भारंगम और सारंग महोत्सव, रोहतक में आयोजित एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक उत्सव रहा, जिसने कला, संगीत, रंगमंच और नृत्य के माध्यम से समाज में नवजीवन का संचार किया। यह आयोजन कला प्रेमियों के लिए यादगार अनुभव रहा।
रोहतक शहर की मशीनी जिंदगी और जीवन की उहापोह से निकलकर, कला-प्रेमी संगीत, नृत्य और अभिनय के रंगों में सराबोर हो जाते हैं, ताकि वे कुछ सुकून के पल जी सकें। ‘भारत रंग महोत्सव’ और ‘सारंग’ के अनूठे इन्द्रधनुषी आयोजन ने एक अनुपम सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में अपनी भव्य छाप छोड़ी, जिसकी स्मृतियां दादा लख़्मी चंद सुपवा विश्वविद्यालय के कला प्रांगण में वर्षों तक कायम रहेंगी। कलाप्रेमियों के नगर में आयोजित करके, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने पहली बार एक प्रशंसनीय निर्णय लिया।
विश्वविद्यालय प्रबंधन की बहुमुखी सांस्कृतिक सोच ने एक नए युग की संरचना की है, जो नवांकुरों के लिए उगते सूरज की तरह अनुकरणीय आह्वान करती है। एक ओर सिनेमा की बढ़ती लोकप्रियता तो दूसरी ओर अनेक चैनलों की अनवरत आंधी ने रंगमंच को धीरे-धीरे हाशिए पर खिसका दिया था, लेकिन इसे पुनर्जीवित करने का सार्थक प्रयास राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली ने किया। वहीं महोत्सव को दिल्ली से बाहर देश-विदेश के 44 केंद्रों पर आयोजन करके सार्थक किया गया। रोहतक शहर में यह महोत्सव 9 से 12 फरवरी तक ‘भारंगम’ के 25वें संस्करण और सारंग का संयुक्त प्रयास रहा।
कार्यक्रम के पहले दिन भोजपुरी गायक और सांसद मनोज तिवारी बतौर मुख्य अतिथि मौजूद रहे। सूर्य कवि दादा लख़्मीचंद की मूर्ति पर माल्यार्पण से विधिवत् शुभारंभ किया गया। वहीं हरियाणा के बॉलीवुड अभिनेता यशपाल शर्मा, ओलंपियाड योगेश्वर दत्त, पहलवान संग्राम सिंह, एन.एस.डी. रंगकर्मी विद्यानिधि, डीसी सचिन गुप्ता, सिने-निर्माता अतुल गंगवार सरीखे प्रतिमानों की गरीमामयी उपस्थिति में पहले दिन का रंग और संग उत्कृष्ट बना रहा। मुक्ताकाश मंच पर डी.एल.सी. सुपवा की छात्रा निष्ठा द्वारा ‘वंदे मातरम्’ गीत पर कत्थक शास्त्रीय नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति दी गई। विश्वविद्यालय के छात्र देवेन्द्र परिहार के नेतृत्व में 14 छात्रों द्वारा कर्णप्रिय गीतों से परिसर गूंज उठा। इसी मंच पर प्रस्तुत किए गए मयूरभंज छाऊ और ओडिसी नृत्यों की छटा निराली रही। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक पुरस्कार विजेता, रोहतक के छायाकार अनिल कुमार के छायाचित्रों की प्रदर्शनी ने ध्यान खींचा।
सभागार की सुव्यवस्थित दर्शकदीर्घा और सम्मोहित मंच पर पहले दिन के नाट्य मंचन की शुरुआत डॉ. सच्चिदानंद जोशी द्वारा लिखित, लक्ष्मी रावत द्वारा निर्देशित, प्रज्ञा ग्रुप दिल्ली द्वारा नाटक ‘उम्मीद : मनुष्य ज़िंदा है!’ की प्रभावी प्रस्तुति से हुई। इस नाटक द्वारा 1947 के विभाजन की पीड़ा को मर्मस्पर्शी अंदाज में मंचित किया गया।
दूसरे दिन का प्रारंभ मंच पर संवादों की शृंखला से हुआ, जहां अभिनेता यशपाल शर्मा और जतिन सरना ने कला-परंपरा तकनीकी कौशल, कथ्य, संवाद और अभिनय की बारीकियों पर व्यापक चर्चा की। ऐसी संवाद परिपाटी को देख-सुन आगामी पीढ़ी के युवाओं में रंगमंच और सिनेमा के प्रति सार्थक अभिव्यक्ति और अभिरुचि रही। नाट्य निर्देशक लक्ष्मी रावत ने भी रंगमंच के संदर्भ में विचारों का आदान-प्रदान किया।
वहीं तमिलनाडू की टीम ने नाटक ‘पेन नदई कथू’ महिलाओं की चाल ने नारी जीवन, उसकी व्यथाओं और जीवन संघर्ष को प्रभावी रूप से उकेरा। मंडी हाउस, दिल्ली के संगीत समूह की कर्णप्रिय प्रस्तुति ने आगंतुकों का मन मोह लिया। सायं की सभा भारंगम में नाटक ‘संबल वार’ का मंचन अमृतसर के नाट्य समूह मंच-रंगमंच द्वारा हुआ। इस नाटक का निर्देशन पंजाब संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष केवल धालीवाल द्वारा किया गया था। सुप्रसिद्ध रंगकर्मी केवल धालीवाल रंगमंच की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अब थियेटर को शिक्षा से जोड़ना समय की ज़रूरत है।
