तार शहनाई की लगभग विस्मृत होती ध्वनि को साधना और पहचान देने वाले ईसर सिंह नामधारी को उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ां युवा पुरस्कार 2024 के लिए चुना गया। यह सम्मान उनके साथ-साथ पंजाब की एक अनमोल सांगीतिक विरासत के पुनर्जागरण का प्रतीक है।
कुछ वाद्य केवल बजाए नहीं जाते, वे अपने भीतर एक पूरी सांस्कृतिक स्मृति लेकर चलते हैं। उनकी आवाज़ में बीते समय की आहट, मिटती परंपराओं की पीड़ा और बची हुई उम्मीद सुनाई देती है। तार शहनाई ऐसा ही एक वाद्य है—पंजाब की सांगीतिक विरासत का एक लगभग विस्मृत अध्याय। इस वाद्य को अपनी साधना और पहचान बनाने वाले ईसर सिंह नामधारी को संगीत नाटक अकादमी ने वर्ष 2024 के उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ां युवा पुरस्कार के लिए चुना है। यह सम्मान केवल एक युवा कलाकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस ध्वनि की राष्ट्रीय पहचान भी है, जिसे बचाने के लिए वे वर्षों से साधना कर रहे हैं।
ईसर सिंह नामधारी के लिए यह यात्रा किसी सोचे-समझे निर्णय का परिणाम नहीं थी। वे कहते हैं, ‘तार शहनाई को मैंने नहीं चुना, तार शहनाई ने मुझे चुना है।’ श्री भैणी साहिब में जब इस वाद्य की आवाज़ किसी दिशा से सुनाई देती, वे अनायास उसी ओर खिंचे चले जाते। सुनते-सुनते आकर्षण अनुराग बना और अनुराग साधना में बदल गया।
7 अगस्त, 1991 को हरियाणा के करनाल जिले के समाना बाहू में जन्मे ईसर सिंह नामधारी ने नौ वर्ष की उम्र में गायन, दिलरुबा और गुरबाणी कीर्तन की शिक्षा उस्ताद बीबी नरिंदर कौर से शुरू की। श्री भैणी साहिब में उनका सांगीतिक संस्कार आगे विकसित हुआ। 2007 में उन्होंने किरपाल सिंह पानेसर से दिलरुबा और तार शहनाई का प्रशिक्षण लिया। बाद में उस्ताद डॉ. वीरेंद्र कुमार से वाद्य-संगीत की बारीकियां सीखीं। वर्ष 2016 में उस्ताद गुरदेव सिंह ने तार शहनाई में सरोद के बोलों के प्रयोग की एक विशिष्ट शैली से उन्हें परिचित कराया। लेकिन उनकी वादन-यात्रा का निर्णायक मोड़ 2019 में आया, जब उन्हें पद्मश्री डॉ. एन. राजम से तार शहनाई में गायकी सीखने का अवसर मिला।
ईसर सिंह नामधारी इसे अपने जीवन का सबसे बड़ा सांगीतिक परिवर्तन मानते हैं। उनके अनुसार, राजम जी से मिलने से पहले वे तार शहनाई को ‘बजाने’ की कोशिश करते थे, उनके सान्निध्य के बाद उसे ‘गवाने’ की कोशिश शुरू हुई।
डॉ. राजम ने उन्हें समझाया कि संगीत केवल एक सुर से दूसरे सुर तक पहुंच जाना नहीं है। सुरों के बीच का ठहराव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ईसर सिंह कहते हैं, ‘दो सुरों के बीच जो खाली जगह है, असली संगीत वहीं है।’ गायकी अंग की यही दृष्टि उनके वादन में मींड, ठहराव और मानवीय संवेदना लेकर आती है।
ईसर सिंह नामधारी एक और बेहद दिलचस्प बात कहते हैं—‘राजम जी ने मुझे सिखाया कि गज को वहीं रोकना है, जहां गायक सांस लेता है। इससे वाद्य मशीन जैसा नहीं लगता, इंसान जैसा लगता है।’ यही वजह है कि ईसर सिंह तार शहनाई को महज वाद्य नहीं, गाने वाली आवाज़ मानते हैं। उनके शब्दों में, ‘ये गाता है, बजता नहीं है।’ उन्हें इसमें शहनाई की पवित्रता और सारंगी की करुणा एक साथ मिलती है। तार और गज से पैदा होने वाली ध्वनि में उन्हें मानवीय गले की वह कंपकंपी सुनाई देती है, जो किसी गहरे भाव को स्वर देती है।
तार शहनाई उनके लिए पंजाब की स्मृति भी है और गुरमत संगीत की आत्मा भी। वे कहते हैं, ‘मेरे लिए तार शहनाई केवल एक वाद्य यंत्र बिल्कुल नहीं है। ये तीन चीज़ों का एक जीवित संगम है—पंजाब की स्मृति, गुरमत संगीत की आत्मा और मेरी अपनी पहचान।’ उनके अनुसार, इस वाद्य की ध्वनि में पंजाब के खेतों, मेलों और लोककथाओं की मिठास और दर्द दोनों हैं। गुरबाणी के संदर्भ में यह उनके लिए ईश्वर के निकट जाने का माध्यम है। सतगुरु जगजीत सिंह जी ने तार शहनाई को नामधारी परंपरा में जीवित रखने और गुरमत संगीत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ईसर सिंह मानते हैं कि उन्हीं के प्रयासों और कृपा से यह परंपरा उन तक पहुंची और आगे सतगुरु उदय सिंह जी के मार्गदर्शन में उन्हें डॉ. एन. राजम जैसी महान कलाकार से सीखने का अवसर मिला।
