अक्तूबर में बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर की यात्रा करना केवल किसी त्योहार को देखना नहीं है। यह भारत की एक ऐसी सांस्कृतिक दुनिया में प्रवेश करना है, जहां जंगल है, देवी मां है, लोकविश्वास है, साथ ही कला और समुदाय एक-दूसरे से गहरे जुड़ाव के साथ मौजूद हैं।
सोचिए, आप एक ऐसे शहर (जगदलपुर) में पहुंचते हैं, जहां दशहरा तो मनाया जा रहा है, लेकिन दूर-दूर तक कहीं रावण का पुतला नहीं दिख रहा। न रामलीला का मंच है, न तीर चलाने वाले राम और न ही दस सिरों वाला दशानन। इसके बजाय यहां सड़कों पर पारंपरिक वेशभूषा में लोग हैं, फिजा में गूंजती लोकवाद्यों की धुन है, देवी-देवताओं की डोलियां हैं। एक विशाल लकड़ी का रथ है, जिसे सैकड़ों लोग मिलकर खींच रहे हैं। जी नहीं, यह कोई कल्पना नहीं और न पुरी की रथयात्रा का कोई बदला हुआ रूप। यह छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग की सांस्कृतिक दुनिया में जगदलपुर के रूप में वह केंद्र है, जहां बस्तर दशहरा अपने विराट रूप में दिखाई देता है। जबकि दंतेवाड़ा मां दंतेश्वरी की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इसलिए अक्तूबर में बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर की यात्रा करना केवल किसी त्योहार को देखना नहीं है। यह भारत की एक ऐसी सांस्कृतिक दुनिया में प्रवेश करना है, जहां जंगल है, देवी मां है, लोकविश्वास है, साथ ही कला और समुदाय एक-दूसरे से गहरे जुड़ाव के साथ मौजूद हैं।
यह एक ऐसा दशहरा है, जो विजयादशमी से बहुत पहले शुरू हो जाता है। बस्तर दशहरा की सबसे बड़ी खूबी उसकी लंबाई ही नहीं है, बल्कि इसकी पूरी संरचना है। इसकी परंपरा छह शताब्दियों पुरानी है। अलग-अलग अनुष्ठानों के माध्यम से यह उत्सव कई महीनों तक चलता है। इस साल यह 12 अगस्त से ‘पाट जात्रा’ के रूप में शुरू हो चुका है और इसका अंतिम प्रमुख चरण लगभग पूरे अक्तूबर तक चलेगा। पाट जात्रा से लेकर रथ निर्माण, विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों, देवताओं के आगमन, रथ यात्रा और अंततः मुरिया दरबार तक हर चरण बस्तर की अपनी सांस्कृतिक स्मृति को सामने लाता है। यहां पर्व या त्योहार एक-दो दिन का उल्लास नहीं, बल्कि लंबे सामुदायिक अनुभव का नाम है और शायद यही वह बिंदु है, जहां बस्तर का यह सामान्य पर्यटन स्थल पूरी दुनिया में सबसे अलग हो जाता है।
इस पूरे उत्सव का केंद्र होता है जगदलपुर। इस समय यहां ज्यादातर लोग शाम के समय पारंपरिक वेशभूषा में दिखाई देते हैं। हर तरफ लोकसंगीत और नृत्य कार्यक्रमों का माहौल होता है। धार्मिक जुलूस और रथ के आसपास उमड़ती भीड़ शहर को एक विशाल तथा खुले रंगमंच में बदल देती है। पर्यटन विभाग के अनुसार, यह केवल कोई पर्व या त्योहार नहीं है, यह यहां के लोगों के अपने होने का उत्सव है। इस अनुभव में अनेक ऐसे झकझोर देने वाले पल होते हैं, जो पर्यटक को यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि आखिर पर्यटन का अर्थ केवल सुंदर जगह की तस्वीर भर लेना तो नहीं है। वास्तव में, बस्तर का दशहरा समूचे आदिवासी समाज को दिल की गहराइयों तक समझने का जरिया है।
बस्तर की पहचान उसके घने जंगलों से अलग करके समझी ही नहीं जा सकती। यहां प्रकृति केवल पर्यटन की पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि स्थानीय जीवन, लोकविश्वास, भोजन, शिल्प और सामाजिक परंपराओं का हिस्सा है। बस्तर की इस यात्रा में केवल जगदलपुर का उत्सव देखना पर्याप्त नहीं है। आसपास के गांवों, हाट-बाजारों और शिल्प परंपराओं तक जाना इस अनुभव को पूरा करता है। लकड़ी की कारीगरी, बांस का काम, मिट्टी की कला और विशेष रूप से ढोकरा या बेल-मेटल शिल्प बस्तर की विशिष्ट पहचान हैं।
भारत सरकार का पर्यटन पोर्टल भी बस्तर की धातु, बांस, लकड़ी और मिट्टी की पारंपरिक कलाओं को इस प्राकृतिक परिदृश्य का महत्वपूर्ण हिस्सा बताता है। किसी स्थानीय कारीगर के हाथ में पिघली धातु को आकार लेते देखना, किसी संग्रहालय में रखी तैयार कलाकृति देखने से ज्यादा रोमांचक है। यहां आपको पता चलता है कि कला सिर्फ वस्तु नहीं, पीढ़ियों से चली आ रही स्मृति भी है।
बस्तर की सांस्कृतिक यात्रा का एक हिस्सा जहां आदिवासी कलाओं का विहंगम लोकउत्सव है, वहीं दूसरी ओर दक्षिण बस्तर स्थित दंतेवाड़ा की दंतेश्वरी देवी की गहन लोक आस्था है। दंतेवाड़ा में स्थित मां दंतेश्वरी का मंदिर भी इस पूरे सांस्कृतिक संसार का एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र है। बस्तर दशहरा की धार्मिक संरचना में मां दंतेश्वरी की केंद्रीय भूमिका है, जो इसे देश के अन्य सभी दशहरा आयोजनों से बिल्कुल भिन्न पहचान देती है। यात्रा के दौरान यही महसूस होता है कि बस्तर में धर्म केवल मंदिर की चारदीवारी में नहीं रहता, वह लोकगीतों, जन-जुलूसों, देव-परंपराओं, जंगलों और सामुदायिक जीवन में भी रचा-बसा है।
इ.रि.सें.

