बेमिसाल कोहिनूर : क्वीन के बाद भी बरकरार है नूर : The Dainik Tribune

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बेमिसाल कोहिनूर : क्वीन के बाद भी बरकरार है नूर

बेमिसाल कोहिनूर : क्वीन के बाद भी बरकरार है नूर

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पुष्परंजन

करीब 105 कैरेट का जो कोहिनूर हीरा अब ब्रिटिश राजपरिवार के शाही ताज की शोभा बढ़ा रहा है उसका मूल स्थान भारत भूमि है। इस बेशकीमती हीरे का वैभव भारत समेत कई देशों के राजवंशों ने भोगा लेकिन इसका स्वामित्व विभिन्न कालों में बदलता रहा। ब्रिटेन पहुंचने से पूर्व यह बहुमूल्य हीरा भारत में ही महाराजा रणजीत सिंह के पास था। उनके नाबालिग उत्तराधिकारी दलीप सिंह से यह ब्रिटेन ने हासिल किया। आजादी के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण व कई हस्तियों ने ब्रिटेन से उसकी वापसी की मांग की लेकिन सरकारों के स्तर पर इस बारे में एक अनिच्छा का रुख रहा। अब क्वीन एलिज़ाबेथ द्वितीय की अंत्येष्टि के मौके पर यह ‘इंपीरियल स्टेट क्राउन’ में जड़ा दिखाई देगा। राजसी शान के इस प्रतीक से कई किंवदंतियां भी जुड़ी हैं।

19 सितंबर, 2022 को क्वीन एलिज़ाबेथ द्वितीय सुपुर्दे ख़ाक हो जाएंगी। विगत बुधवार को बकिंघम पैलेस से सैन्य टुकड़ी, ‘रॉयल हॉर्स आर्टिलरी’ की तोपगाड़ी से मय राजमुकुट उनके ताबूत को वेस्टमिंस्टर हॉल तक ससम्मान ले आया गया था। बकिंघम पैलेस से सेंट्रल लंदन में अवस्थित वेस्टमिंस्टर हॉल की दूरी बमुश्किल डेढ़ किलोमीटर है। वेस्टमिंस्टर हॉल, संसदीय संपदा का हिस्सा है, जहां बड़े आयोजन होते हैं। वेस्टमिंस्टर हॉल में पांच दिनों तक उनके पार्थिव शरीर को जनता के दर्शनार्थ रखा गया था। सोमवार को साम्राज्ञी एलिज़ाबेथ द्वितीय के ताबूत को वेस्टमिंस्टर हॉल से सड़क पार शाही चर्च, ‘वेस्टमिंस्टर आबे’ ले जाया जाएगा, वहीं राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि 11 बजे शुरू होगी। उससे पहले कोहिनूर जड़े ‘इंपीरियल स्टेट क्राउन’ को उनके पार्थिव शरीर पर लोग देख सकेंगे। इस बहुचर्चित ताज का आखि़री साथ वहीं तक।

लेकिन क्या रानी एलिज़ाबेथ के सुपुर्दे ख़ाक हो जाने से कोहिनूर की कहानी वहीं समाप्त हो जाती है? इंसान मर जाता है, मगर सवाल नहीं मरते। इस पहेली को समझने के वास्ते तीन साल पहले दिल्ली लौटते हैं। अप्रैल 2019 में पांच जजों की बेंच का नेतृत्व करने वाले तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने फैसला सुनाया कि कोहिनूर पर दावेदारी को लेकर जो क्यूरेटिव पेटीशन (पुनर्विचार से अलग, उपचार याचिका) है, उसे हम रद्द करते हैं। यानी, केस क्लोज।

