ग्रेट इंडियन बस्टर्ड या गोडावण भारत का विशाल, उड़ने वाला, संकटग्रस्त पक्षी है, जो घास-भूमि पारिस्थितिकी का संकेत है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड जिसे आम तौर पर भारत में गोडावण पक्षी कहा जाता है। यह भारतीय उपमहाद्वीप की उड़ने वाली सबसे बड़ी पक्षी प्रजातियों में से एक है। कभी इसका भारत के घास के मैदानों और अर्धशुष्क क्षेत्रों में दबदबा हुआ करता था। लेकिन आज गोडावण की गिनती दुनिया के सबसे अधिक संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों में होती है। गोडावण पर विलुप्ति का मंडराता यह संकट केवल इस पक्षी पर संकट नहीं है बल्कि यह भारत के घास-भूमि पारिस्थितिकी के स्वास्थ्य संकट का भी खुलासा है।
यह विशिष्ट पक्षी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड आकार में विशाल, लंबी टांगों वाला, थुलथुल शरीर का स्वामी पक्षी है। एक नर गोडावण का वजन लगभग 12 से 15 किलोग्राम तक होता है। इसका ऊपरी शरीर भूरा, नीचे सफेद तथा सिर पर काला मुकुट जैसा चिन्ह होता है। इसकी उड़ान भारी और सीमित दूरी तक होती है। इसलिए यह पक्षी अधिकतर जमीन पर ही विचरण करता है और यही उसके विलुप्ति के कगार पर पहुंचने की सबसे बड़ी कमजोरी है। शिकारियों द्वारा इसका शिकार बहुत आसानी से कर लिया जाता है। अपनी धीमी उड़ान और बड़े आकार के कारण इसका शिकार करना शिकारियों के लिए आसान होता है।
प्राकृतिक आवास
गोडावण मुख्य रूप से खुले घास के मैदानों, शुष्क मैदानों और अर्ध-रेगिस्तानी इलाकों में पाया जाता है। आज की तारीख में इसका सबसे महत्वपूर्ण गढ़ राजस्थान का डेजर्ट नेशनल पार्क है। आमतौर पर भारत में बंजर भूमि को बेकार और देश के लिए नुकसानदायक माना जाता है। जबकि यह जमीन पारिस्थितिकी के हिसाब से न तो बेकार होती है और न ही कम महत्व की होती है। क्योंकि सिर्फ गोडावण ही नहीं, कई विशिष्ट पक्षी प्रजातियों का यह बंजर भूमि घर होती है। सिर्फ प्रजातियों का ही नहीं, कई जड़ी-बूटियां और प्रकृति को स्वस्थ बनाए रखने वाली वनस्पतियां इस बंजर भूमि में ही उगती हैं, जिनका इस्तेमाल भले इंसान कम करता हो, लेकिन वह जमीन और पारिस्थितिक तंत्र की सेहत सुधारने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
गोडावण एक सर्वाहारी पक्षी है। इसके भोजन में मुख्य रूप से कीट-पतंगे, टिड्डे, भ्रंग, छोटे सरीसर्प, तमाम किस्म के जंगली फल और वनस्पतियों के बीज शामिल हैं। यह खेतों में जाकर कीट नियंत्रण में किसानों का मित्र बनता है और फसलों को अधिक उत्पादक बनाता है।
प्रजनन चक्र
फरवरी से जून माह के बीच का समय इसके प्रजनन का समय होता है। इस समय मादा जमीन पर ही साधारण-सा घोसला बनाकर केवल एक अंडा देती है, जिसके जीवित रहने की संभावना पहले से ही कम होती है। यही कारण है कि इस प्रजाति की जनसंख्या वृद्धि दर बहुत धीमी होती है।
अस्तित्व संकट के कारण
गोडावण के अस्तित्व में संकट का पहला कारण यह है कि इंसान के आधुनिक विकास के तरीकों और जरूरतों के कारण इसके आवास का लगातार खात्मा हो रहा है। आजकल बंजर घास भूमियों को न केवल तेजी से फायदेमंद कृषि के लिए उनका बंजरपन हटाने की मुहिम चल रही है, बल्कि इन जगहों से निकली सड़कों, खनन उद्योग और देशभर में तेजी से बढ़ते ऊर्जा पार्कों के कारण ग्रेट इंडियन बस्टर्ड या गोडावण पक्षी का प्राकृतिक आवास उनसे लगभग छिन गया है।
दूसरा बड़ा कारण इसका भारी शरीर है, जो बिजली की पतली तारों में फंसकर मौत का शिकार हो जाता है, क्योंकि इसे पतली तारें दिखाई नहीं देतीं। वहीं इसका अवैध शिकार है। इसके साथ ही एक बड़ा कारण कम प्रजनन दर और इसकी मौजूदगी वाली जगहों पर लगातार इंसान की बढ़ती आवाजाही है।
संरक्षण की कोशिश
भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें मिलकर इसके संरक्षण की कोशिश कर रही हैं। इसके तहत इसके प्रजनन स्थलों को संरक्षित घोषित किया जा रहा है। इसके साथ ही इसकी कैप्टिव ब्रिडिंग यानी इन्हें कैद में रखकर प्रजनन कराए जाने की कोशिश हो रही है और साथ ही इसके प्राकृतिक आवासों के इर्द-गिर्द रहने वाले लोगों को इसकी संख्या बचाने के लिए संवेदनशील बनाया जा रहा है।
जहां तक इसके महत्व की बात है, तो गोडावण पक्षी घास भूमि पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत माना जाता है। इसके संरक्षण में कई दूसरी प्रजातियां स्वतः सुरक्षित रहती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि यह भारत की प्राकृतिक विरासत का एक अभिन्न हिस्सा है। ऐसे में अगर गोडावण पक्षी विलुप्त हो गया, तो पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाएगा। इ.रि.सें.