भारंगम के तीसरे दिन उपस्थित कलाकारों ने पूरे मनोयोग से अपनी रचनाधर्मिता के प्रभावी आयाम प्रस्तुत किए। विश्वविद्यालय के छात्र अभय सिंह राजपूत ने संगीत की विभिन्न सुरमयी प्रस्तुतियां देकर दर्शकों की वाहवाही बटोरी। डिजाइन विभाग की छात्रा ने शास्त्रीय नृत्य भरतनाट्यम की खूबसूरत प्रस्तुति दी तो अन्य छात्रा अनुष्का ने अपने एकल अभिनय से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। कवि अंकित और ललित ने ‘पैगाम ए मोहब्बत’ काव्य की संगीतमय रचना पेश की। वहीं पूर्व छात्र अजरुद्दीन अपने काव्यात्मक शब्दों से प्रभावित करते रहे। इस दिन की सबसे आकर्षक प्रस्तुति गायक मासूम शर्मा ने दी।
सायंकालीन सत्र में पंजाब के बठिंडा स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग द्वारा प्रस्तुत नाटक ‘उमर का परवाना’ द्वारा एक परिवार के आपसी संबंधों, समर्पण, त्याग और संघर्ष को मंचित किया। इस नाटक में असम, उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा व दिल्ली के अतिरिक्त श्रीलंका के छह कलाकारों ने मिलकर अभिनय को नए आयाम दिए।
भारंगम के अंतिम व चौथे दिन असम के कलाकारों ने शास्त्रीय नृत्य के माध्यम से श्रीकृष्ण के जीवन की लीलाओं को सारंग के मंच पर प्रस्तुत किया। तत्पश्चात संगीत समूह व दिल्ली से आए पार्थ हजारिका ग्रुप द्वारा मनोहारी प्रस्तुति देकर उपस्थित जनसमुदाय को थिरकने पर बाध्य कर दिया। साथ ही युवा कलाकार सुधीर रेखरी के बैंड ने भी मनभावन प्रस्तुति दी।
समापन सत्र में पूर्वांचल की लोकप्रिय गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने नृत्य व अभिनय की पारंपरिक लोक शैली की चित्रमयी व्यंजना करके सबको विस्मित किया।
इस संदर्भ में मालिनी अवस्थी का मानना है कि अभिनय प्रत्येक मानव के मन-मस्तिष्क में जन्मजात बसा होता है। हमारी माताएं, दादी-नानियां ने कभी भी किसी से भी अभिनय नहीं सीखा होता है जबकि वे किसी भी मांगलिक अवसर पर प्रशिक्षित अभिनेताओं से भी अधिक अभिव्यक्ति देती रही हैं। उपस्थित विद्यार्थियों को आह्वान करते हुए कहा कि अपनी नैसर्गिक और पारंपरिक प्रतिभा का अधिकाधिक उपयोग कर स्वयं को प्रभावी कलाकार बनाएं।
अंतिम दिन श्रीलंका के कलाकारों द्वारा सिंहली भाषा में अभिनय का अनूठा मंचन किया। इस नाटक को तीन भागों—प्यार, शादी और संघर्ष की सीमाओं में आबद्ध कर मानव जीवन के प्रेम, कुंठा, निराशा और त्रासदी को व्यंजित करता है। वहीं दूसरे खंड में वही पात्र टूटते संबंधों व अकेलेपन की पीड़ा को व्यक्त करते हैं तो तीसरे परिदृश्य में व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष, अशांति और उससे उपजे कुंठित जीवन को बहुत मार्मिक ढंग से अभिनीत किया गया। नाटक ‘कोलंबा हाथे थोराना’ का कुशल निर्देशन व लेखन डॉ. चमिका ने किया। अपूर्वा थियेटर ग्रुप के मंजे हुए कलाकारों ने एक अविश्वसनीय प्रस्तुति देकर भाषा की बाधा को भी तोड़ा।
आयोजन की सफलता में कलाकारों यशपाल शर्मा, अभिनेत्री सुमित्रा हुड्डा पेडनेकर, मेघना मलिक, जतिन सरना, लोकगायिका मालिनी अवस्थी, मनोज तिवारी, निदेशक अतुल गंगवार तथा हरियाणा प्रदेश के विभिन्न रंगकर्मियों की भूमिका उल्लेखनीय रही।
भारंगम के इस विशिष्ट आयोजन में देश-विदेश के 107 कलाकारों के दलों द्वारा अप्रतिम प्रदर्शनों को दादा लख़्मी चंद सुपवा, रोहतक प्रांगण में सदैव याद किया जाएगा। इस आयोजन की सफलता में विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. अमित आर्य की दूरगामी सोच, कुलसचिव डॉ. गुंजन मलिक का सार्थक सहयोग और विभिन्न विभागों के प्राध्यापकों, गैरशिक्षक कर्मियों, पूर्व छात्रों व विभागीय स्वयंसेवकों का योगदान रहा। (सभी चित्र लेखक)