जून 2010 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने ब्रिटिश सरकार से अनुरोध किया था कि उसे सुलतानगंज बुद्धा और कोहिनूर वापस किये जाएं। लेकिन ब्रिटेन ने ब्रिटिश म्यूजियम एक्ट-1963 का हवाला देकर इस मांग को निरस्त कर दिया था। एएसआई को दूसरा धक्का अपनी ही सरकार से लगा, जब कोहिनूर का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। 18 अप्रैल 2016 को सुप्रीम कोर्ट में सांस्कृतिक मंत्रालय की ओर से कहा गया कि एएसआई इस मामले में आगे नहीं बढ़ सकता, क्योंकि एंटीक एंड आर्ट ट्रेज़र एक्ट-1972 के अनुसार, सिर्फ अवैध रूप से देश से बाहर गई प्राचीन वस्तुएं वापस लाने के लिए एएसआई अधिकृत है। इसके प्रकारांतर सुप्रीम कोर्ट ने कोहिनूर की वापसी पर मोदी सरकार का पक्ष पूछा था, लेकिन जब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने इसे आड़े हाथों लिया, तो तपाक से दोष पंडित नेहरू पर मढ़ दिया गया।

केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने कोर्ट से कहा कि हमने नहीं, 1956 में पंडित नेहरू ने बयान दिया था कि ब्रिटेन को उपहारस्वरूप दी गई वस्तु की वापसी में परेशानी पैदा होगी, क्योंकि पांच साल के बालक दलीप सिंह ने लार्ड डलहौजी को कोहिनूर ‘उपहार’ में दिया था। भारतीय मूल के ब्रिटिश सांसद कीथ वाज लंबे समय से कोहिनूर की वापसी की आवाज़ उठा रहे थे। वह भी कोहिनूर मामले में भारत सरकार की किंकर्तव्यविमूढ़ता से हैरान थे।

ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के दस्तावेज बताते हैं कि 1947 में देश की आजादी के तुरंत बाद कोहिनूर की वापसी की मांग की गई। दूसरी मांग 2 जून 1953 को की गई, तब साम्राज्ञी एलिजाबेथ द्वितीय का राज्याभिषेक हो रहा था। उस समय पंडित नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। 1990 में पत्रकार कुलदीप नैयर ने ब्रिटेन में भारत का उच्चायुक्त रहते कोहिनूर की वापसी के लिए ब्रिटिश सरकार से पत्राचार शुरू किया। ज़ाहिर है, सरकार की सहमति के बग़ैर उच्चायुक्त ऐसे प्रयास नहीं करते।

1997 में कुलदीप नैयर राज्यसभा के सदस्य बने, मगर कोहिनूर की कसक से वे उबरे नहीं। सन 2000 में कोई 50 सांसदों ने कोहिनूर की वापसी को लेकर एक प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर किया, उनमें नेता प्रतिपक्ष मनमोहन सिंह भी थे। 2013 में एक बार फिर ब्रिटिश सरकार से कोहिनूर की मांग की गई, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि हम प्रतिदानवाद (रिटर्निजम) में विश्वास नहीं करते। हम ऐसा करते रहें, तो इस तरह ब्रिटिश म्यूजियम ही खाली हो जाएगा।

क्वीन एलिजाबेथ-द्वितीय 1961, 1983, और 1997 में तीन बार भारत आ चुकी थीं। तीनों बार कोहिनूर की वापसी का सवाल नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गया था। 13 नवंबर 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बकिंघम पैलेस में क्वीन एलिज़ाबेथ के साथ बाकायदा लंच किया था। मगर, शाही भोज में कोहिनूर की बात छेड़ कर मोदी जी कड़वाहट क्यों पैदा करते? उसके कोई दो हफ्ते बाद, कुलदीप नैयर ने 29 नवंबर 2015 को ‘ह्वाई डिड पीएम मोदी नॉट आस्क फॉर द कोहिनूर’ शीर्षक वाले लेख में लिखा, ‘तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने मुझसे कहा था कि आप भारत और ब्रिटेन के बीच रिश्ते बिगाड़ रहे हैं। इन शब्दों के मायने यही निकलते हैं कि सन 2000 में एनडीए सरकार नहीं चाहती थी कि कोहिनूर की वापसी हो। अब भी भाजपा के कई सारे नेता कोहिनूर पर सरेंडर के मूड में हैं।’

