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वन्यजीवों की भूख और इंसानों से टकराव

शीतकाल में संघर्ष

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जनवरी की ठिठुरती धुंधभरी रातों में इंसानों के लिए ही नहीं, लगभग दो-तिहाई भारत में जानवरों के लिए भी एक बड़ी चुनौती होती है। यही कारण है कि भारत में जनवरी के महीने में वन्यजीव-मानव संघर्ष बाकी किसी भी दूसरे महीने से ज्यादा तेज़ हो जाता है। खेतों में हाथियों के झुंड घुस आते हैं, कस्बों और महानगरों तक में तेंदुए दिखने लगते हैं, और पहाड़ी इलाकों में भालू व जंगली सुअर इंसानी बस्तियों के आसपास चक्कर काटते हैं। सवाल है, क्यों?

टूट जाता है भोजन चक्र

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बरसात और शुरुआती सर्दियों में घास, फल, कंद और छोटे जीव प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। लेकिन दिसंबर के मध्य तक आते-आते जब ठंड बहुत ज्यादा बढ़ने लगती है और जनवरी में तो बर्फबारी और ओले गिरने लगते हैं, तब जानवरों के लिए जंगलों में भोजन की समस्या उठ खड़ी होती है। क्योंकि घास या तो बर्फ और ओलों से दब चुकी होती है या मौसम की मार के चलते सूख चुकी होती है। ज्यादातर फलदार झाड़ियां नंगी हो जाती हैं और मांसाहारी जीवों के लिए छोटे शिकार जैसे खरगोश और हिरण के बच्चे आदि मिलने कम हो जाते हैं, क्योंकि वे सर्दियों में सुरक्षित जगहों में दुबक जाते हैं। ऐसे में भूख से जूझते और अपनी शारीरिक ऊर्जा बचाने के लिए वन्यजीव आसान भोजन की तलाश में निकलते हैं। ऐसे में वे खेतों की ओर बढ़ते हैं, जहां इस मौसम में गेहूं, सरसों, गन्ना और आलू की फसलें लहलहा रही होती हैं। इस समय शाकाहारी जानवरों के लिए इंसानी खेतों पर धावा बोलना एक मजबूरी बन जाती है।

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जनवरी और दिसंबर की रातें काफी लंबी और ठंडी होती हैं, इसलिए खेतों में इंसानी निगरानी भी कमजोर हो जाती है। जंगली जानवरों को बाकी मौसम की तरह इन दिनों ज्यादा इंसानी प्रतिरोध नहीं झेलना पड़ता। यही कारण है कि जंगल के किनारे स्थित गांवों में दिसंबर से जनवरी के अंत तक मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ जाता है। अगर इंसान पूरी तरह से बेफिक्र हो जाएं तो वन्यजीव उनके सालभर की फसलें चट कर सकते हैं, और दूसरी ओर, अगर वन्यजीव इंसानी खेती की ओर रुख न करें तो वे भूख से मर सकते हैं।

जानवरों की शारीरिक जरूरतें

ठंड के मौसम में जानवरों को भी अपने शरीर का तापमान बनाए रखने के लिए ज्यादा ऊर्जा की आवश्यकता होती है। खासकर गर्भवती मादाओं को इस मौसम में अधिक पोषण चाहिए होता है, ताकि वे अपनी और अपने पेट में पल रहे गर्भ की रक्षा कर सकें। झुंड में रहने वाले जानवरों, विशेषकर हाथियों को तो पूरे समूह के लिए ज्यादा भोजन की जरूरत होती है। इसलिए जिन इलाकों में भी हाथी हैं, वहां सबसे ज्यादा इंसान और हाथियों के बीच टकराव दिसंबर के अंत और जनवरी के भीषण सर्द मौसम में ही होते हैं। क्योंकि हाथियों के समूह एक-दो खेत को निशाना नहीं बनाते, बल्कि एक बार में पूरे इलाके को ही चट कर जाते हैं।

इसके साथ ही जंगलों के बीच से जो रेलवे या हाईवेज़ निकलते हैं, उनसे भी जानवरों को बड़ी दिक्कत होती है। दरअसल, ये मार्ग जानवरों की आवाजाही को बाधित ही नहीं करते, बल्कि उनकी जिंदगी के लिए भी खतरा बनते हैं, जैसे कि हाल ही में असम में आठ हाथियों की मौत ट्रेन से टकराकर हो गई। यह समस्या सिर्फ मौसमभर की नहीं, बल्कि विकास की आधुनिक शैली की भी समस्या है। यही कारण है कि पारंपरिक वन्यजीव कॉरिडोर टूट रहे हैं। जानवरों के पुराने रास्ते अब इंसानी बस्तियों के बीच से या उनके आसपास से होकर गुजरते हैं। जब ऐसे जानवरों के सदियों पुराने रास्तों पर इंसान अतिक्रमण करता है, तो फिर इंसान और जानवरों के बीच न चाहते हुए भी संघर्ष की स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं।

पसंदीदा रबी की फसल

शाकाहारी जानवरों को रबी की फसल में बड़ा मज़ा आता है। इन सभी जानवरों की पसंदीदा चीज़ें इस फसल के मौसम में उगाई जाती हैं। गेहूं के लहलहाते खेत हाथियों और नीलगायों के मुंह में पानी ले आते हैं। आलू के खेत देखकर जंगली सुअरों के मुंह में पानी आ जाता है, क्योंकि उन्हें ताजे आलू निकालकर खाने में बहुत मज़ा आता है। हिरणों और नीलगायों के लिए बासंती रंग से नहाए सरसों के खेत भी आकर्षक होते हैं। दरअसल, शाकाहारी जानवरों को रबी की फसलों से न सिर्फ भरपूर ऊर्जा मिलती है, बल्कि इन फसलों में पानी भी खूब होता है, जो सर्दियों में जंगलों के सूखे जलस्रोतों की भरपाई करता है।

इंसानी डर और टकराव

जब किसानों की सालभर की मेहनत को जंगली जानवर नष्ट कर देते हैं, तो इंसानों और वन्यजीवों के बीच टकराव होना स्वाभाविक है। कई बार ये टकराव भीड़ के रूप में हो जाते हैं और सैकड़ों लोग कुछ जानवरों पर टूट पड़ते हैं। ऐसे में जानवर भी घबराकर इंसानों पर हमला बोल देते हैं। इन संघर्षों को रोकने के लिए हर साल प्रशासनिक स्तर पर जनवरी के महीने में इनसे निपटने के लिए कई तरह की तैयारियां की जाती हैं, फिर भी कमजोर प्रशासन तंत्र के चलते इन टकरावों को टाला नहीं जा पाता।

दरअसल, अकेले बाड़ लगाना और गश्त बढ़ाना ऐसे संघर्षों को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। इन संघर्षों को रोकने के लिए जरूरी उपाय अपनाए जाने चाहिए, जैसे कि जंगल में पानी और जानवरों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाए, शिकार प्रजातियों के लिए शाकाहारी जानवरों की तादाद बढ़ाई जाए और वन्यजीव कॉरिडोर का संरक्षण किया जाए। जब तक ये सब नहीं होता, जनवरी का महीना इंसानों और वन्यजीवों के लिए खूनी संघर्ष का महीना बना रहेगा। इ.रि.सें.

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