चांदी के तारकशी जेवरों की रिवायत : The Dainik Tribune

चांदी के तारकशी जेवरों की रिवायत

विरासत का फैशन

चांदी के तारकशी जेवरों की रिवायत

पारुल आनंद

पारुल आनंद

ट्राइबल ज्यूलरी को पसंद करने वाली महिला उपभोक्ताओं का अब एक बड़ा वर्ग मौजूद है। इस किस्म के आभूषण ट्रेंड में आ चुके हैं। बाजार में मांग के चलते इनका निर्माण व कारोबार भी फल-फूल रहा है। भारत में कई राज्यों की अपनी-अपनी ट्राइबल ज्यूलरी है इसलिए इसमें गहनों की बड़ी रेंज है। इस दस्तकारी से हार, बाजूबंद, मेखला, बालियां, मालाएं, कंगन व हेयर पिन आदि प्रॉडक्ट तैयार होते हैं। कुछ धातुओं को गर्म करके गढ़े जाते हैं तो कुछ गलाकर व मोम के सांचों की प्रक्रिया से। इसी कड़ी में शामिल है उड़ीसा की लोकप्रिय ट्राइबल आभूषण कला तारकशी।

खास चाहवान वर्ग

चांदी के तारकशी आभूषण विदेशियों के खास पसंदीदा हैं तो देश में भी इसके चाहवान कम नहीं। इसमें कान , नाक, गले और पैर के गहने बनाये जाते हैं। तारकशी के इस खास डिज़ाइन को फिलीग्री कहते हैं। यह ज्यूलरी चांदी के बहुत बारीक और पतले तारों से बनती है। यूं भी उड़ीसा के शहर कटक को सिल्वर सिटी कहा जाता है। आंध्र प्रदेश के करीमनगर व पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में भी फिलिग्री की हस्तकला से आभूषण व साज-सज्जा उत्पाद बनाये जाते हैं। दरअसल, तारकशी या तारकसी के जेवर बनाने के लिए बहुत ही बारीक काम करना होता है। कारीगर जैसे मीनाकारी करते हैं, वैसे ही काम तारकशी से जेवर बनाने में होता है। वैसे तारकशी का काम मुग़लों के शासन में शुरू हुआ था। इस कला से बर्तन भी बनाये जाते हैं व कई जगह इसका काम लकड़ी पर भी होता है। चांदी की उम्दा तरह की तारों का इस्तेमाल कर मूर्तियां, फ्लॉवर वास, ऐशट्रे, पानदान, बटन, सिग्रेट केस आदि बनाये जाते हैं।

तारकशी जेवर बनते कैसे हैं

फिलीग्री या तारकशी को बनाने के लिए पहले चांदी के बिस्कुट को पिघला दिया जाता है। उसके बाद उस पर औज़ार से महीन कारीगरी की जाती है। इस कारीगरी में महीनों लग जाते हैं। और बहुत ही बारीक चांदी के तार का उपयोग होता है। ज्यूलरी के एक पीस को दो-तीन कारीगर बनाते हैं। उसके बाद उसको धूप में और आग की भट्टी में सेका जाता है। ज़्यादातर यह काम सर्दियों में कर लिया जाता है, क्योंकि उड़ीसा की गर्मी झेलने लायक नहीं होती।

फिलीग्री के आभूषणों के डिजाइन दो तरह के होते हैं : एक ओपन वर्क व दूसरा मेटल आधारित। जाहिर है पहली प्रकार के डिजाइन में कोई दूसरी बैकिंग या आधार नहीं होता है। धातु सूत्र हैवी वायर से बनते हैं जो एक-दूसरी में टांकी गयी होती हैं। ये तंतु पूरे पीस को बांधकर रखते हैं। इसके रोज वर्क, सीको वर्क व जरी का काम ज्यादा मशहूर हैं।

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