ब्रिटिश इतिहासकार और सांसद भी कोहिनूर के बारे में ‘सरेंडर’ शब्द का इस्तेमाल करते रहे हैं। ‘सरेंडर’ और ‘गिफ्ट’ में बुनियादी फर्क है। सुप्रीम कोर्ट में भारतीय संस्कृति मंत्रालय का बयान यही था कि कोहिनूर ब्रिटिश सरकार को ‘गिफ्ट’ किया गया था। सुप्रीम कोर्ट में संस्कृति मंत्रालय की ओर से अटार्नी जनरल के बयान को ब्रिटेन ने ‘ऑन द रिकार्ड’ मान लिया है। कभी यह केस यूनेस्को में गया, तो ब्रिटिश सरकार उस बयान को भारत के विरुद्ध इस्तेमाल कर सकती है।

विरासत वापसी की लड़ाई दुनिया के दूसरे देश भी लड़ते रहे हैं। ब्रिटिश म्यूज़ियम लंदन में लगी, डेढ़ सौ साल पहले एथेंस के एक्रोपोलिस से उड़ाई ‘एल्गिन मार्बल’ की वापसी की लड़ाई यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस, यूरोपीय संघ, और यूनेस्को तक पहुंची हुई है। इससे क्या ग्रीस और ब्रिटेन के संबंध बिगड़ गये? यूनेस्को के 1970 वाले कन्वेंशन में स्पष्ट है कि चोरी या धोखे से हासिल धरोहर को उनके उद‍्गम वाले देश (सोर्स नेशन) को वापस किया जाए। इस पर दुनिया के 120 देशों ने दस्तखत किये हैं। ब्रिटेन ने 32 साल बाद 2002 में यूनेस्को कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किया, इससे इस देश की नीयत का पता चलता है।

यूनेस्को कन्वेंशन के आधार पर 2011 में जर्मनी और तुर्की के बीच ‘श्बोगाजकोय स्फिंक्स’ वापसी पर सहमति हुई। इसी तरह 2010 में स्विट्जरलैंड ने तंजानिया को श्माकोन्ड मुखौटा देना स्वीकार किया। यूनेस्को की पहल पर अमेरिका ने थाईलैंड और जोर्डान को उनकी प्राचीन धरोहरों को वापस किया है। लेकिन हमारे यहां एक बार भी नहीं सोचा गया कि भारत को सीधा यूनेस्को का दरवाजा खटखटाना चाहिए था।

वायसराय डलहौजी ने दरअसल छल किया था। एक पांच साल के बालक दलीप सिंह से कोहिनूर हासिल करने के तरीके को आज की अदालत व पुलिस, ठगी की श्रेणी में ही रखेगी। महाराजा रणजीत सिंह के वारिस दलीप सिंह को जिन हालात में ब्रिटेन में रखा गया, उनका धर्म परिवर्तन कर ईसाई बनाया गया, उसकी कथा से सिख अस्मिता को धक्का पहुंचता है। 1839 में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद 16 सितंबर 1843 को पांच साल के दलीप सिंह को अंग्रेज़ों ने सिख साम्राज्य का महाराज, और उनकी मां जिंद कौर को रीजेंट (राज्य संरक्षक) घोषित किया। लेकिन दलीप सिंह को 13 साल तक अपनी मां से नहीं मिलने दिया गया। दलीप सिंह की मां, महाराजा रणजीत सिंह की सबसे छोटी रानी जिंद कौर, पूरे डेढ़ दशक काठमांडो में रहीं। 29 मार्च 1849 को द्वितीय एंग्लो-सिख वॉर में पंजाब अंग्रेजों के अधीन आ गया था, और दस साल के दलीप सिंह को ‘नॉमिनल रूलर’ बना दिया गया।

दलीप सिंह की पूरी दास्तान पढ़ने के बाद साफ-साफ लगता है कि कोहिनूर को तत्कालीन अंग्रेज शासकों ने छल-बल से हासिल किया था, जिसे महारानी विक्टोरिया को 1850 में लंदन के हाइड पार्क के एक समारोह में लार्ड डलहौजी ने नज़र किया था। दलीप सिंह तब मात्र 11 साल के थे। शाही क़िला ‘टॉवर ऑफ लंदन’ के ज़्वेल हाउस में कोहिनूर देखने का अवसर अगस्त 2006 में मुझे मिला था। कोहिनूर तो सिर्फ़ 105.6 कैरेट का है, मगर इस नायाब हीरे के खूनी इतिहास ने उसे बाकी सारे हीरों से महत्वपूर्ण और वजनदार बना दिया है।

