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इतिहास और संस्कृति को जीवंत करता तारागढ़ का किला

समृद्ध धरोहर

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बूंदी, राजस्थान का ऐतिहासिक शहर, तारागढ़ किले और गढ़ पैलेस की शाही धरोहर से समृद्ध है। यहां की वास्तुकला, गणेश मूर्तियां और अद्भुत दृश्य आकर्षित करते हैं।

बूंदी, राजस्थान का राज मुकुट माना जाता है। बूंदी न सिर्फ अपनी ऐतिहासिक विरासतों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यहां की छोटी-छोटी गलियां बताती हैं कि वह संकरी जरूर हैं पर उनका दिल तारागढ़ किले की तरह बड़ा और रोमांचित करने वाला है। राव राजाओं की विरासत तारागढ़ किला और उसमें बना गढ़ पैलेस राजस्थान के दूसरे अन्य किलों से अलग हटकर है।

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शिव परिवार के भक्त राव राजाओं के इस किले में गणेश जी की विस्मयकारी मूर्तियां हैं। कई मूर्तियां तो ऐसी हैं कि समझ ही नहीं पाते। वहां के गाइड या देखरेख करने वाले बताते हैं तो पता चलता है कि हम पार्वती नंदन गणेश जी के दर्शन कर रहे हैं। वास्तव में इस किला परिसर में गणेश जी के साथ ही उनके मुख का प्रतिनिधित्व करने वाले हाथियों के इतने स्टेच्यू हैं कि देखकर अचंभित रह जाते हैं। देश का शायद यह एकमात्र किला है, जिसके प्रवेश द्वार पर हाथी पूरे जोश के साथ अपनी सूंड़ उठाकर आपका स्वागत हाथी पोल पर करते नजर आते हैं। इनकी विशेषता यह भी है कि यह एक ही पत्थर से उकेरे गए हैं। जब आप बूंदी आएं तो यह आपका स्वागत कुछ इस तरह से इस गढ़ में करते हैं मानो कह रहे हों— ‘पधारो म्हारे देश...’।

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बूंदी का यह तारागढ़ किला दूसरे किलों जितना वृहद तो नहीं है, पर इसको देखने के बाद एक ही बात समझ में आती है कि गहरे ढलान से ऊपर आकर जब इस किले में कोई सेना प्रवेश करना चाहेगी तो उसे खुद के साथ ही वास्तुकला की पहेली भी सुलझानी पड़ेगी। राव राजाओं के वंशज राव देवसिंह जी हाड़ा ने इसे 1298 में बनवाना आरंभ किया। फिर करीब दो सौ वर्षों में यह विभिन्न राजाओं द्वारा पूर्णता को प्राप्त हुआ। इस किले में मुग़ल वास्तुकला का प्रभाव बहुत कम है, राजपूत शैली के इस किले की सुंदरता घुमावदार छतों वाले मंडप, नक्काशीदार मंदिर स्तंभों पर हाथियों और विभिन्न पुष्पों से निखर कर आती है। स्थानीय हरे पत्थर से बने इस किले में छतों को जितनी शिद्दत से सजाया गया है, वह दूसरे किलों में देखने को कम ही मिलती है।

अरावली पर्वतमाला की ऊंची पहाड़ी पर से शहर का पूरा नजारा दिखता है और रात को तो यह आकाश में चमकते तारों की तरह का मंजर पेश करता है। तब लगता है कि इसका नाम तारागढ़ का किला ऐसी ही नहीं पड़ा था। किले में हाथी पोल से प्रवेश करने के बाद रतन दौलत में आपको उस सिंहासन को देखने का लाभ भी मिलता है, जिस पर राजाओं द्वारा बैठकर दीवाने आम में जनता की फरियाद सुनी जाती थीं और जब राजाओं की ताजपोशी होती थी तो यह सिंहासन ही काम में लिया जाता था। इसकी संगमरमरी सुंदरता आज भी कायम है। इस किले के गढ़ पैलेस का मुख्य आकर्षण है यहां का बादल महल। जनाना महल के ठीक ऊपर इस महल की दीवारें सुंदर मीनाकारी से सजी चित्रकारी की गवाही देती हैं। एक बात यह भी बताई जाती है कि जब सावन का महीना होता था तो वर्षा की फुहारें तथा बादल इसी महल के स्पर्श के बाद ही अंदर प्रवेश करती थीं। यहां की चित्रशाला देखने के बाद तो मंत्रमुग्ध हो जाएंगे। प्रेम कथाओं, दरबार और दरबारी जुलूस के साथ ही रागों की मालाएं यहां पर रंगीनियत बिखेरती नजर आती हैं।

एक खास चीज वह है झूला चौक। आज भी वह अटका मौजूद है, जिसमें झूला डाला जाता था और रानियां उसमें झूलकर अपना मनोरंजन करती थीं। इस चौक में इतना स्थान है कि रानियों के मनोरंजन के साथ ही उनकी दासियां या अन्य पूरी तरह रम सकें। रानियों के कक्ष आजकल बंद हैं, पर दीवाने आम से होते हुए आप इनकी झलक देख सकते हैं। शाही स्नानघर और पैलेस का फव्वारा इतिहास की गवाही देता है। किले की एक जो विशेषता इसे दूसरों से अलग हटकर रखती है वह है यहां का प्रवेश द्वार। जैसे ही आप किले में प्रवेश करने के लिए मार्ग पर आते हैं तो समाने ही नजर आते हैं वह झरोखे तथा महल के दूसरे हिस्से, जहां से आप राजाओं की ताकत का अंदाज लगा सकते हैं।

कैसे पहुंचें

तारागढ़ फोर्ट की खूबसूरती निहारने के लिए जयपुर तथा कोटा से सीधे आ सकते हैं। जयपुर से यह 218 और कोटा से 42 किलोमीटर दूर है, और अगर आप रणथंभोर आ रहे हैं तो वहां से 147 किलोमीटर की दूरी तय कर आ सकते हैं। सबसे नजदीक हवाई अड्डा जयपुर है और ट्रेन कोटा तथा जयपुर से सीधे संपर्क में है।

नवंबर से लेकर मार्च तक यहां आने के लिए बेहतरीन समय है। उसके बाद चूंकि किला ऊंची पहाड़ी पर है तो आपको तेज गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे सावन-भादो माह में अगर यहां आते हैं तो आपको गढ़ पैलेस में रिमझिम बारिश के साथ बादल महल में रोमांस का भी आनंद आएगा। यहां आकर गाइड जरूर करें, अन्यथा आपको इसके इतिहास के साथ ही उन रंगों की विरासत समझ में नहीं आएगी। चित्र लेखक

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