प्राणवायु-जीवनदायी पानी धरती पर आने की कहानी

प्राणवायु-जीवनदायी पानी धरती पर आने की कहानी

ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने इस विचार का समर्थन किया है कि हमारे समुद्रों की उत्पत्ति के स्रोत हमारी पृथ्वी से बाहर थे। उन्होंने ‘25143 इतोकावा’ नामक क्षुद्रग्रह से लाए गए नमूनों के सूक्ष्म कणों का अध्ययन किया जो जापानी अंतरिक्ष यान द्वारा लाए गए थे। क्षुद्रग्रह से लाए कणों में पानी का अंश समुचित मात्रा में था। यह पानी संभवतः सूरज से निकलने वाले ऊर्जा कणों (सोलर विंड) द्वारा उत्पन्न किया गया।

मुकुल व्यास

पानी और ऑक्सीजन हमारे जीवन के आधार हैं लेकिन पृथ्वी की उत्पत्ति के समय ये दोनों तत्व बहुत कम मात्रा में उपलब्ध थे। आज पृथ्वी की तीन-चौथाई सतह पर पानी है। हमारे वायुमंडल में ऑक्सीजन का अंश 21 प्रतिशत है। लेकिन हमारी दुनिया को पोषित करने वाले पानी और ऑक्सीजन के स्रोतों पर वैज्ञानिक समुदाय लंबे समय से बहस कर रहा है। यह कोई नहीं जानता कि पृथ्वी पर जल का मूल स्रोत क्या है और ऑक्सीजन का जीवनदायक रूप कब प्रकट हुआ। कुछ शोधकर्ता कहते हैं कि 4.5 अरब वर्ष पहले गैस और धूल के बादल से पृथ्वी की उत्पत्ति होने के समय किसी रूप में कुछ पानी मौजूद था। कुछ वैज्ञानिकों का इससे अलग विचार है। उनका कहना है कि शुरू में पृथ्वी सूखी और जलविहीन थी। हमारे समुद्र काफी समय बाद अस्तित्व में आए। ऐसा उस समय हुआ जब पारलौकिक स्रोतों ने बर्फ और पानी को पृथ्वी पर पहुंचाया। आज हमारी पृथ्वी पर करीब 139 करोड़ घन किलोमीटर पानी का अधिकांश हिस्सा इन्हीं स्रोतों से पृथ्वी पर पहुंचा। अब ब्रिटिश वैज्ञानिकों के एक दल ने इस विचार का समर्थन किया है कि हमारे समुद्रों की उत्पत्ति के स्रोत हमारी पृथ्वी से बाहर थे। उन्होंने ‘25143 इतोकावा’ नामक एक क्षुद्रग्रह से लाए गए नमूनों के सूक्ष्म कणों का अध्ययन किया। ये नमूने एक जापानी अंतरिक्ष यान द्वारा लाए गए थे। इस अध्ययन के बाद ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने कहा कि हमारे समुद्र बाहरी अंतरिक्ष की देन हैं। ग्लास्गो विश्वविद्यालय के शोधकर्ता ल्यूक डेली ने कहा कि हमने जिस धूल का अध्ययन किया,उससे इस बात के ठोस प्रमाण मिलते हैं कि सौरमंडल के दूसरे हिस्सों से आए पानी से हमारे समुद्र बने। इससे पता चलता है कि पृथ्वी पर इस समय मौजूद जल का आधा हिस्सा अंतर-नक्षत्रीय धूल से आया।

