू’ कहकर पुकारते थे। पहली बार रक्तदान शिविर में वे दोस्तों के बताए इस लालच में पहुंचे कि वहां सेब, केले और बर्फी मिलेगी। पहली बार खून देने के बाद पता चला कि उनके दिए रक्त से एक प्रसूता और उसके नवजात बच्चे की जान बच गई। इसके बाद रक्तदान उनका संकल्प बन गया।

नवीन नागपाल का मानना है कि रक्तदान किसी कारखाने में नहीं बनता, बल्कि एक इंसान ही दूसरे की जान बचा सकता है।

रक्तदान जारी रखने के लिए उन्होंने अपनी जीवनशैली बदली। पिछले 30 साल से उन्होंने कोल्ड ड्रिंक, बाजार की मिठाई और तला-भुना खाना नहीं खाया। मीठे के नाम पर रविवार को घर की पारंपरिक देसी ‘मीठी चूरी’ खाते हैं। नियमित मॉर्निंग वॉक, कसरत और संतुलित आहार के जरिए उन्होंने फिटनेस बनाए रखी है।

नवीन युवावस्था में भारतीय सेना में भर्ती होकर देशसेवा करना चाहते थे, लेकिन सपना पूरा नहीं हुआ। अब उन्होंने मरणोपरांत संपूर्ण अंगदान की शपथ लेकर ‘ऑर्गन इंडिया’ में पंजीकरण करवाया है। उनका कहना है कि मृत्यु के बाद वे अपने अंग भारतीय सेना के जवानों के लिए दान करना चाहते हैं। डॉ. नवीन नागपाल 65 वर्ष की उम्र तक कम से कम 151 बार रक्तदान करने का संकल्प रखते हैं।

जब दादी के खिलाफ एफआईआर करवाने थाने पहुंच गए

उस दौर में रक्तदान को लेकर भ्रांतियां थीं कि रक्तदान से कमजोरी आती है और इंसान बीमार पड़ जाता है। 11-12 बार रक्तदान करने के बाद किसी ने उनके पिता से शिकायत कर दी कि लड़के को रोको, नहीं तो वह बीमार हो जाएगा।

एक दिन नवीन किसी मरीज के लिए रक्तदान करने घर से निकल रहे थे तो उनकी दादी मुख्य दरवाजे पर खड़ी हो गईं और चौखट बंद कर दी। उन्होंने कहा, “तुझे बाहर नहीं जाने दूंगी।”

नवीन सीधे थाने पहुंच गए और बोले, “मेरी दादी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करो। उन्होंने मुझे रक्तदान करने से रोका है। अगर मेरे न जाने से अस्पताल में उस मरीज की जान चली गई तो उसकी मौत का जिम्मेदार कौन होगा?” थानेदार ने इसे पारिवारिक मामला बताते हुए उन्हें शांत करवाया।

तीन महीने में बढ़ जाता है बाइक पर डिजिट

नवीन नागपाल ने अपनी मोटरसाइकिल पर ‘रक्तदान पूजा के समान’ लिखवा रखा है। हर तीन माह बाद रक्तदान करने पर बाइक पर लिखे रक्तदान के डिजिट में एक नंबर बढ़ जाता है।

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