सर्दियों में पश्चिम बंगाल की गलियों और मैदानों में उत्सवों की बहार छा जाती है। पौष मेला, पौष संक्रांति, नबन्ना और टुसू पर्व जैसे लोक उत्सव मौसम के परिवर्तन, फसल कटाई और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े हैं। संगीत, नृत्य, हस्तशिल्प और स्वादिष्ट व्यंजनों से रंगे ये पर्व बंगाल की जीवंत लोकसंस्कृति का अद्वितीय अनुभव कराते हैं।
सर्दी के मौसम में उत्सवों की बहार-सी आ जाती है। फिर बंगाल तो वैसे ही उत्सव-प्रधान राज्य है, ‘जहां बारो मासे तेरो पार्बन’ यानी बारह महीनों में तेरह त्योहार मनाए जाते हैं। पश्चिम बंगाल में सर्दियों के खास लोक उत्सवों में मुख्य हैं— पौष मेला, पौष संक्रांति/पौष पर्व, नबन्ना और टुसू पर्व। ये सभी उत्सव मौसम के परिवर्तन से जुड़े हुए हैं। लोकसंस्कृति के ये उत्सव संगीत, नृत्य, हस्तशिल्प कला और स्वादिष्ट व्यंजनों (खासकर पीठा) की मिठास, स्वाद और सुगंध से भरे होते हैं।
पौष मेला
पश्चिम बंगाल में सर्दियों का मौसम रमणीय पौष मेले के साथ शुरू होता है। बीरभूम जिले के आधुनिक शहर शांतिनिकेतन में मनाया जाने वाला यह मेला बंगाली महीने पौष की सप्तमी तिथि को आयोजित होता है। इस मेले की शुरुआत नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के पिता महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर ने 1894 में नृत्य, संगीत और कला के मनमोहक उत्सव के माध्यम से स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए की थी। यह शांतिनिकेतन के पूर्वपल्ली क्षेत्र में मेला मैदान के नाम से प्रसिद्ध मैदान में आयोजित होता है। 24 से 26 दिसंबर तक चलने वाले इस तीन दिवसीय आयोजन के लिए तैयारियां 2–3 महीने पहले से शुरू हो जाती हैं। इन तीन दिनों के दौरान पूरा शहर जगमगा उठता है। होटल महीनों पहले से बुक हो जाते हैं और उत्सव के समय यहां देश और दुनिया भर से 10,000 से ज़्यादा लोग इकट्ठा होते हैं। राज्य के स्थानीय कारीगरों और नामी ब्रांडों के 1,500 से ज़्यादा स्टॉलों के साथ यह बंगाल का सबसे बड़ा मेला है। इसमें बाउल गायन, लोक संगीत और हस्तशिल्प का अनूठा संगम होता है।
पौष संक्रांति पर्व
यह पर्व मकर संक्रांति के आसपास मनाया जाता है, जिसमें नोलेन गुड़ (ताड़ का गुड़) और पीठा (चावल, नारियल, गुड़ से बनी मिठाइयां) खूब खाई जाती हैं। पौष संक्रांति या पौष पर्व मकर संक्रांति का ही एक रूप है, जो मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश और त्रिपुरा जैसे पूर्वी भारतीय राज्यों में मनाया जाता है। यह फसल कटाई के अंत और नए साल के आगमन का प्रतीक है। इस दिन सूर्य देव की पूजा, पवित्र स्नान और ‘पीठा’ बनाने व खाने की परंपरा होती है, जिसमें तिल और गुड़ का विशेष महत्व है। साथ ही पतंगबाजी और अलाव जलाकर खुशियां मनाई जाती हैं। इसे बंगाली पौष महीने के अंत का प्रतीक माना जाता है। यह मकर संक्रांति के आसपास, आमतौर पर 14 या 15 जनवरी को आती है। इस पर्व पर सूर्य देव और भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन पितरों को तर्पण और पिंडदान करने से मोक्ष मिलता है, ऐसी भी मान्यता है। यहां कई घरों में लक्ष्मी पूजा (धन की देवी) की जाती है, जिसमें नए चावल के दानों का प्रयोग होता है। बंगाल के कुछ क्षेत्रों में छतों पर पतंगें उड़ाई जाती हैं, जिसे ‘शकरेन’ या ‘घुरी उत्सव’ भी कहते हैं।
नबन्ना : नये चावल की दावत
‘नोबो-ओन्नो’ से बना है नबन्ना, जिसका अर्थ है ‘नया अनाज’ या ‘नया चावल’। इस अवसर पर नए धान की फसल (नया चावल) का जश्न मनाया जाता है और ‘नबन्ना’ (नए चावल की दावत) होती है। नबन्ना एक बंगाली फसल उत्सव है, जिसका अर्थ ‘नया चावल’ या ‘नई फसल’ है। यह पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, त्रिपुरा और असम के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। यह नया धान आने पर खुशी, नृत्य और संगीत के साथ मनाया जाने वाला एक पाक-कला संबंधी त्योहार है, जिसमें ‘पीठा’ जैसे पारंपरिक व्यंजन बनते हैं। यह आमतौर पर बंगाली महीने अग्रहायण (नवंबर–दिसंबर) के दौरान आता है, जब धान की कटाई पूरी होती है।
टुसू पर्व : सांस्कृतिक विरासत का उत्सव
टुसू मेला फसल कटाई के मौसम और बंगाल की सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है। आदिवासी परंपराओं का अहम हिस्सा यह त्योहार समृद्धि और खुशी की प्रतीक ब्रह्मांडीय देवी टुसू को समर्पित है। यह एक फसल उत्सव है, जो पौष महीने के अंत में मनाया जाता है। इसमें फसल कटाई और धन से जुड़े टुसू गीत गाए जाते हैं। टुसू पर्व झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में मनाया जाता है। यह प्रकृति और नारी शक्ति के प्रति सम्मान का प्रतीक भी है, जिसमें अविवाहित लड़कियां रंगीन कागज से सजाए गए बांस के फ्रेम ‘टुसू’ बनाकर गीत गाती हैं और अंत में नदी में विसर्जित कर खुशहाली और अच्छी फसल की प्रार्थना करती हैं। यह एक लोक उत्सव है, जो फसल कटाई की खुशी और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। इस दौरान विशेष लोकगीत (पुस गीत) गाए जाते हैं। यह बंगाल के सीमाई क्षेत्रों और झारखंड की संस्कृति व आदिवासी परंपराओं को दर्शाता है।