डेली और उनके सहयोगियों ने 25143 इतोकावा क्षुद्रग्रह से लाई गई धूल के कणों के अध्ययन के लिए ‘एटम प्रोब टोमोग्राफी’ का प्रयोग किया। पता चला कि क्षुद्रग्रह से लाए कणों में पानी का अंश समुचित मात्रा में था। यह पानी संभवतः सूरज से निकलने वाले ऊर्जा कणों (सोलर विंड) द्वारा उत्पन्न किया गया। इन कणों ने सौरमंडल में विचरने वाले धूल के बादलों में ऑक्सीजन के अणुओं के साथ क्रिया करके पानी के मॉलिक्यूल उत्पन्न किए होंगे। इस तरह ये मॉलिक्यूल सौरमंडल में तैरने वाले बादलों में जमा होते रहे होंगे। सूरज की परिक्रमा करते हुए पृथ्वी ने इन बादलों से धूल कण और उसके पानी को झाड़ दिया होगा। यह पानी आसमान से हमारी पृथ्वी पर गिरता रहा। सूरज का चक्कर लगाने वाले दूसरे पिंडों ने भी जलधारी कणों की सफाई कर दी होगी। पृथ्वी पर ये सिलिकेट के कण बहुत पहले विखंडित हो चुके हैं लेकिन हवारहित इतोकावा क्षुद्रग्रह पर ये कण अरबों वर्षों से सुरक्षित पड़े हैं। जापानी अंतरिक्षयान हायाबूसा ने इन कणों के नमूने एकत्र करके पृथ्वी पर पहुंचाए। विस्तृत विश्लेषण पर इन कणों के अंशों का पता चला। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि इस शोध के नतीजों का यह अर्थ कतई नहीं है कि समुद्रों का सारा पानी सौर धूल कणों से आया। पानी का कुछ हिस्सा पृथ्वी से टकराने वाले क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं में मौजूद बर्फ से भी आया।

आज पृथ्वी के वायुमंडल में 21 प्रतिशत अंश ऑक्सीजन का है। लेकिन हमारे ग्रह को सांस लेने योग्य अवस्था में पहुंचने में काफी समय लगा। करीब 4.6 अरब वर्ष पहले पृथ्वी के इर्दगिर्द गैसों की जो मोटी परत थी,वह ज्वालामुखियों द्वारा उत्सर्जित मीथेन, हाइड्रोजन सल्फाइड और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों से भिन्न नहीं थी। एक तरफ वह उड़नशील पदार्थ उगल रही थी तो दूसरी तरफ उसे खुद अंदरूनी सौरमंडल से निरंतर ठंडी चट्टानों की बमबारी झेलनी पड़ रही थी। इस बमबारी से पृथ्वी को नए-नए पदार्थ मिलते रहे। बड़ी टक्करों से कभी-कभी सतह गर्म होती रही जिससे नमी भाप बन कर उड़ गई और वायुमंडल गर्म बना रहा। दूसरी तरफ, आसमान से नियमित रूप से गिरने वाले खनिजों ने अमोनिया के रूप में समुचित मात्रा में नाइट्रोजन उपलब्ध कराई। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि पृथ्वी के वायुमंडल में ऑक्सीजन कब प्रकट हुई ? इसके बारे में अभी बहुत सी चीजें नहीं जानते। हम यह भी यकीनी तौर पर नहीं बता सकते कि प्रारंभिक खनिज वर्षा के दौरान कितनी नाइट्रोजन पृथ्वी पर पहुंची। लेकिन करीब 4.3 अरब वर्ष पहले हमारे ग्रह की नारकीय परिस्थितियां शांत होने लगीं। ग्रह ठंडा होने लगा और अंतरिक्ष से गिरने वाली शिलाओं में कमी आई। पृथ्वी पर बने जलाशय भू-रासायनिक क्रियाएं आरंभ करने के लिए पर्याप्त थे। ये क्रियाएं जैव-रासायनिक क्रियाओं की शुरुआत थी। इनसे नाइट्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड की वजह से पृथ्वी का वायुमंडल गाढ़ा होने लगा।

