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अब गेहूं की पराली से बनेगा प्राकृतिक फूड इमल्सीफायर

गुजविप्रौवि के वैज्ञानिकों को मिला 35 लाख रुपये का शोध प्रोजेक्ट

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गुजविप्रौवि में शोध परियोजना स्वीकृत होने पर शोध दल को बधाई देते कुलपति प्रो. नरसी राम बिश्नोई। -हप्र
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गेहूं की पराली, जिसे अक्सर खेतों में जलाने से प्रदूषण की गंभीर समस्या पैदा होती है, अब खाद्य उद्योग के लिए उपयोगी प्राकृतिक उत्पाद में बदली जाएगी। गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (गुजविप्रौवि), हिसार के वैज्ञानिकों को गेहूं के भूसे से प्राकृतिक फूड इमल्सीफायर विकसित करने के लिए हरियाणा राज्य विज्ञान, नवाचार एवं प्रौद्योगिकी परिषद (एचएससीएसआईटी) द्वारा 35 लाख रुपये का महत्वपूर्ण शोध प्रोजेक्ट स्वीकृत किया गया है।

'वेलोराइजेशन ऑफ व्हीट स्ट्रॉ फॉर द डेवलपमेंट ऑफ नेचुरल इमल्सीफायर: ए सस्टेनेबल सॉल्यूशन फॉर एग्रो-वेस्ट मैनेजमेंट शीर्षक से संचालित इस परियोजना का नेतृत्व खाद्य प्रौद्योगिकी विभाग के डॉ. उस्मान अली करेंगे। उनके साथ डॉ. सोनिका तथा इंजीनियर अंकुर लूथरा सह-अन्वेषक के रूप में कार्य करेंगे। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नरसी राम बिश्नोई ने शोध दल को बधाई देते हुए कहा कि यह परियोजना कृषि अपशिष्ट प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित होगी। उन्होंने कहा कि गेहूं की पराली जैसे कृषि अवशेषों को मूल्यवान उत्पादों में बदलना न केवल प्रदूषण कम करेगा, बल्कि किसानों के लिए आय के नए अवसर भी सृजित करेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि यह परियोजना हरित प्रौद्योगिकी, खाद्य नवाचार और 'आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूती प्रदान करेगी।

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डॉ. उस्मान अली ने बताया कि भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है, जहां प्रतिवर्ष लगभग 50 करोड़ टन कृषि अवशेष उत्पन्न होता है। इनमें करीब 11 करोड़ टन गेहूं से संबंधित अवशेष शामिल हैं। हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में बड़ी मात्रा में गेहूं का भूसा खेतों में जला दिया जाता है, जिससे वायु प्रदूषण, धुंध, ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और मिट्टी की उर्वरता में कमी जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। परियोजना के अंतर्गत एक जूनियर रिसर्च फेलो (जेआरएफ) का पद भी स्वीकृत किया गया है, जिससे युवा शोधार्थियों को अत्याधुनिक अनुसंधान कार्यों में भाग लेने और शोध कौशल विकसित करने का अवसर मिलेगा। डॉ. उस्मान अली और उनकी टीम ने इस उपलब्धि का श्रेय विश्वविद्यालय प्रशासन, डीन रिसर्च एंड डेवलपमेंट प्रो. नीरज दिलबागी, डीन एफईबीएसटी प्रो. अलका शर्मा तथा खाद्य प्रौद्योगिकी विभाग की अध्यक्षा प्रो. आराधिता बी. रे के सहयोग और मार्गदर्शन को दिया।

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