मथुरा-वृंदावन, यमुना के किनारे बसा ब्रजधाम, जहां घंटियों की गूंज और राधे-राधे के मधुर स्वर हर कोने में गूंजते हैं, रासलीला, भक्ति, स्वाद और रंगों से जीवन सराबोर करता है।
सैर-सपाटा और पूजा-पाठ दोनों संग-संग हो जाते हैं यमुना किनारे मन्दिरों, आश्रमों और घाटों की पावन नगरी वृंदावन में। फाल्गुन में तो वृंदावन की छटा और भी रंगीन हो जाती है। होली के विविध रंग-ढंग देखने सैलानी उमड़ पड़ते हैं।
करीब 3000 साल पहले कंस शासक ने मथुरा पर राज किया और यहीं उसके भतीजे श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। इसी दिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। श्रीकृष्ण ने बाद में, कंस का वध किया और वही विश्राम स्थल कहलाता है। फिर वृंदावन में गोपियों के साथ रासलीलाएं कीं। आज मथुरा और वृंदावन दोनों शहर एक-दूसरे से करीब 15 किलोमीटर फासले पर हैं। दोनों यमुना के किनारे बसे हैं और बृजभूमि या बृजधाम कहलाते हैं।
दिल्ली वाले तो यदाकदा मथुरा और वृंदावन सुख, शान्ति और अध्यात्म की खोज में पहुंच जाते हैं। कुछ का तो महीने में एक बार श्री बांके बिहारी जी के दर्शन करने का नियम है। नगर के कोने-कोने में भक्तों की टोलियां भजन गातीं और भक्तिरस में झूमती नज़र आती हैं। मन्दिरों की घंटियां टन-टन गूंजती रहती हैं। यहां एस्कॉन के हरे कृष्ण हरे रामा, राधा स्वामी सत्संग सहित कई आश्रम हैं, जहां भक्तों के रात गुजारने की सुविधा उपलब्ध है।
श्रीकृष्ण की जन्मभूमि
मथुरा के प्राचीन और प्रसिद्ध महामन्दिरों में द्वारकाधीश मन्दिर का स्थान सबसे ऊपर है। इसकी शीशे की कलात्मक सजावट देखते ही बनती है। कटरा केशव देव के नाम से जानी जाती है श्रीकृष्ण भूमि। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मन्दिर का निर्माण राजा ब्रज ने करवाया था। बाद में, इसका पुनः निर्माण विक्रमादित्य ने करवाया। मन्दिर 17 बार क्षतिग्रस्त हुआ और फिर बनवाया गया। आज असंख्य भक्त रोज दर्शन करने पहुंचते हैं। पौराणिक कथाओं के मुताबिक यहीं कारावास में देवकी ने श्रीकृष्ण को जन्म दिया था। इस विशाल मन्दिर परिसर में ही राधा कृष्ण मन्दिर और श्रीमद्भगवद् भवन भी हैं। साथ ही, शाही ईदगाह मस्जिद भी है। यही नहीं, मथुरा-वृंदावन मार्ग पर एक और भव्य और कलात्मक गीता मन्दिर भी भक्त जाना पसन्द करते हैं।
भक्ति रस से समय निकाल कर, मथुरा के डेंपियर पार्क का रुख कीजिए। यहां संग्रहालय है, जो रोज़ खुलता है। इसके भीतर चप्पे-चप्पे में, पुरातत्व महत्व की तमाम दुर्लभ वस्तुएं संगृहीत हैं। गुप्त और कुषाण युग की कलाकृत्तियां ही नहीं, बौद्ध काल और पूर्तवर्ती काल की भूली-बिसरी चीजें भी देखने का बखूब मौका मिलता है।
वृंदा यानी तुलसी
वृंदा का मतबल होता है तुलसी, और वन। सो, वृंदावन हो गया ‘तुलसी का जंगल’। यही वृंदावन श्रीकृष्ण का धाम है। तुलसी कृष्ण को प्रिय है, इसीलिए तुलसी की मालाएं खूब मिलती हैं और श्रीकृष्ण को बढ़-चढ़कर चढ़ाई जाती हैं। तुलसी के घने वन दो जगह देख सकते हैं—सेवाकुंज और निधिवन में। दोनों ही श्रीकृष्ण, राधारानी और गोपियों की रास लीला के मधुर स्थल रहे हैं।
वृंदावन के कण-कण में श्रीकृष्ण की मौजूदगी का अहसास होता है। करिश्मे-दर-करिश्मे निधिवन में होते रहते हैं। पौराणिक कथा-कहानियों के अनुसार निधिवन में श्रीकृष्ण गोपियों के संग रासलीलाएं करते थे और आज भी करते हैं। माना जाता है कि श्रीकृष्ण की रासलीलाओं को आंखों से देख पाना मुमकिन नहीं है। क्योंकि जब-जब रात में श्रीकृष्ण निधिवन में प्रकट होते हैं, तब-तब उनका ‘तेज’ कई सूर्यों जैसा होता है। इस कदर रौशन निधिवन में देखने वालों की आंखें ही चौंधिया जाती हैं। इसीलिए निधि वन में दिन में तो घूम सकते हैं, लेकिन रात में बंद कर दिया जाता है।