ज्वालामुखियों की गतिविधियों से कभी-कभार मामूली ऑक्सीजन निकलती थी लेकिन वह खनिजों के साथ क्रिया कर लेती थी। इस तरह पृथ्वी पहले एक अरब वर्ष तक ऑक्सीजन मुक्त ही रही। लेकिन करीब 2.4 अरब वर्ष पहले ऑक्सीजन का स्तर बहुत बढ़ गया। ऑक्सीजन वृद्धि की इस घटना को ‘ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट’ (जीओई) भी कहा जाता है। भौगोलिक, आइसोटोपिक और रासायनिक प्रमाणों से पता चलता है कि इस इवेंट के दौरान जैविक रूप से उत्पादित मॉलिक्युलर ऑक्सीजन वायुमंडल में जमा होने लगी। जो वायुमंडल ऑक्सीजन से मुक्त था उसमें ऑक्सीजन की भरमार हो गई। वायुमंडल में ऑक्सीजन के स्तर में वृद्धि से उन जीवों पर असर पड़ा जिन्हे जिंदा रहने के लिए इस गैस की जरूरत नहीं थी। ये जीव ‘विषाक्त’ ऑक्सीजन को बर्दाश्त नहीं कर सके व अनेक जीव प्रजातियां विलुप्त हो गईं।

जब तक सूरज की चमक...

क्या कभी पृथ्वी ऑक्सीजन से वंचित हो सकती है? जब तक सूरज चमकता रहेगा, पेड़-पौधे फल-फूलते रहेंगे और प्रकाश संश्लेषण होता रहेगा तब तक हमारे ग्रह के वायुमंडल में हमेशा समुचित मात्रा में ऑक्सीजन बनी रहेगी। करीब एक अरब वर्ष बाद सूरज से आने वाला रेडिएशन इतना प्रबल हो जाएगा कि कार्बन डाइऑक्साइड छिन्न-भिन्न हो जाएगी। इस गैस के बगैर प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया ठप हो जाएगी और वायुमंडल में ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगेगा।

साइनोबैक्टीरिया से बढ़ा ऑक्सीजन का स्तर

समझा जाता है कि साइनोबैक्टीरिया ने प्रकाश-संश्लेषण के जरिए ऑक्सीजन उत्पन्न करके वायुमंडल में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाया। साइनोबैक्टीरिया पानी में पाए जाने बैक्टीरिया हैं जिन्हें नीले-हरे शैवाल भी कहा जाता है। इस तरह इन जीवाणुओं की गतिविधि से पृथ्वी पर 'ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट' (जीओई) की शुरुआत हुई। करीब 60 करोड़ वर्ष पहले वायुमंडल में ऑक्सीजन का स्तर 21 प्रतिशत तक पहुंचा। इतिहास के इस दौर में जीवरूपों में जटिल संरचनाओं की भी शुरुआत हुई। आज पृथ्वी के अधिकांश जीवों का जीवन ऑक्सीजन पर निर्भर है। यह गैस जीवों के विकास में मदद करती है और खाद्य वस्तुओं को ऊर्जा में बदलती है। ऑक्सीजन ही हमारी कोशिकाओं को खाद्य वस्तुओं को ऊर्जा में बदलने में समर्थ बनाती है। पृथ्वी के सिस्टम में ऑक्सीजन के समावेश या उसके ऑक्सीनेशन की प्रक्रिया और जटिल जीवरूपों के उदय के सही-सही क्रम को निर्धारित करना बहुत मुश्किल है। दोनों के बीच रिश्ता बहुत ही जटिल है। सैद्धांतिक तौर पर ऑक्सीजन बहुत ही क्रियाशील तत्व है। मुक्त ऑक्सीजन डीएनए जैसे हमारे नाजुक कार्बनिक मॉलिक्यूल को नुकसान पहुंचा सकती है। इस क्षति से निपटने के लिए हमारे पास कुछ खास एंजाइम होते हैं। शुरू के जीव वायुमंडल में ऑक्सीजन की अधिकता से निपटने के लिए खुद को ढाल नहीं पाए।

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