Haryana News : सीएम के फैसलों का अब होगा डिजिटल हिसाब... काम अटका तो पोर्टल पर ‘ओवरड्यू’, देरी का कारण और नई समय-सीमा बतानी होगी
अफसर, डेडलाइन और नतीजा तय... बैठक में लिया हर फैसला बनेगा स्पष्ट एक्शन प्वाइंट, जिम्मेदार विभाग और अधिकारी का नाम होगा दर्ज
Haryana News : मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में बैठक में फैसला हुआ तो अब उसके बाद उसकी जिम्मेदारी फाइलों में गुम नहीं होगी। हरियाणा सरकार ने मुख्यमंत्री के फैसलों को अमल तक पहुंचाने के लिए ऐसा निगरानी तंत्र लागू किया है, जिसमें हर निर्णय के साथ जिम्मेदार विभाग-अधिकारी, समय-सीमा और अपेक्षित परिणाम दर्ज होगा। काम तय समय में पूरा नहीं हुआ तो उसकी स्थिति सीएम मीटिंग मॉनिटरिंग पोर्टल पर ‘ओवरड्यू’ दिखाई देगी। संबंधित विभाग को देरी का कारण, अब तक की प्रगति और नई समय-सीमा भी बतानी होगी।
मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी की ओर से जारी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) में मुख्यमंत्री की बैठकों के बाद की पूरी प्रक्रिया को समयबद्ध किया गया है। बैठक की मिनट्स ऑफ मीटिंग (एमओएम) तीन कार्य दिवसों में तैयार करनी होगी और अनुमोदित एमओएम के एक्शन प्वाइंट दो कार्य दिवसों में पोर्टल पर अपलोड करने होंगे। हर विभाग को 15 सितंबर तक वरिष्ठ नोडल अधिकारी नियुक्त करना होगा, जो अपने विभाग से जुड़े सभी फैसलों की अनुपालन रिपोर्ट और पोर्टल अपडेट का जिम्मेदार होगा।
फैसला हुआ तो यह भी तय होगा कि करना किसे है
नई व्यवस्था में बैठक में हुई चर्चा और लिए गए अंतिम फैसले को अलग-अलग दर्ज किया जाएगा। जिस निर्णय पर अंतिम सहमति नहीं बनी, उसे निर्णय के रूप में दर्ज नहीं किया जाएगा। ऐसे मामलों को ‘डिसीजन पेंडिंग’ या ‘फॉर फर्दर एग्जामिनेशन’ के रूप में चिह्नित किया जाएगा। जो फैसला लिया गया है, उसे स्पष्ट और मापनीय एक्शन प्वाइंट में बदला जाएगा। इसके साथ संबंधित विभाग या अधिकारी, पूरा करने की समय-सीमा और अपेक्षित परिणाम दर्ज होगा। यदि किसी फैसले में कई विभाग शामिल हैं तो एक विभाग या एजेंसी को लीड डिपार्टमेंट बनाया जाएगा और बाकी विभागों की भूमिका भी स्पष्ट की जाएगी। इससे समीक्षा के दौरान यह सवाल सीधे सामने रहेगा कि फैसला किसने लागू करना था, कब तक करना था और उसका परिणाम क्या निकला।
‘काम चल रहा है’ की जगह अब पांच स्टेटस
पोर्टल पर किसी निर्णय की प्रगति को मनमाने ढंग से बताने की गुंजाइश भी कम की गई है। प्रत्येक एक्शन प्वाइंट को पांच श्रेणियों में दर्ज करना होगा। इनमें कम्प्लीटेड, इन प्रोग्रेस, ओवरड्यू, नॉट स्टार्टेड तथा नॉट फिजिबल/इश्यू रिक्वायरिंग डिसीजन शामिल हैं। इसका सीधा मतलब है कि तय समय बीतने के बाद भी काम पूरा नहीं हुआ तो उसकी स्थिति छिपी नहीं रहेगी। वह ‘ओवरड्यू’ के रूप में सामने आएगा। वहीं काम शुरू न होने की स्थिति ‘नॉट स्टार्टेड’ और किसी नीतिगत, वित्तीय या प्रशासनिक अड़चन वाले मामले को अलग श्रेणी में दिखाना होगा।
काम पूरा बताया तो उसका आधार भी देना होगा