उनकी साधना का विस्तार मंचों तक भी हुआ। हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन, सवाई गंधर्व भीमसेन महोत्सव, बनारस और विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा सांस्कृतिक संस्थानों में प्रस्तुतियों के अलावा उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी तार शहनाई बजाई। वर्ष 2015 में नैरोबी में उनका पहला अंतरराष्ट्रीय तार शहनाई एकल कार्यक्रम हुआ। इसके बाद बैंकॉक, सिंगापुर, मलेशिया और इंडोनेशिया में प्रस्तुतियां दीं। वर्ष 2023 में जी-20 शिखर सम्मेलन के अवसर पर नई दिल्ली में भी तार शहनाई वादन किया। 2026 में कुआलालंपुर में भाई मरदाना अंतरराष्ट्रीय संगीत समारोह में इसराज की एकल प्रस्तुति उनकी हाल की उल्लेखनीय प्रस्तुतियों में शामिल है।
उनका संगीत केवल शास्त्रीय मंचों तक सीमित नहीं रहा। अक्षय कुमार और परिणीति चोपड़ा अभिनीत फिल्म ‘केसरी’ में उन्होंने इसराज बजाया। पंजाबी फिल्म ‘जोड़ी’ में तार शहनाई की ध्वनि दी। विभिन्न टेलीविजन कार्यक्रमों, रेडियो और लोकप्रिय पंजाबी गायकों के साथ काम करते हुए उन्होंने यह साबित किया कि दुर्लभ वाद्य भी समय की लोकप्रिय अभिव्यक्तियों से संवाद कर सकता है।
वे कहते हैं, ‘अगर हम सब केवल प्रसिद्ध वाद्यों के पीछे भागेंगे, तो हमारे पुरखों की बनाई ये बारीक, नाजुक ध्वनियां हमेशा के लिए खो जाएंगी। इसे बजाना मेरे लिए रियाज़ नहीं, एक विलुप्त होती भाषा को बचाना है।’ शायद इसी सोच ने उनके पुरस्कार को भी एक अलग अर्थ दिया है।
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ां युवा पुरस्कार की घोषणा की सूचना मिलने का क्षण उन्हें आज भी भावुक कर देता है। सबसे पहले पंडित चेतन जोशी का बधाई संदेश आया। उन्हें समझ नहीं आया कि बधाई किस बात की है। फिर पुरस्कार की सूचना मिली। उस क्षण उन्हें अपने पिता की याद आई, जो सुबह उठाकर रियाज़ करवाते थे। उन्हें अपने गुरु और सतगुरु जगजीत सिंह जी भी याद आए, जिन्होंने इसे लगभग खत्म हो चुके वाद्य को अपने कंधों पर उठाए रखा।
ईसर सिंह नामधारी के लिए पुरस्कार की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यह उनके नाम से आगे जाकर तार शहनाई तक पहुंचता है। वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं, ‘ये पुरस्कार मुझे नहीं, तार शहनाई को मिला है। ये तपस्या और सतगुरु जी की सेवा को मिला है।’
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ां शहनाई के ऐसे साधक थे, जिन्होंने इस वाद्य को भारतीय शास्त्रीय संगीत के सबसे बड़े मंचों पर प्रतिष्ठित किया। उनके नाम का पुरस्कार जब शहनाई के ही एक दुर्लभ तार-रूप के साधक को मिलता है, तो ईसर सिंह को लगता है, ‘जैसे एक बहुत बड़ा सर्कल पूरा हो गया है।’ उनके लिए यह अपनी जीत नहीं, ‘तार शहनाई की भारत के मुख्य मंच पर वापसी’ है। अब उनका सपना है कि इस वाद्य के कुछ ऐसे साधक तैयार हों, जो इसे केवल सीखें नहीं, जिएं। ‘मेरा एक ही सपना है—कि तार शहनाई को अब कभी ‘लगभग विस्मृत वाद्य’ न कहा जाए।’ वे चाहते हैं कि उनके बाद भी श्री भैणी साहिब में सुबह-शाम इसकी आवाज़ गूंजती रहे। उनका विश्वास है—‘साज़ को बचाने का एक ही तरीका है—उसे बांटते जाओ।’
किसी कलाकार की सार्थकता शायद इसी में है कि वह अपनी उपलब्धियों की ऊंचाई से अधिक अपने पीछे छोड़ी गई परंपरा की लंबाई देखे। ईसर सिंह नामधारी उसी अर्थ में महत्वपूर्ण हैं। उनके हाथ में तार शहनाई है, पीछे गुरुओं की दी हुई विरासत और सामने उस ध्वनि को भविष्य तक पहुंचाने की चुनौती। उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ां युवा पुरस्कार उनके सफर का पड़ाव है, मंज़िल नहीं। मंज़िल तब होगी, जब तार शहनाई को सुनकर अगली पीढ़ी पूछेगी नहीं कि यह कौन-सा वाद्य है—बल्कि कहेगी, यह हमारी अपनी आवाज़ है। चित्र लेखक

