स्याही से क्रॉस वोटिंग तक 2016 से 2026... अब 2028 की असली जंग!
2029 के लोकसभा-विधानसभा चुनावों से पहले बड़ी परीक्षा, कांग्रेस के सामने चुनौती भी बड़ी
हरियाणा की सियासत में राज्यसभा चुनाव सिर्फ सीट जीतने का खेल नहीं, बल्कि अंदरूनी ताकत और कमजोरी का आईना बन चुका है। 2016 का स्याही कांड, 2022 की क्रॉस वोटिंग और अब 2026 में मतों का रद्द होना तीनों घटनाएं एक ही कहानी कहती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि हर बार स्क्रिप्ट बदलती है, लेकिन नतीजा वही रहता है। कांग्रेस अपने ही खेल में उलझ जाती है और भाजपा धीरे-धीरे बढ़त बना लेती है।
अब नजरें 2028 पर हैं, जहां असली हिसाब होना है। यह मुकाबला सिर्फ दो राज्यसभा सीटों तक सीमित नहीं रहेगा। इसकी गूंज सीधे 2029 के लोकसभा और हरियाणा विधानसभा चुनावों तक जाएगी। यानी यह चुनाव सिर्फ प्रतिनिधित्व का नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत की अगली पारी का ट्रेलर साबित होगा।
2016 से 2024: अपनों ने ही बिगाड़ा कांग्रेस का खेल
पिछले एक दशक का ट्रेंड साफ बताता है कि हर बार कांग्रेस के पास संख्या होने के बावजूद अंतिम क्षणों में खेल बिगड़ता है। 2016 के राज्यसभा चुनाव में ‘स्याही कांड’ (पेन बदलने का विवाद) के कारण कांग्रेस के 14 विधायकों के वोट रद्द हो गए और भाजपा समर्थित सुभाष चंद्रा जीत गए। छह साल बाद 2022 में भी यही इतिहास दोहराया गया। भाजपा-जजपा समर्थित निर्दलीय कार्तिकेय शर्मा ने कांग्रेस के अजय माकन को हरा दिया, जो कांग्रेस के भीतर हुई क्रॉस वोटिंग का ही नतीजा था। उसी चुनाव में भाजपा ने कृष्ण लाल पंवार को राज्यसभा भेजा। अक्तूबर 2024 में पंवार के इस्तीफे के बाद हुए उपचुनाव में भाजपा ने रणनीति के तहत रेखा शर्मा को राज्यसभा भेजकर अपनी रणनीतिक पकड़ और मजबूत कर ली।
2026 की जीत में छिपी दरारें और 2028 का दांव
ताजा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार कर्मवीर सिंह बौद्ध जीत जरूर गए, लेकिन यह जीत पार्टी की अंदरूनी कमजोरी को उजागर कर गई। चार वोट रद्द हुए, पांच विधायकों पर क्रॉस वोटिंग के आरोप लगे और आखिरी वक्त तक सस्पेंस बना रहा। दूसरी ओर, भाजपा समर्थित निर्दलीय सतीश नांदल हार के बावजूद मुकाबले को कड़ा बनाकर भाजपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त दिला गए। अब नजरें 2028 पर हैं। पहली अगस्त 2028 को कार्तिकेय शर्मा और रेखा शर्मा का कार्यकाल पूरा होगा। जुलाई में दोनों सीटों पर चुनाव होने तय हैं।
कांग्रेस की असली चुनौती अपना ही संगठन
संख्याबल के हिसाब से फिलहाल एक सीट कांग्रेस और एक भाजपा के खाते में जाती दिखती है, लेकिन असली सवाल यही है कि क्या कांग्रेस अपना ‘घर’ संभाल पाएगी? इस बार पांच विधायकों को नोटिस दिया गया है। कई विधायक खुलकर बयान दे रहे हैं और नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं। कांग्रेस के सामने दुविधा है कि वह सख्त कार्रवाई करे या संख्या बचाए। सख्ती से संख्या घट सकती है और नरमी से अनुशासन कमजोर होगा। यही संतुलन 2028 की रणनीति तय करेगा।
भाजपा का साइलेंट एडवांटेज
2016 से लेकर 2026 तक के घटनाक्रम बताते हैं कि भाजपा ने हर बार मौके का फायदा उठाया है। हरियाणा की राजनीति का यह सच अब छिपा नहीं है कि यहां हार विपक्ष नहीं, अपने ही देते हैं और जीत सिर्फ वोटों से नहीं, मैनेजमेंट से तय होती है। अगर यह ट्रेंड जारी रहा, तो 2028 में भाजपा को साफ बढ़त मिल सकती है। अब देखना यह है कि 2028 में कांग्रेस इतिहास बदलेगी या इतिहास उसे बार-बार दोहराता रहेगा।

