यह सिर्फ एक फूड ट्रक नहीं है। यह उन सपनों का पहिया है, जो कक्षा में जन्मे और सड़क पर उतरकर समाज बदलने की कहानी लिखने लगे। रोहतक स्थित महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (एमडीयू) के सेंटर फॉर इनोवेशन, इन्क्यूबेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप (सीआईआईई) से निकला ‘डेफेटेरिया’ आज दक्षिण एशिया का पहला समावेशी फूड ट्रक स्टार्टअप बन चुका है, जहां स्वाद के साथ संवेदनशीलता भी परोसी जाती है।डेफेटेरिया के बाहर भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली के साथ एमडीयू के कुलपति प्रो. राजबीर सिंह। -ट्रिब्यून फोटोइस पहल की परिकल्पना एमडीयू की पूर्व छात्रा और वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी पद्माजय ने की। उनके विचार को जमीन पर उतारने में सहयोग दिया इंस्टीट्यूट ऑफ होटल एंड टूरिज्म मैनेजमेंट के पूर्व छात्र साहिल सहारण और मंदीप फोगाट ने। प्रो़ आशीष दहिया के मार्गदर्शन में यह पहल ‘रीयल लर्निंग - रीयल इम्पैक्ट’ का ऐसा जीवंत उदाहरण बन गई, जिसमें कक्षा में सीखी गई अवधारणाएं सीधे समाज में उतरती हैं।15 अगस्त, 2024 को राष्ट्र को समर्पित ‘डेफेटेरिया’ का उद्देश्य केवल उद्यम खड़ा करना नहीं, बल्कि अवसरों से वंचित वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ना है। यह स्टार्टअप संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों- गरीबी उन्मूलन, भूखमुक्ति, अच्छा स्वास्थ्य, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता और समावेशन से सीधा जुड़ा है। इसकी सफलता की गूंज राष्ट्रीय स्तर पर सुनाई दी।एआईसीटीई (अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद) कनेक्ट ने इसे अपनी प्रेरणादायक कहानियों में स्थान दिया, जबकि इग्नू ने इस पर आधारित केस स्टडी को बी-वॉक (एमएसएमई) पाठ्यक्रम में शामिल किया। एमडीयू ने आगे बढ़ते हुए ‘सर्टिफिकेट कोर्स इन फूड ट्रक ऑपरेशंस’ शुरू किया, जिसे बाद में दिव्यांग पुनर्वास परिषद भारत (आरसीआई) ने ‘इनक्लूसिव फूड ट्रक ऑपरेशंस’ के रूप में मान्यता दी। यह अपने आप में शिक्षा और उद्यमिता के संगम का उदाहरण है।मार्च 2025 में राष्ट्रपति भवन में ‘डेफेटेरिया’ की प्रस्तुति ने इसे राष्ट्रीय पहचान दिलाई। कई प्रतिष्ठित हस्तियों ने इस पहल की सराहना की। इस पूरे समावेशी इकोसिस्टम के पीछे कुलपति प्रो़ राजबीर सिंह का दूरदर्शी नेतृत्व रहा, जिनकी नीतिगत सोच ने विश्वविद्यालय को नवाचार और सामाजिक जिम्मेदारी का केंद्र बनाया। ‘डेफेटेरिया’ यह साबित करता है कि जब शिक्षा संवेदनशीलता से जुड़ती है, तो वह सिर्फ डिग्री नहीं देती। वह दिशा देती है, सम्मान देती है और राष्ट्र निर्माण की नई इबारत लिखती है।फ्रेंचाइजी भी एक सामाजिक संकल्प‘डेफेटेरिया’ को खास बनाती है इसकी फ्रेंचाइजी नीति। संस्थापक पद्माजय ने इसे महज कारोबारी विस्तार का माध्यम नहीं बनने दिया। फ्रेंचाइजी से प्राप्त फीस को व्यक्तिगत लाभ में नहीं, बल्कि इसी सामाजिक मिशन के विस्तार में लगाया जाएगा। यह मॉडल मुनाफे से ज्यादा सामाजिक प्रभाव पर केंद्रित है। सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि हर नये ‘डेफेटेरिया’ में कम से कम 50 प्रतिशत स्टाफ दिव्यांग (डेफ) साथियों का होना अनिवार्य होगा। इसी सोच को संक्षेप में पिरोता है इसका स्लोगन- ‘गुड फूड, ग्रेट कॉज’। यानी यहां हर प्लेट सिर्फ स्वाद नहीं परोसती, बल्कि समान अवसर, सम्मान और समावेशन का संदेश भी देती है।खाने के साथ ‘साइन लैंग्वेज की क्लास’‘डेफेटेरिया’ में सिर्फ स्वाद नहीं परोसा जाता, यहां संवाद की नयी भाषा भी सिखाई जाती है। फूड ट्रक पर आने वाले विद्यार्थी और आम लोग जब अपना ऑर्डर लेते हैं, तो उनकी थाली के साथ एक छोटा-सा पेपर भी तस्तरी में रखा होता है। इस पेपर पर ए से ज़ेड तक इंडियन साइन लैंग्वेज (आईएसएल) के अल्फाबेट्स छपे होते हैं। सर्विस देने वाले स्टाफ की कोशिश रहती है कि यहां आने वाला हर व्यक्ति कम से कम अपना नाम साइन लैंग्वेज में लिखना या दिखाना जरूर सीखकर जाए। कई बार ऑर्डर देने की प्रक्रिया भी इशारों में होती है, जहां ग्राहक और स्टाफ के बीच एक नई समझ बनती है। यह महज सेवा नहीं, बल्कि संवेदना का अभ्यास है।पर्यावरण के प्रति संजीदगीयही नहीं, डेफेटेरिया में इस्तेमाल होने वाले कागज के गिलास, प्लेट और अन्य बर्तनों पर भी इंडियन साइन लैंग्वेज के संकेत छपे होते हैं। इन बर्तनों में प्लास्टिक का जरा भी इस्तेमाल नहीं किया जाता। पूरा मैटेरियल पर्यावरण-अनुकूल है, जिससे न तो प्रदूषण फैलता है और न ही प्रकृति को नुकसान पहुंचता है। यानी यहां हर प्लेट दो संदेश देती है। पहला, समावेशन का और दूसरा, पर्यावरण संरक्षण का। कह सकते हैं कि ‘डेफेटेरिया’ एक साथ तीनों- स्वाद, संवेदना और सतत विकास को एक ही ट्रे में परोसता है। यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों व यहां के स्टॉफ के अलावा शहर के लोग भी अपने बच्चों की बर्थडे पार्टी यहां सेलीब्रेट करने आने लगे हैं।इस तरह बदली सोच और नजरियादिव्यांग पुनर्वास परिषद, भारत की चेयरपर्सन रहीं डॉ़ शरणजीत कौर ने भी समाज की सोच और नजरिया बदलने में बड़ा काम किया। महर्षि दयानंद के डेफेटरिया को उन्होंने सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के तौर पर मान्यता भी दी। कॉलेजों एवं यूनिवर्सिटी में उन्होंने यह बताने, जताने और समझाने की कोशिश की और वे इसमें कामयाब भी रही कि दिव्यांग बच्चों के लिए भी कोर्स शुरू होने चाहिए। उन्हें भी पढ़ने और आगे बढ़ने का अधिकार है। हॉयर एजुकेशन में साइन लैंग्वेज को शामिल करने की उनकी अपील और कोशिशों का असर, अब दिखने लगा है।