श्रीराम भारतीय कला केंद्र की प्रसिद्ध नृत्य नाटिका ‘कृष्ण’ अपनी भव्य प्रस्तुति के साथ एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच चुकी है। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और लीलाओं को नृत्य, संगीत, अभिनय, संवाद और मनमोहक मंच सज्जा के माध्यम से प्रस्तुत करती यह नाटिका दर्शकों को कृष्ण की बाल लीलाओं से लेकर उनके विराट स्वरूप तक की अलौकिक यात्रा कराती है।
श्रीराम भारतीय कला केंद्र, दिल्ली की स्थापना सन् 1952 में हुई। अपनी स्थापना के समय से ही श्रीराम भारतीय कला केंद्र देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रदर्शन कलाओं के विकास में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। इन दिनों संस्थान की प्रसिद्ध नृत्य नाटिका ‘कृष्ण’ अपनी प्रस्तुति के 50वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। ‘कृष्ण’ का मंचन सबसे पहले 1977 में हुआ था। तब से हर साल श्रीराम भारतीय कला केंद्र जन्माष्टमी से एक सप्ताह पूर्व नृत्य नाटिका ‘कृष्ण’ का मंचन शुरू करता है, जो जन्माष्टमी पर संपन्न होता है। इस एक सप्ताह तक चलने वाली कृष्ण लीला को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।
लगभग ढाई घंटे की इस प्रस्तुति में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उनकी लीलाओं का मंचन किया जाता है। यह प्रस्तुति अभिनय, नृत्य, गीत, संगीत, पदों, चौपाइयों, दोहों, भजन व संवाद के माध्यम से दर्शकों के हृदय में उतर जाती है।
29 दृश्यों में कृष्ण लीला का मंचन
नृत्य नाटिका को कुल 29 दृश्यों में प्रस्तुत किया गया है। कृष्ण लीला की शुरुआत मंगलाचरण से होती है, जिसमें सूरदास द्वारा रचित ‘चरण कमल बंदौ हरि राइ’ प्रस्तुत किया जाता है। उसके बाद लीला शुरू होती है भगवान विष्णु की आकाशवाणी से—‘यदा यदा हि धर्मस्य... युगे युगे।’ भगवान विष्णु प्रकट होते हैं और अधर्म के बढ़ने तथा धर्म के पतन की भविष्यवाणी करते हैं।
अगले दृश्य में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म होता है। वासुदेव उन्हें गोकुल में नंद बाबा के घर छोड़कर आते हैं और वहाँ कृष्ण का जन्मोत्सव बहुत हर्ष के साथ मनाया जाता है। अगला दृश्य पूतना के मोक्ष का है। उसके बाद माखन चोरी और भगवान का अपने विराट रूप के दर्शन देना। राधा-कृष्ण की मुलाकात, कालिया मर्दन, गोकुल की होली, गोवर्धन पूजा, महारास, मथुरा गमन, कंस वध, उद्धव संवाद, कृष्ण का द्वारका प्रस्थान, सुदामा चरित, राजसूय यज्ञ, कौरवों-पांडवों के बीच चौपड़ का खेल और कृष्ण का द्रौपदी की रक्षा करने आना, कृष्ण का शांति प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आना, युद्ध का शंखनाद, भगवान श्रीकृष्ण का गीता उपदेश, भीष्म पितामह का अवसान, गुरु द्रोण का वध, कर्ण का वध, दुर्योधन का अंत, गांधारी का कृष्ण को श्राप, कृष्ण का गांधारी को ढाढ़स बंधाना कि जब तक वे हैं, तब तक गांधारी पुत्रहीन नहीं होगी।
साथ ही इस रहस्य को उजागर करना कि युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त होने वाला हर योद्धा उन्हीं का एक अंश था। वे गांधारी को बताते हैं कि अधर्म का नाश करने और धरती पर धर्म की पुनर्स्थापना के लिए वे ही युग-युग में अवतार लेते हैं और अंत में अपने विश्वरूप के दर्शन देते हैं। फिर वही श्लोक बजता है—‘यदा यदा हि धर्मस्य...।’
विश्वरूप के दर्शन
कृष्ण अपना विस्मयकारी, अनंत और विराट स्वरूप प्रकट करते हैं। इस अलौकिक और विहंगम दृश्य में संपूर्ण सृष्टि, जीवन और मृत्यु का चक्र, सब उन्हीं के भीतर समाहित दिखाई देता है। अंत में दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देने वाला दृश्य देर तक आँखों में समाहित रहता है।
सभी कलाकारों का मनमोहक नृत्य एवं अभिनय, वस्त्र विन्यास, मेकअप, संगीत और लाइटिंग इस प्रस्तुति को उच्चकोटि का स्वरूप प्रदान करते हैं।
मेहनत से सजी भव्य प्रस्तुति
करीब चालीस नर्तक-नृत्यांगनाओं से सजी इस सुंदर नृत्य नाटिका का निर्देशन पद्मश्री शोभा दीपक सिंह ने किया। आलेख नीलाभ जी का था। इस नृत्य नाटिका की नृत्य संरचना के मुख्य संरचनाकार शाशिधरण नायर और सहयोगी संरचनाकार एवं रेपर्टरी प्रभारी राज कुमार शर्मा रहे।
संगीत शिव प्रसाद, शैली दत्ता, बरुन गुप्ता और शुभा मुद्गल का था। मंच पर सभी कलाकारों द्वारा पहने गए बेहद खूबसूरत वस्त्र एवं आभूषण शोभा दीपक सिंह, मीनाक्षी एस. दास, मोनिका जटवानी और पुष्पलता कोहली ने डिज़ाइन व तैयार किए। सेट व प्रकाश व्यवस्था मीनाक्षी एस. दास की थी। चित्र लेखिका