वृंदावन में बांके बिहारी गली में स्थित श्री बांके बिहारी मन्दिर में भक्त दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं। श्री बांके बिहारी मंदिर की गली के बाहर भक्त आगे दो-ढाई सौ मीटर पैदल चलते हैं। रास्ते में दोनों तरफ़ भगवान की प्रतिमाएं-तस्वीरें, साज-शृंगार, वस्त्र, खाने-पीने और फूलों की छोटी-छोटी दुकाने हैं। थोड़ा चलकर, बाईं तरफ़ मुड़ते ही रास्ता जरा संकरा हो जाता है। आगे कुछ सीढ़ियां चढ़कर, श्री बांके बिहारी मंदिर है। मन्दिर के भीतर बड़ा बरामदा है और सामने झरोखे में श्री बांके बिहारी की दिव्य प्रतिमा है। तुलसी की मालाएं श्रीकृष्ण को बढ़-चढ़कर चढ़ाई जाती हैं, और तुलसी का ही प्रसाद भी मिलता है। मन्दिर के किवाड़ सुबह और शाम ही खुलते हैं।
बताया जाता है कि एक रोज निधिवन से कृष्ण भक्त स्वामी हरिदास के हाथ बांके बिहारी जी की प्रतिमा लगी थी। वही निधि वन, जिसमें श्रीकृष्ण राधा और गोपियों संग रासलीलाएं रचाते थे। भक्तों का मानना है कि श्री बांके बिहारी की प्रतिमा श्रीकृष्ण की सबसे खूबसूरत छवियों में से है।
राधे कृष्ण प्रेम के रंग
समूचा वृंदावन हर सुबह और शाम ‘राधे कृष्ण-राधे कृष्ण’ के रंग में सराबोर हो जाता है। इस दौरान, पूजा और आरतियों को क्रमानुसार आयोजित किया जाता था, फिर छप्पन भोग का प्रसाद बांटा जाता है। मथुरा ही नहीं, वृंदावन के दूध-खोए के पेड़े तो सारी दुनिया में मशहूर हैं। बांके बिहारी जी को भी पेड़े ही सबसे ज्यादा प्रिय हैं, इसीलिए प्रसाद के तौर पर पेड़े ही चढ़ाने का चलन है। सबसे पुराने हलवाइयों की मथुरा, वृंदावन और गोवर्धन में भी दुकाने हैं। मिट्टी के कुल्हड़ में दूध और चाय परोसने का चलन है। कुल्हड़ में ही पेश ठंडीठार रबड़ी खाने का भी आनन्द है। तवे पर टकाटक आलू टिक्कियों पर मटरी डाल कर पेश छोले-टिक्की मशहूर स्ट्रीट फूड है।
बंदरों की भी टोलियां
गलियों-चौबारों में बंदरों की टोलियां घूमती मिलती हैं। कहीं-कहीं तो भक्तों का प्रसाद छीन कर ही खा जाते हैं। कई बंदर तो यात्रियों के महंगे मोबाइल और चश्मे लपक के ले जाते हैं। फिर फ़्रूटी पिलाओ, तो लौटा देते हैं। लेकिन न खुदा न ख़ास्ता फ्रूटी देने-पिलाने में देर कर दी, तो मोबाइल या चश्मा कहीं किसी छत पर फेंक जाते हैं। फिर तो ढूंढ़ने से भी नहीं मिल पाते। यात्रियों को लगता है कि बंदरों को दुकानदारों ने सिखा रखा है, क्योंकि दुकानदार दुगुने-तिगुने दामों पर फ्रूटी बेचते हैं।
वृंदावन के मुख्य बाज़ार से हटकर, दक्षिण भारतीय शैली से निर्मित विशाल गोविन्द देव मन्दिर भी भक्तों को बुलाता है। पहले मन्दिर 5 मंजिला था, जबकि अब 2 मंजिलें टूट चुकी हैं। नजदीक ही, रंग जी मन्दिर भी दक्षिण और उत्तर भारतीय शैली से बना है। वृंदावन के काली घाट स्थित कदम के प्राचीन और विशाल वृक्ष के भी भक्त दर्शन कर धन्य होते हैं। शिव भक्तों के लिए वृंदावन में गोपेश्वर मंदिर है और मथुरा में भूतेश्वर मन्दिर। प्रेम मंदिर में भी भक्तों के मेले लगते हैं।
आसपास दर्शन स्थल
मथुरा और वृंदावन के आसपास धार्मिक और दर्शनीय शहरों की कमी नहीं है। धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ी नगरों में करीब 50 किलोमीटर दूर बरसाना है। यहां लगभग 365 सीढ़ियां चढ़कर राधा रानी मंदिर में भी असीम श्रद्धा नजर आती है और करीब 60 किलोमीटर दूर है नंद गांव। गोकुल की दूरी होगी करीब 15 किलोमीटर, तो महावन करीब 18 किलोमीटर परे है। गोवर्धन भी बीसेक किलोमीटर दूर ही है। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा 21 किलोमीटर के आसपास की है। पैदल या वाहन के जरिए भी परिक्रमा की जा सकती है। पैदल परिक्रमा करने में करीब 4 घंटे लगते हैं।
दिल्ली से मथुरा वाया वृंदावन
दिल्ली से मथुरा की सड़क दूरी करीब 150 किलोमीटर है। दिल्ली से मथुरा सड़क और रेल से जुड़ा है। वृंदावन तक सड़क मार्ग ही है। दिल्ली से वृंदावन आने-जाने का सबसे बढ़िया विकल्प यमुना एक्सप्रेस हाईवे है। इस रास्ते से, करीब सवा 2 घंटे में दिल्ली से वृंदावन में होते हैं। उड़ान से जाना चाहें, तो नजदीकी एयरपोर्ट आगरा है। आगरा से वृंदावन करीब 56 किलोमीटर दूर है।
वृंदावन में सर्दी, वसंत, गर्मी और मॉनसून सभी मौसम आते हैं। हालांकि तीर्थ तो सारा जारी रहता है, लेकिन मौसम के लिहाज से, अक्तूबर से मार्च के मध्य सबसे खुशनुमा होता है। उधर गर्मियों के दिन तो दिन, रातें भी तपती हैं। गर्मियों में तो पारा 45 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। - सभी चित्र लेखक

