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प्रकृति की शांति और आयुर्वेद की शक्ति

केरल की पहचान

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प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली से भरपूर केरल में पर्यटन के साथ आयुर्वेदिक उपचार शरीर, मन और आत्मा को नई ऊर्जा देता है।

केरल की प्राकृतिक सुंदरता, बैकवाटर्स, बहते झरने, समुद्र, हाउसबोट और हरियाली का विस्तार... ये सब उसे एक पसंदीदा टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाते हैं। केरल में कदम रखते ही आपको मन, शरीर और आत्मा का एक अनूठा सामंजस्य महसूस होगा। इस स्थान की भव्यता आपको शांति प्रदान करेगी और आप घाटियों के आकर्षण और आनंद में खो जाएंगे। इसके अलावा आपको जो सुकून और ऊर्जावान बनाए रखती है, वह है आयुर्वेद। आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा पद्धति नहीं है, यह वास्तव में एक विज्ञान और जीवनशैली है।

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आयुर्वेद की उत्पत्ति भारत में लगभग 5000 वर्ष पूर्व हुई थी। केरल में आयुर्वेद सदियों से फलता-फूलता रहा। केरल की जलवायु सुहावनी है और यहां प्राकृतिक जड़ी-बूटियों की प्रचुरता इसे कायाकल्प करने वाली आयुर्वेदिक चिकित्सा का आनंद लेने के लिए सर्वोत्तम स्थान बनाती है। गर्मी की भीषण तपिश में भी, केरल की मिट्टी उपजाऊ बनी रहती है। यहां के पेड़ कटहल, केले, पपीते, काजू और नारियल से लदे रहते हैं। बोगनवेलिया के फूल मूंगा और पीले से लेकर मैजेंटा, जयपुर गुलाबी और बैंगनी रंग तक के रंगों की छटा बिखेरते हुए रास्तों को आकर्षक बनाते हैं। इन सबके साथ आयुर्वेद चिकित्सा इस यात्रा को एक नवीनता प्रदान करती है।

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केरल में आयुर्वेद मुख्य उपचार है। यहां लोग आयुर्वेदिक उपचार में विश्वास रखते हैंै। फिलहाल, केरल ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां आयुर्वेद का पूर्ण समर्पण के साथ पालन किया जाता है। केरल में आयुर्वेदिक पर्यटन केवल उपचार तक ही सीमित नहीं है। यह एक गहन सांस्कृतिक अनुभव भी प्रदान करता है। स्थानीय रीति-रिवाजों की जानकारी से समृद्ध होते हुए, पारंपरिक त्योहारों का हिस्सा बनते हुए, और केरल के व्यंजनों का स्वाद लेते हुए एक सुकून भरी दुनिया में प्रवेश करते हैं। इन व्यंजनों को भी आयुर्वेदिक सिद्धांतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। स्थानीय संस्कृति से जुड़ना समग्र स्वास्थ्य यात्रा को समृद्ध करता है और आयुर्वेद की पद्धतियों और दर्शन से गहरा जुड़ाव प्रदान करता है।

आयुर्वेद, जीवन और दीर्घायु का विज्ञान, विश्व की सबसे प्राचीन स्वास्थ्य प्रणाली है और इसमें चिकित्सा और दर्शन के गहन विचार समाहित हैं। आज, यह चिकित्सा की एक अनूठी शाखा है, एक संपूर्ण प्राकृतिक प्रणाली जो शरीर के दोषों- वात, पित्त और कफ- के निदान पर आधारित है ताकि सही संतुलन प्राप्त किया जा सके।

केरल यात्रा के दौरान पता चला कि अब तक आयुर्वेद में मुख्य ध्यान स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती पर ही रहा करता था, लेकिन इसके फायदे पूरे स्तर तक पहुंचाने के लिए इसके उपचारात्मक पहलू पर भी ध्यान दिया जा रहा है और सौंदर्य प्रसाधन संबंधी पहलू तो हैं ही। आयुर्वेद जीने की कला और विज्ञान, और एक स्वस्थ जीवन जीने का तरीका, दोनों ही प्रदान करती है।

पर्यटकों के लिए केरल में आयुर्वेदिक अस्पताल और रिसॉर्ट्स बनाए गए हैं। वहां सदियों पुरानी परंपरा को अभी तक कायम रखा गया है। और सबसे बढ़कर है इन आयुर्वेदिक केंद्रों का शांत वातावरण। चाहे बैकवॉटर की शांति में हों, समुद्र किनारे लहरों की आवाज़ सुन रहे हों या हिल स्टेशन की ठंडी हवा का आनंद ले रहे हों, हर जगह माहौल इतना सुकून देने वाला होता है, कि उपचार का असर और भी गहरा महसूस होता है।

चाहे पंचकर्म हो, या अभ्यंगम या फिर शिरोधारा, ऐसी अनगिनत पद्धतियां हैं जिनके द्वारा इलाज किया जाता है। पंचकर्म चिकित्सा शरीर के कायाकल्प, शुद्धीकरण और दीर्घायु बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रक्रियाओं का उपयोग करती है। पंचकर्म पांच क्रियाओं से मिलकर बना है, जिनका उपयोग शरीर के ऊतकों से विषाक्त पदार्थों को निकालने के लिए किया जाता है। शिरोधारा का अर्थ है माथे पर गर्म तेल का निरंतर और कोमल प्रवाह। इस चिकित्सा का उद्देश्य तंत्रिका तंत्र को शांत करना, मन को स्थिर करना और गहन विश्राम और आराम की अवस्था को प्रेरित करना है। शिरोधारा सत्र के दौरान, गर्म, जड़ी-बूटियों से युक्त तेल की एक पतली धारा तांबे के बर्तन से माथे पर धीरे-धीरे डाली जाती है, जो आमतौर पर लगभग 50 मिनट तक चलती है।

अभ्यंग एक पारंपरिक आयुर्वेदिक तेल मालिश विधि है जो गर्म तेल से की जाती है। तेल को सिर से लेकर पैरों के तलवों तक पूरे शरीर पर लगाया जाता है। यह रक्त संचार को बेहतर बनाने, रोजमर्रा के शारीरिक तनाव को कम करने और विश्राम को बढ़ावा देने में सहायक होता है। यह हमारे शरीर, मन, त्वचा और रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए अत्यंत लाभकारी है।

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