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अनिल विज ने उठाया 100-150 साल से रह रहे परिवारों का मुद्दा, मौजूदा कलेक्टर रेट पर शुल्क को बताया अव्यावहारिक

विपुल गोयल के कार्यालय में हाईलेवल बैठक, मुख्य सचिव समेत आला अधिकारियों ने की शर्तों पर चर्चा

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Ambala Freehold Policy : अंबाला छावनी की बहुचर्चित फ्रीहोल्ड नीति को लेकर हरियाणा सरकार के स्तर पर समाधान की कवायद तेज हो गई है। मंगलवार को शहरी स्थानीय निकाय मंत्री विपुल गोयल के कार्यालय में हुई हाईलेवल बैठक में ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने छावनीवासियों की मुश्किलों को प्रमुखता से उठाया। मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी और शहरी स्थानीय निकाय विभाग के आयुक्त एवं सचिव अशोक मीणा समेत वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में फ्रीहोल्ड से जुड़ी शर्तों, कलेक्टर रेट, 25 प्रतिशत अग्रिम भुगतान, पुराने दस्तावेजों और गरीब बस्तियों की वास्तविक स्थिति पर विस्तार से विचार हुआ। हालांकि बैठक में कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ। सरकार अब कानूनी, प्रशासनिक और आर्थिक पहलुओं को खंगालकर जनहित में विकल्प तलाश रही है।

बैठक में सबसे अहम मुद्दा उन परिवारों का रहा, जो अंबाला छावनी में पीढ़ियों से रह रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, विज ने अधिकारियों के समक्ष यह बात प्रमुखता से रखी कि कई परिवारों का छावनी क्षेत्र में 100 से 150 वर्ष पुराना निवास है। ऐसे लोगों से मौजूदा कलेक्टर रेट के आधार पर भारी शुल्क वसूलना व्यावहारिक नहीं होगा। मंथन इस बात पर हुआ कि फ्रीहोल्ड नीति का मकसद वर्षों से रह रहे लोगों को संपत्ति पर अधिकार दिलाना है तो उसकी शर्तें भी ऐसी होनी चाहिए, जिन्हें आम परिवार पूरा कर सके। खासतौर पर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ न पड़े, इस पहलू को महत्वपूर्ण माना गया।

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25 फीसदी भुगतान और दस्तावेजों की शर्त भी घेरे में

बैठक में प्रस्तावित नीति की उन शर्तों पर भी चर्चा हुई, जिनको लेकर छावनीवासियों में पहले से असंतोष है। इनमें कलेक्टर रेट के आधार पर शुल्क, 25 प्रतिशत अग्रिम भुगतान और पुराने दस्तावेज प्रस्तुत करने जैसी शर्तें शामिल हैं। सबसे बड़ी व्यावहारिक दिक्कत उन परिवारों के सामने है, जिनके पास दशकों या एक सदी से भी पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। सरकार के स्तर पर यह विचार किया जा रहा है कि ऐसी परिस्थितियों में वैकल्पिक प्रमाणों और सरल प्रक्रिया के जरिए वास्तविक कब्जाधारियों को राहत कैसे दी जा सकती है।

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पहली बैठक में फैसला नहीं, विकल्प तलाशने के निर्देश

बैठक देर शाम तक चली, लेकिन इसके बाद कोई औपचारिक निर्णय सार्वजनिक नहीं किया गया। सूत्रों के मुताबिक सरकार जल्दबाजी में नीति को अंतिम रूप देने के बजाय सभी पहलुओं की पड़ताल करना चाहती है। अधिकारियों को विभिन्न विकल्पों पर काम करने के निर्देश दिए गए हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर कुछ और बैठकें हो सकती हैं। इसके बाद ही फ्रीहोल्ड नीति में बदलाव या नई व्यवस्था को लेकर कोई ठोस प्रस्ताव सामने आएगा।

कैबिनेट में भी उठा था मामला

अंबाला छावनी फ्रीहोल्ड का मुद्दा इससे पहले राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में भी उठ चुका है। विज ने प्रस्तावित शर्तों पर आपत्ति जताते हुए यह तर्क रखा था कि यदि फ्रीहोल्ड के लिए शर्तें इतनी कठिन और महंगी हों कि आम व्यक्ति उन्हें पूरा ही न कर सके तो नीति का उद्देश्य ही कमजोर हो जाएगा। यही वजह है कि अब सरकार के स्तर पर ऐसा रास्ता तलाशने की कोशिश हो रही है, जिससे छावनीवासियों को संपत्ति का अधिकार भी मिले और इसके लिए उन्हें असहनीय आर्थिक बोझ भी न उठाना पड़े।

1977 का समझौता आज भी बनी हुई है बड़ी वजह

अंबाला छावनी की जमीन से जुड़ा विवाद करीब पांच दशक पुरानी व्यवस्था से जुड़ा है। विज के अनुसार, 5 फरवरी 1977 तक पूरा क्षेत्र कैंटोनमेंट बोर्ड के अधीन था। तत्कालीन रक्षा मंत्री बंसीलाल के कार्यकाल में 1,063 एकड़ जमीन को कैंटोनमेंट से अलग कर नगर पालिका को सौंपा गया था। तत्कालीन व्यवस्था के तहत हरियाणा सरकार को भारत सरकार की जमीन का मालिकाना अधिकार मिलना था और इसके बदले सेना को 150 एकड़ जमीन मुफ्त उपलब्ध कराई जानी थी। बाद में सेना को जमीन उपलब्ध कराकर इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। इसके बावजूद कई मामलों में भवनों की रजिस्ट्री होने के बाद भी जमीन का स्वामित्व सरकार के नाम दर्ज रहा। यही स्थिति अब संपत्ति मालिकों के लिए सबसे बड़ी अड़चन बनी हुई है।

बैंक लोन से लेकर विरासत तक, हर जगह अड़चन

जमीन का मालिकाना स्पष्ट नहीं होने से हजारों परिवारों को रोजमर्रा के संपत्ति संबंधी कामों में परेशानी का सामना करना पड़ता है। बैंक से ऋण लेने, भवन का नक्शा पास कराने, संपत्ति के हस्तांतरण, खरीद-फरोख्त और उत्तराधिकार संबंधी मामलों में जमीन के स्पष्ट मालिकाना हक की जरूरत पड़ती है। ऐसे में सरकार की मौजूदा कवायद केवल फ्रीहोल्ड शुल्क तय करने तक सीमित नहीं है। असल चुनौती यह है कि लंबे समय से चली आ रही इस स्वामित्व संबंधी उलझन का ऐसा समाधान निकले, जिससे वर्षों से रह रहे परिवारों को वास्तविक और स्थायी अधिकार मिल सके।

अब अगली बैठकों पर नजर

मंगलवार की बैठक ने फिलहाल कोई अंतिम फैसला भले ही नहीं दिया हो, लेकिन इससे यह साफ है कि अंबाला छावनी फ्रीहोल्ड का मामला सरकार के उच्च स्तर पर सक्रिय रूप से विचाराधीन है। अब अगली बैठकों में तैयार होने वाले विकल्प और संभावित कैबिनेट फैसले पर छावनीवासियों की नजर रहेगी। जनहित को केंद्र में रखकर नीति की शर्तों में बदलाव हुआ तो वर्षों से लंबित यह मामला हजारों परिवारों के लिए बड़ी राहत का रास्ता खोल सकता है।

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