सरकार ने केवल ऑनलाइन स्टेटस अपडेट को पर्याप्त नहीं माना है। जहां संभव हो, किसी फैसले को पूरा बताते समय सरकारी आदेश, स्वीकृति, प्रगति रिपोर्ट, पोर्टल रिपोर्ट, फोटो, आंकड़े या अन्य दस्तावेजी प्रमाण भी उपलब्ध कराने होंगे। इससे समीक्षा में ‘काम पूरा हो गया’ का दावा केवल रिपोर्ट पर आधारित नहीं रहेगा। उपलब्ध प्रमाण के आधार पर यह देखा जा सकेगा कि मुख्यमंत्री के निर्देश के अनुरूप वास्तविक कार्रवाई हुई या नहीं।
एक माह बाद पहली परीक्षा, फिर हर महीने हिसाब
एमओएम जारी होने के एक माह के भीतर पहली अनुपालन रिपोर्ट (एटीआर) देनी होगी। यदि निर्धारित अवधि में काम पूरा नहीं हुआ तो अगली एटीआर में केवल ‘काम जारी है’ लिखना पर्याप्त नहीं होगा। अब तक क्या किया, कितना काम बाकी है, देरी क्यों हुई, मौजूदा स्थिति क्या है, नई समय-सीमा क्या है और सरकार से किस सहयोग या निर्णय की जरूरत है, इन सभी बिंदुओं का उल्लेख करना होगा। लंबित मामलों की इसके बाद हर माह समीक्षा होगी। लगातार देरी होने पर संबंधित प्रशासकीय सचिव या विभागाध्यक्ष को कारणों की समीक्षा करनी होगी। जिन मामलों में नीतिगत, वित्तीय या प्रशासनिक निर्णय की जरूरत है, उन्हें सक्षम स्तर पर भेजना होगा। महत्वपूर्ण और समयबद्ध मामलों की संबंधित प्रशासकीय सचिव द्वारा व्यक्तिगत निगरानी भी सुनिश्चित की जाएगी।
अगली सीएम बैठक से पहले पुराने फैसलों का हिसाब
यह व्यवस्था केवल आगे होने वाली बैठकों तक सीमित नहीं रहेगी। जहां तक संभव होगा, पिछली बैठकों के लंबित एक्शन प्वाइंट भी निगरानी में लाए जाएंगे। अगली समीक्षा बैठक से पहले विभागवार लंबित फैसलों की स्थिति तैयार करनी होगी। इसमें केवल कागजी प्रगति नहीं, बल्कि उपलब्धि, बाधा और आगे की कार्ययोजना भी दर्ज होगी। इस तरह मुख्यमंत्री की अगली बैठक में नए मुद्दों के साथ पुराने फैसलों के अमल का भी हिसाब सामने रहेगा।
हर विभाग में होगा ‘फैसलों का जिम्मेदार’ अधिकारी
हर विभाग को एक वरिष्ठ नोडल अधिकारी नियुक्त करना होगा। वह अपने विभाग से जुड़े मुख्यमंत्री की बैठकों के सभी एक्शन प्वाइंट का समन्वय करेगा, संबंधित अधिकारियों से समय पर एटीआर लेगा, उसकी तथ्यात्मक शुद्धता जांचेगा और पोर्टल पर स्थिति अपडेट करवाएगा। विभागों को नोडल अधिकारियों का विवरण 15 सितंबर तक उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसके बाद उन्हें पोर्टल के लिए आवश्यक लॉगिन और एक्सेस दिया जाएगा।
फैसले से अमल तक पूरा रिकॉर्ड
एसओपी में बैठक से जुड़े एजेंडा, बैकग्राउंड नोट, एमओएम, एटीआर और अन्य संबंधित अभिलेखों के सुरक्षित दस्तावेजीकरण की व्यवस्था भी की गई है। यानी किसी फैसले की पृष्ठभूमि से लेकर उसके क्रियान्वयन तक रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा। नई व्यवस्था का मकसद मुख्यमंत्री की बैठकों को केवल फैसला लेने का मंच नहीं, बल्कि फैसले के अमल की जवाबदेही तय करने वाला तंत्र बनाना है। अब बैठक के बाद सबसे अहम सवाल यही होगा, किसे करना है, कब तक करना है और हुआ कितना।