कोहिनूर के लिए पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान की दावेदारी को अड़ंगेबाजी के मकसद से खड़ा किया जा रहा है। 1304 में काकतिया और मालवा राजाओं के हाथ से गुज़रता हुआ ‘कोहिनूर’ अलाउद्दीन खिलजी के कब्ज़े में आ गया। समरकंद के तैमूरी शासकों के पास कोई 300 साल तक ‘कोहिनूर’ रहा। 1526 में जो वृहदाकार हीरा बाबर के हाथ लगा, तब उसका नाम कोहिनूर नहीं था। ‘कोहिनूर’ नाम दरअसल पर्शियन जनरल नादिरशाह का दिया हुआ है। दिल्ली की सत्ता पर आसीन मुगल बादशाह मुहम्मद शाह आलम को हराने के बाद नादिरशाह ने जो अपार सम्पत्ति अर्जित की, उसमें वह हीरा भी शामिल था। नादिरशाह की हत्या 1774 में हो गई। कोहिनूर कालांतर में अफगान शासक अहमद शाह दुर्रानी के हाथ लगा। 1813 में उसके वंशज शाह शूजा दुर्रानी ने महाराजा रणजीत सिंह को कोहिनूर सौंप दिया था। शूजा दुर्रानी की भी हत्या 1842 में हो गई थी। संदर्भों के हवाले से ब्रिटेन का शाही परिवार मानता है कि कोहिनूर कभी भी पुरुष शासकों को रास नहीं आया। या वो मारे गये, या फिर उनके साम्राज्य का पतन हो गया।

इंपीरियल स्टेट क्राउन की शान

जुलाई 1850 में कोहिनूर जब बकिंघम पैलेस में प्रस्तुत हुआ, उसका वज़न था 186 कैरेट। तब कोहिनूर, दो अन्य हीरों के साथ सोने के बाजूबंद में फिट किया गया था। क्वीन विक्टोरिया के पति प्रिंस अलबर्ट ने कोहिनूर को और तराश कर ख़ूबसूरत करने का आदेश शाही ज्वेलर्स ‘गेर्रार्ड एंड कंपनी’ को दिया। तभी यह तय हुआ कि प्लैटिनम वाले राजमुकुट में कोहिनूर जड़ा जाये, और उसे केवल साम्राज्ञी ही पहने, पुरुष उससे दूर रहें। कोहिनूर जड़ा ‘इंपीरियल स्टेट क्राउन’ का आकार पांच बार बदला गया। 1938 में क्वीन विक्टोरिया की ताजपोशी के समय, 1902 में क्वीन अलेक्ज़ेंड्रिया के राज्याभिषेक के समय दूसरी बार, 1911 में जब क्वीन मेरी की ताजपोशी हुई तब, चौथी बार 11 दिसंबर 1936 को द क्वीन मदर एलिज़ाबेथ बोवेस लायन (जिन्हें एलिज़ाबेथ-वन भी कहा जाता है) को मुकुट पहनाने से पहले इसे रीशेप किया गया, और अंत में साम्राज्ञी एलिज़ाबेथ द्वितीय की ताजपोशी के दौरान। ब्रिटिश महारानियों की ज्वेलरी में यह अकेला ‘इंपीरियल स्टेट क्राउन’ है, जिसे प्लैटिनम में तैयार किया गया। एक किलो छह ग्राम वज़न वाले इस ताज में 2868 हीरे जिनमें कोहिनूर के साथ 317 कैरेट का कलिनन-टू शामिल है। चार माणिक, 17 नीलम, 11 पन्ने और 269 मोतियों को भी राजमुकुट में जड़ा गया था। ज्वेलर्स ‘गेर्रार्ड एंड कंपनी’ के कारीगरों ने एलिज़ाबेथ द्वितीय के लिए बनाये इस ताज के आधे हिस्से को अलग कर देना भी संभव किया था।

कोहिनूर आया कहां से?

