रेड पांडा के ऊपर कई दिशाओं से, कई तरह के संकट मंडराते रहते हैं। जंगलों के सिकुड़ने, बांस के घटने, आवास के टुकड़ों में बंटने, बढ़ते मानवीय दबाव, जलवायु परिवर्तन और फंदों के जरिए होने वाले अवैध शिकार जैसे अनेक खतरे उसके अस्तित्व को प्रभावित कर रहे हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रेड पांडा को संकटग्रस्त प्रजाति के रूप में चिन्हित किया गया है।
हिमालय के घने, नम और धुंध से ढके जंगलों में पेड़ों की शाखाओं के बीच अचानक कोई लाल-भूरा, फूला हुआ जीव दिखाई दे, तो पहली नजर में वह बच्चों की किसी कहानी का पात्र नजर आता है। सफेद निशानों वाला मासूम चेहरा, बड़ी-बड़ी चमकती आंखें और शरीर से भी लंबी, घनी, झबरी पूंछ रेड पांडा को प्रकृति की सबसे खूबसूरत और आकर्षक जीव-रचनाओं में से एक बनाती है। लेकिन यही मासूमियत एक दुखद विडंबना भी पैदा करती है। दुनिया उसे देखकर मुस्कुराती है, उसकी तस्वीरें साझा करती है और उसे ‘क्यूट’ कहती है, मगर उसके अपने जंगलों में एक खामोश संकट लगातार उस पर मंडराता रहता है।
रेड पांडा के ऊपर कई दिशाओं से, कई तरह के संकट मंडराते रहते हैं। जंगलों के सिकुड़ने, बांस के घटने, आवास के टुकड़ों में बंटने, बढ़ते मानवीय दबाव, जलवायु परिवर्तन और फंदों के जरिए होने वाले अवैध शिकार जैसे अनेक खतरे उसके अस्तित्व को प्रभावित कर रहे हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रेड पांडा को संकटग्रस्त प्रजाति के रूप में चिन्हित किया गया है। वर्ल्ड वाइल्ड फंड के अनुसार, दुनियाभर में अब रेड पांडा की संख्या 10 हजार से भी कम रह गई है, हालांकि इनकी वास्तविक संख्या और वितरण का आकलन करना कठिन है।
रेड पांडा की सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसे जीवित रहने के लिए एक विशेष प्रकार के शांत, ठंडे और घने पर्वतीय वन की आवश्यकता होती है। उसके लिए पेड़ सिर्फ रहने की जगह नहीं हैं; शाखाएं उसके रास्ते हैं, ऊंचे पेड़ उसका आश्रय हैं और जंगल उसकी पूरी दुनिया है। उसके भोजन में बांस की महत्वपूर्ण भूमिका है। वह मुख्यतः बांस की पत्तियों और कोमल हिस्सों पर निर्भर रहता है, हालांकि जंगली फल, कीड़े-मकोड़े, अंडे और अन्य छोटे खाद्य पदार्थ भी खाता है। वर्ल्ड वाइल्ड फंड के मुताबिक, रेड पांडा के लगभग आधे आवास पूर्वी हिमालय में स्थित हैं। इस क्षेत्र में जंगलों की कटाई के साथ-साथ सुरक्षित आश्रय देने वाले पेड़ों और बांस की कमी का असर उसकी आबादी पर भी पड़ रहा है। यही कारण है कि रेड पांडा का संकट केवल किसी एक जानवर का संकट नहीं है; यह पूरे पर्वतीय जंगल के स्वास्थ्य का संकट है। जब जंगल कटता है, तो रेड पांडा केवल अपना घर नहीं खोता, बल्कि भोजन, सुरक्षित आवागमन के रास्ते और प्रजनन के लिए जरूरी एकांत भी खो देता है।
कई बार जंगल पूरी तरह खत्म नहीं होते, लेकिन वे छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जाते हैं। यह स्थिति भी रेड पांडा के लिए गंभीर संकट पैदा करती है। जब कोई सड़क पहाड़ को काटकर निकलती है, नया निर्माण होता है, जंगल के किसी हिस्से में कृषि का विस्तार होता है या पर्यटन का दबाव बढ़ता है, तो धीरे-धीरे एक निरंतर जंगल कई छोटे हिस्सों में बदलने लगता है। इससे रेड पांडा के सुरक्षित आवागमन और आवास की स्थिति प्रभावित होती है। पूर्वी हिमालय में विशेष रूप से बढ़ता बुनियादी ढांचा, कृषि का विस्तार और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव एक नाजुक पारिस्थितिक तंत्र पर अतिरिक्त बोझ डाल रहा है। इस क्षेत्र में आवास का नुकसान और जैव-विविधता का विखंडन बड़ी चुनौती बन चुके हैं। रेड पांडा के लिए यह समस्या इसलिए और गंभीर है, क्योंकि वह पेड़ों पर रहने वाला और अत्यधिक मानवीय गतिविधियों वाले वातावरण से बचने वाला जीव है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में किसी मैदानी जीव के लिए तापमान में कुछ डिग्री का बदलाव अपेक्षाकृत मामूली हो सकता है, लेकिन ऐसे जीव के लिए, जो सीमित ऊंचाई और विशेष तापमान वाले जंगलों में रहने का आदी है, यह बदलाव जीवन और अस्तित्व का प्रश्न बन सकता है। सिक्किम जैसे क्षेत्रों में बढ़ते तापमान के कारण भविष्य में रेड पांडा को अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसकना पड़ सकता है। लेकिन सवाल यह है कि उसके लिए वहां पर्याप्त और सुरक्षित जंगल उपलब्ध होंगे या नहीं?
रेड पांडा के सामने संरक्षण से जुड़ी एक और चुनौती है—उसकी लोकप्रियता। दुनिया उसे बहुत प्यार करती है, लेकिन अक्सर दूर से। लोग उसकी तस्वीरें पसंद करते हैं, सोशल मीडिया पर उसके वीडियो देखकर खुश होते हैं और उसके नाम पर उत्सव भी मनाते हैं, लेकिन उसके प्राकृतिक आवास को बचाने की दिशा में अपेक्षित ध्यान नहीं देते। वास्तव में किसी प्रजाति की लोकप्रियता तभी सार्थक होती है, जब वह उसके संरक्षण में भी मददगार बने। अगर हम वाकई रेड पांडा को बचाना चाहते हैं, तो हमें केवल रेड पांडा की तस्वीरों को नहीं, बल्कि उसके जंगल को बचाना होगा। क्योंकि किसी जीव का अस्तित्व उसके शरीर में नहीं, उसके पूरे पारिस्थितिक संसार में सुरक्षित रहता है। इ.रि.सें.

