Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

खिले मन संग तन भी

फूलों से रंगी होली

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

होली एक ऐसा त्योहार है जो रंगों और उल्लास का प्रतीक है, लेकिन प्राचीन काल में यह रंग प्राकृतिक फूलों और जड़ी-बूटियों से बनते थे, जो न केवल त्वचा के लिए सुरक्षित थे, बल्कि शरीर को स्वास्थ्य और ऊर्जा भी प्रदान करते थे। फूलों वाली होली पर्यावरण और मानसिक शांति के लिए भी लाभकारी होती थी।

एक वह भी समय था, जब होली का मतलब रंगों की उन्मुक्त उड़ान नहीं, बल्कि फूलों की खुशबू से भरी एक औषधीय अनुभूति थी। तब हवा में उड़ता हुआ हर रंग किसी जड़ी-बूटी का स्पर्श लिए होता था और त्वचा पर पड़ने वाला हर कण शरीर को स्वस्थ बनाने का एक मौन उपचार होता था। उस समय होली केवल एक उत्सव भर नहीं थी, वह तन के साथ मन का भी विरेचन करती थी।

प्राकृतिक रंग और औषधीय गुण

Advertisement

भारत की प्राचीन परंपरा में होली के रंग पलाश, गुलाब, गेंदा, हल्दी और नीम जैसे फूलों व जड़ी-बूटियों से बनते थे। इनमें सबसे प्रमुख या रंगों का सबसे बड़ा स्रोत पलाश फूल और हल्दी होती थी। पलाश के फूल को आज भी कई जगहों पर होली का फूल ही कहा जाता है। इसके चमकीले केसरिया फूलों को सुखाकर या पानी में उबालकर इसका रंग बनाया जाता था। यह रंग त्वचा को नुकसान पहुंचाना तो छोड़िये अत्यंत लाभ पहुंचाता था। इसी तरह गुलाब की पंखुड़ियों से बना गुलाबी रंग त्वचा को ठंडक देने के साथ-साथ उसे चमकदार भी बनाता था। त्वचा में बहुत गहरे तक नमी बनाये रखता था और गेंदे के फूलों से बना गुलाबी और पीला रंग त्वचा को वो पोषण देता था, जो तमाम सप्लीमेंट भी मिलकर आज नहीं दे पाते। हल्दी का तो कहना ही क्या, वह तो हर बीमारी की औषधि है और शरीर को स्वस्थ व समृद्ध करती है। इस तरह प्राचीनकाल में होली सिर्फ त्योहार नहीं तन के साथ मन का पंचकर्म होती थी।

Advertisement

रासायनिक रंगों का प्रभाव

पहले समय में हवा में उड़ते हुए ये प्राकृतिक रंग वातावरण को भी खुशनुमा बना देते थे और होली के उत्सव को कई गुना ज्यादा बढ़ा देते थे। लेकिन आज के रासायनिक रंगों में होली की पूरी अवधारणा ही बदल दी है। समय के साथ बाजार में सस्ते और चमकीले रासायनिक रंग आए हैं, जिससे होली उल्लास से कहीं ज्यादा बीमारी का सबब बन गई है। इन रासायनिक रंगों से कई तरह की परेशानियां और शारीरिक व्याधियां घेर लेती हैं। इनसे त्वचा में जलन होना, एलर्जी होना और संक्रमण होना आम बात है। आंखों को तो ये करीब-करीब सभी रंग नुकसान पहुंचाते हैं।

फूलों वाली होली की वापसी

आज फिर से सभी बड़े शहरों में उच्च आयवर्ग वाले घरों में फूलों वाली होली लौट रही है। मथुरा और वृंदावन में तो हमेशा से फूलों वाली होली का चलन था, लेकिन पिछले दशकों में यहां भी मिट्टी, कीचड़ और रासायनिक रंगों का बोलबाला हो गया था। अब कई धार्मिक और सांस्कृतिक संगठन मथुरा और वृंदावन से होली के कृत्रिम रंगों को दूर कर रहे हैं। होली आने के कई महीनों पहले से ही यहां विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक रंग फूलों और जड़ी-बूटियों से बनने शुरू हो जाते हैं। ये रंग न केवल यहां उपयोग होते हैं, बल्कि देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में निर्यात भी किए जाते हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी हाल के वर्षों में प्राकृतिक फूलों और जड़ी-बूटियों से रंग बनाकर कमाई का एक नया तरीका उभरा है। इस प्रक्रिया से न सिर्फ पारंपरिक होली की परंपरा को पुनर्जीवित किया जा रहा है, बल्कि यह पर्यावरण की रक्षा और स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहा है। अब फिर से फूलों वाली होली की मजबूत पटकथा लिखी जा रही है, जो एक स्वस्थ और खुशहाल समाज की ओर अग्रसर है।

आज भी प्रासंगिक

फूलों से मनायी जाने वाली होली केवल अतीत की एक सुंदर स्मृतिभर नहीं हैं बल्कि आज के इस बेहद अस्वस्थ माहौल में स्वस्थ होली का एक टिमटिमाता हुआ विकल्प है, जो हमें याद दिलाता है कि होली के उत्सव का आनंद तभी सही से लिया जा सकता है, जब इसके रंग शरीर को नुकसान न पहुंचाकर शरीर में स्वास्थ्य और ऊर्जा में वृद्धि करें और यह तभी संभव है, जब होली में खेले जाने वाले रंग प्राकृतिक फूलों और जड़ी-बूटियों से बनें। जब फूलों के रंगों से होली का धमाल मचता था, तब चेहरे बदरंग नहीं होते थे बल्कि दमक उठते थे। हमारा जीवन स्वास्थ्य और सुगंध से संतुलन हासिल कर लेता था। इसलिए आज फिर से आवश्यकता उसी परंपरा की होली को दोबारा से शुरू करने की है। इ.रि.सें.

Advertisement
×