‘कोहिनूर’ आंध्र के गुंटूर ज़िले के कोल्लूर माइंस से कब निकला, इसका कोई दस्तावेज़ी प्रमाण नहीं है। वारांगल (प्राचीन नाम ओरूगल्लू) में काकतिया राजाओं के खज़ाने में पहले आया, या मालवा के किसी राजा के हाथ लगा यह हीरा? सवाल संतोषजनक सबूतों के अभाव में अनुत्तरित है। बाबरनामा में एक वज़नी हीरे का उल्लेख है। इसे ‘बाबरी डायमंड’ भी कहा गया है। पानीपत की पहली लड़ाई में 21 अप्रैल 1526 को मारे जा चुके इब्राहिम लोदी की मां से बाबर को जो सबसे बेशक़ीमती हीरा हाथ लगा, क्या उसी का नाम सदियों बाद कोहिनूर पड़ा, या कोई और हीरा था? बताया जाता है कि बाबर के कब्ज़े में जो हीरा था, उसका वज़न था 787 कैरेट। उसके कब कितने टुकड़े हुए? यह भी खोज का विषय है। मेरे पास दो किताबें हैं। पहला, पेट्रिक वाइलाॅट द्वारा लिखी ‘डायमंड एंड प्रिसियस स्टोन’ और दूसरी ‘ग्लोरियस हिस्ट्री ऑफ़ कोहिनूर डायमंड’ जिसका प्रकाशन न्यूबुक सोसाइटी आॅफ इंडिया ने 1970 में किया था। 15 रुपये की़मत वाली इस नायाब पुस्तक के लेखक, इतिहासकार एनबी सेन हैं। 17वीं सदी के फ्रांसीसी जवाहरात व्यापारी ज्यों बैपटिस्ट टाविनियर के हवाले से एनबी सेन लिखते हैं कि यह हीरा कृष्णा नदी के तट पर अवस्थित कोल्लूर माइंस से मिला होगा। या फिर पूर्वी गोलकुंडा में एक और हीरे की खान का पता लोगों को चला, जिसका नाम था, गनी। उस खान से शुरू में लोगों को 10 से 40 कैरेट के हीरे मिले, बाद में इनसे कई गुणा वज़नी हीरे हाथ लगते चले गये। ‘ग्लोरियस हिस्ट्री ऑफ़ कोहिनूर डायमंड’ के अनुसार, ‘मीर जुमला उस दौर में औरंगज़ेब के सूबेदार थे। पूर्वी गोलकुंडा के ‘गनी माइंस’ से निकाला गया 900 कैरेट का एक वृहदाकार हीरा उन्होंने मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब को सौंप दिया था।’ दूसरी पुस्तक ‘डायमंड एंड प्रिसियस स्टोन’ में भी फ्रेंच व्यापारी ज्यों बैपटिस्ट टाविनियर का संदर्भ है। इस पुस्तक में इंदौर के होलकर राजा की तस्वीर भी है, जिन्होंने गोलकुंडा से निकले वज़नी हीरे के पेंडेंट पहन रखे हैं। मतलब, मालवा के होलकर राजाओं की लालसा गोलकुंडा के हीरे प्राप्त करने की रही थी। एनबी सेन ‘ग्लोरियस हिस्ट्री ऑफ़ कोहिनूर डायमंड’ के 35वें पेज पर लिखते हैं , ‘अलाउद्दीन खिलजी ने 1306 में मालवा पर आक्रमण किया था। अमीर खु़सरो के हवाले से एनबी सेन बताते हैं कि जो हीरे-जवाहरात मालवा फतह के बाद लूटे गये, उनकी परख के वास्ते ख़ुसरो खानदान के बुज़ुर्ग ख्वाज़ा हाजी (अर्ज़-ए-मामालिक) को खिलजी दरबार में बुलाया गया था। तो क्या मालवा के होलकर राजाओं से हासिल एक हीरा वही था, जिसे बाद में कोहिनूर नाम दिया गया? इतिहास की इन गुत्थियों को सुलझाने की ज़रूरत है।

लेखक ईयू एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक हैं

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