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जहां मशाल जलती थी, वहां अब सिर्फ यादें

कोस मीनारें

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कोस मीनारें मुगल काल की वह अनकही विरासत हैं, जो यात्रियों के मार्गदर्शन और शासन संचालन का अहम हिस्सा थीं। चूना-पत्थर और ईंटों से निर्मित ये ऊंची मीनारें इतिहास की गवाही देती हैं। आज अधिकांश मीनारें जर्जर और अतिक्रमण का शिकार हैं, फिर भी उनका ऐतिहासिक और पर्यटन महत्व अद्वितीय है।

हिंदुस्तान सदियों तक विदेशी राजा-महाराजाओं, नवाबों और सम्राटों का गुलाम रहा है। देश के किसी भी राज्य में चले जाइए, वहां उनकी याद दिलाने वाली निशानियां मिल जाएंगी। कहीं ये स्मारकों के रूप में हैं, तो कहीं मकबरों या धार्मिक स्थलों के रूप में। ताजमहल, लाल क़िला या हुमायूं का मकबरा हो—दिल्ली की जामा मस्जिद से लेकर न जाने कितने ऐसे स्थल हैं, जो उस दौर की याद दिलाते हैं। इनमें से कुछ पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं, जबकि कुछ अब केवल स्मृतियों में सिमटते जा रहे हैं।

कोस मीनारें

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मुगल बादशाह अकबर और उनसे पहले आए शासकों ने देश में कुछ ऐसे निर्माण करवाए, जो आज भी आम जनता को लाभ पहुंचाते हैं। इनमें विशेष रूप से आगरा से लेकर जयपुर होते हुए अजमेर तक बनी कोस मीनारें उल्लेखनीय हैं। वैसे देश के अन्य राज्यों में भी विभिन्न शासकों द्वारा ऐसी मीनारें तामीर करवाई गई थीं।

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निर्माण का उद्देश्य

जब कोस मीनारों का निर्माण हुआ, तो इसका उद्देश्य यह था कि राजस्थान में अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जाने वाले यात्रियों को मार्ग और दूरी का अनुमान होता रहे। दरअसल, हर वर्ष हज़ारों लोग अजमेर में ख्वाजा साहब की दरगाह पर इबादत करने आते थे। स्वयं अकबर भी प्रतिवर्ष उनकी दरगाह पर आता था। उस समय ये कोस मीनारें अजमेर, आगरा, जयपुर, भरतपुर और आमेर जैसे नगरों के लिए दूरी मापने का कार्य करती थीं।्र

मुगल साम्राज्य में विस्तार

इतिहासकार बताते हैं कि कोस मीनारें केवल राजस्थान तक सीमित नहीं थीं, बल्कि मुगल काल में इन्हें लाहौर तक बनवाया गया था। संभवतः उस समय इनकी संख्या 600 से अधिक थी। कहना गलत नहीं होगा कि जहां-जहां मुगल शासन था, वहीं-वहीं कोस मीनारों का विस्तार भी था।

सुविधा के केंद्र

आज कोस मीनारों में से केवल एक सैकड़ा से कुछ अधिक ही शेष बची हैं। इनका उपयोग केवल सड़क मार्ग बताने तक सीमित नहीं था। यहां यात्री विश्राम करते थे, उपलब्ध पानी से प्यास बुझाते थे और आवश्यकता अनुसार पानी साथ ले जाते थे। कुछ स्थानों पर चिकित्सा व्यवस्था और सुरक्षा के भी पर्याप्त इंतज़ाम होते थे। कहीं-कहीं वर्षा और सर्दी से बचाव के लिए ठहरने की व्यवस्था भी पाई जाती थी।

पूर्वजों से सुनी कहानियों के अनुसार, यहां एक घुड़सवार भी तैनात रहता था, जो राजा-महाराजाओं के संदेश एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का कार्य करता था। इस प्रकार कोस मीनारें यात्रियों के साथ-साथ शासकों के लिए भी शासन संचालन में सहायक थीं।

संरचना और उपयोगिता

चूना-पत्थर और ईंटों से निर्मित इन कोस मीनारों की ऊंचाई लगभग तीस फीट होती थी और इन्हें एक चबूतरे पर तामीर किया जाता था। संध्या के समय इन पर मशाल या अन्य साधनों से रोशनी की जाती थी, ताकि दूर से ही यात्रियों को ये दिखाई दे सकें। जानकार बताते हैं कि इनके आसपास कुछ दुकानदार भी होते थे, जो यात्रियों को आवश्यक सामान उपलब्ध कराते थे। स्पष्ट है कि उस समय कोस मीनारें आम जनजीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।

उपेक्षा और बदहाली

आज स्थिति यह है कि हरियाणा और राजस्थान में जितनी कोस मीनारें बची हैं, वे भी धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं। कुछ की हालत इतनी जर्जर है कि वे कभी भी गिर सकती हैं, जबकि जो बची हैं, वे अतिक्रमण का शिकार हैं। कहीं-कहीं ये कूड़े-कचरे के ढेर में तब्दील हो चुकी हैं। ‘बारह साल बाद कूड़े के दिन फिरते हैं’ की कहावत के विपरीत, अब ये कोस मीनारें स्वयं कूड़े का ढेर बनती जा रही हैं।

संरक्षण की आवश्यकता

यह भी ध्यान रखने योग्य है कि पुरातत्व विभाग ने इन्हें राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर रखा है और इनकी सुरक्षा का दायित्व भी उसी का है, लेकिन वर्तमान स्थिति देखकर ऐसा नहीं लगता कि इनकी समुचित देखरेख हो रही है। भले ही आज कोस मीनारों का महत्व पहले जैसा न रहा हो, लेकिन ऐतिहासिक और पर्यटन की दृष्टि से इनका महत्व अन्य स्मारकों और ऐतिहासिक स्थलों के समान ही है। सभी चित्र लेखक

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