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स्वदेशी, संस्कृति और परंपरा का अद्भुत संगम बना मेला

39वां सूरजकुण्ड अंतर्राष्ट्रीय आत्मनिर्भर मेला

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सूरजकुंड मेला।
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39वें सूरजकुण्ड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर हस्तशिल्प मेले के दूसरे दिन पहले रविवार को बारिश व ठण्ड के बीच मेले में लोगों का हुजूम उमड़ा। लोगों ने मेले की मुख्य चौपाल पर रंगारंग कार्यक्रमों का आनन्द लिया। वहीं विभिन्न हरियाणा, राजस्थान व अन्य राज्यों के व्यंजनों का लुत्फ उठाया। मेला परिसर में बीन व नगाड़ा आगंतुकों का जोरदार स्वागत कर रही हैं, वहीं मेला परिसर में स्वदेशी उत्पादों की सुगंध, लोक संगीत की गूंज और परंपरा की झलक आगंतुकों को आकर्षित कर रही है। लोकल टू ग्लोबल आत्मनिर्भर भारत की पहचान थीम के साथ स्वदेशी, संस्कृति और परंपरा का अद्भुत संगम के साथ इस मेले का आयोजन किया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय सूरजकुंड आत्मनिर्भर क्राफ्ट मेले में पर्यटक नगाड़ों की थाप एवं बीन की धुन पर झूमने को मजबूर हो रहे हैं। पार्टी के सदस्य नगाड़ा एवं बीन की तान, झांज एवं ढप बजाकर पर्यटकों का मनोरंजन कर रहे हैं। इसमें दो ढोल, झांझ, खंजरी, खड़ताल, चिमटा आदि साज की धुन सुनकर विदेशी मेहमान झूमने लगते हैं व नाचना शुरू कर देते हैं।

तुर्की की कला का जादू : जगमगाते हैंडमेड लैंप और बारीक सिरेमिक बने आकर्षण का केंद्र

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तुर्की के शिल्पकारों ने अपनी पारंपरिक कला और हुनर से पर्यटकों का दिल जीत लिया है। मेले के अंतर्राष्ट्रीय पवेलियन में तुर्की के स्टॉल पर सजे रंग-बिरंगे हैंडमेड मोजेक लैंप और बारीक नक्काशी वाले सिरेमिक उत्पाद मुख्य आकर्षणों में से एक बनकर उभरे हैं। मेले में आने वाले पर्यटक तुर्की की इस कला को करीब से देख सकते हैं और शिल्पकारों से उनके हुनर के बारे में संवाद भी कर रहे हैं। तुर्की से आए शिल्पकार हाकन ने बताया कि ये लैंप पूरी तरह से हाथों से तैयार किए गए हैं, जिनमें छोटे-छोटे रंगीन कांच के टुकड़ों को जोड़कर आकर्षक पैटर्न बनाए जाते हैं। ये लैंप न केवल रोशनी प्रदान करते हैं, बल्कि तुर्की की सदियों पुरानी ओटोमन साम्राज्य की संस्कृति की झलक भी पेश करते हैं। इसके साथ ही तुर्की का प्रसिद्ध सिरेमिक वर्क (मिट्टी के बर्तन और सजावटी सामान) अपनी सूक्ष्म लिखावट और चटख रंगों के लिए जाना जाता है।

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चार पीढ़ियों से मेले में लेकर आ रहे पीतल से बनी मूर्तियां

दिल्ली के प्रख्यात शिल्पकार और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता बालकिशन द्वारा स्टॉल नंबर 142 लगाई गई है। उनकी स्टॉल पर भगवान की अत्यंत सुंदर और सजीव मूर्तियां उपलब्ध हैं, जिनकी कीमत 200 रुपये से लेकर 2 लाख रुपये तक है। वे अपनी पीतल की कलाकृतियों के साथ पर्यटकों के बीच विशेष चर्चा का केंद्र बने हैं।

दिल्ली से आए शिल्पकार बालकिशन ने बताया कि उनका परिवार पिछले चार पीढ़ियों से पीतल की मूर्तियां बनाने का कार्य कर रहा है। वे पिछले 38 वर्षों से निरंतर सूरजकुंड मेले का हिस्सा बन रहे हैं। उनकी मूर्तियों में बारीक नक्काशी और शुद्धता ही उनकी पहचान है, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी किया जा चुका है। उन्होंने बताया कि हमारी मूर्तियों में सिर्फ धातु नहीं, बल्कि हमारी चार पीढ़ियों का अनुभव और श्रद्धा समाहित है। बता दें कि बालकिशन को उनकी इसी असाधारण कला और समर्पण के लिए उन्हें मिनिस्ट्री ऑफ टैक्सटाइल, भारत सरकार द्वारा नेशनल अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

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