शीत ऋतु की ठिठुरन से मुक्त होकर जब प्रकृति नई कोंपलों, आम्र बौर और कोयल की मधुर कूक से सज उठती है, तब वसंत के आगमन की अनुभूति होती है। ऋतुराज वसंत केवल मौसम नहीं, बल्कि जीवन में उल्लास, सृजन और नवचेतना का उत्सव है। यह ऋतु मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य को प्रगाढ़ करती है तथा सौंदर्य, स्वास्थ्य और सकारात्मक परिवर्तन का संदेश देती है।
काफी समय से अपने लिए तरसाती सूरज की किरणें अब नहीं ललचातीं हमें। न ही हवा की कंकनाहट डरा रही है। बल्कि इन हवाओं में एक गुलाबी रंगत घुली हुई महसूस हो रही है अब। यह सब वसंत के आने की आहट है।
जो अपने साथ ऋतु परिवर्तन, स्वास्थ्य, सौंदर्य और कई त्योहारों की लड़ियां लिए आता है। ऋतुराज वसंत का स्वागत हर हृदय अपने तरीके से करता है। शीत ऋतु की ठिठुरन से हर मन स्वतंत्र होना चाहता है। आज मन वसंत हो जाना चाहता है और हो भी क्यों न! यह वसंत होता ही इतना सुंदर है।
जिसके आने की शुभ सूचना कोयल कूक-कूक कर आम्र कुंज से पहले ही देने लगती है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति हमें अपने मोहपाश में बांधती चली जाती है।
वसंत जो एक उत्सव है, उल्लास है, नए के आने का—रचनात्मकता व सृजनात्मकता का। वैसे तो हर ऋतु की अपनी खूबसूरती है यहां, लेकिन जब ऋतुओं के राजा वसंत की बात हो, तो सब कुछ आम से खास हो जाता है। सृष्टि महक उठती है।
वसंत आगमन पर इस ऋतु का स्वागत करने की परंपरा भी इसी कड़ी का हिस्सा है। प्रकृति अपना रंग बदल रही होती है, जब पौधों पर नई कोंपलें फूटकर निखर रही होती हैं और जब हवा में संगीत घुलने लगता है, तो वसंत आत्मा तक उतरता हुआ महसूस होता है।
प्रकृति और मन का महापर्व
वसंत प्रकृति और मानव मन के संयुक्त उमंग का महापर्व है। प्रकृति अपने समस्त शृंगार के साथ वसंत का अभिनंदन करती है। आम के बौर, कोयल की कूक से वसंत के आगमन का संदेश प्रसारित होता है। इस संदेश से मानव मन पुलकित व उल्लसित हो उठता है।
क्योंकि ऋतुराज वसंत के आगमन के साथ ही प्रकृति जीवंत एवं चैतन्यमय हो उठती है। प्रकृति कुसुम-कलिकाओं की सुगंध से महक उठती है। वसंत की यह मादक तरंग मनुष्य के रग-रग में आह्लाद और उल्लास की नवस्फूर्ति भर देती है। प्रकृति के इस सुंदर आंगन में मानव नूतन सौंदर्य-बोध को अगणित आकार देता है। इन्हीं सब कारणों से वसंतोत्सव भारत की सर्वाधिक प्राचीन और सशक्त परंपरा रही है।
ऋतुओं में खास वसंत
भारतीय काल-गणना परंपरा में बारहमासे में षड्ऋतुओं अर्थात् छह ऋतुओं का विधान किया गया है। ये छह ऋतुएं हैं—वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत व शिशिर अर्थात् शीत। इन छह ऋतुओं में वसंत की स्थिति अद्भुत व अप्रतिम दिखाई देती है। तीन ऋतुओं में तीन मौसम—शीत, ग्रीष्म और वसंत—स्पष्ट रूप से समाहित दिखाई देते हैं। शीत और ग्रीष्म के मध्य स्थित वसंत ऋतु एक प्रकार की ऋतुसंधि है।
वसंत के आगमन से शीतकालीन जड़ता समाप्त हो जाती है। अब तक ठंड के भय से दुबका मन सक्रिय होने लगता है। प्रकृतिस्थ होकर मानव उल्लसित हो उठता है। मनुष्य के भीतर का यह उल्लास समाज में आह्लादमय उत्सव के रूप में प्रकट होता है।
उपासना और प्रेम का संगम
वसंत के नव परिवेश में मानवीय इच्छाएं, आशाएं एवं कामनाएं अंगड़ाई लेती हैं। प्रकृति-प्रदत्त इन भावों के परिष्कृत व उदात्त रहने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है। अतः वसंत पंचमी पर ज्ञान की देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है, ताकि मानव उत्साह और उल्लास के साथ ही आत्मज्योति को प्रज्वलित कर सके। वह तमस से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ सके। सरस्वती की साधना एवं उपासना वसंत के उल्लास के साथ त्याग, तप और आनंद का परिचायक है। उनकी उपासना-आराधना वैदिक धर्मावलंबियों तक ही सीमित नहीं है; जैन मतावलंबी भी इनकी उपासना करते हैं।
एक-सा दिखता
अगर आप गौर से देखें, तो वसंत की यह छटा किसी एक पहाड़ या एक भूगोल की नहीं है। शायद दुनिया में हर कहीं, अपनी-अपनी भाषा, बोली और अपने-अपने फूलों, पेड़ों में वसंत ऐसे ही आता होगा। तो वसंत को क्यों न उसके इस कोमल और मीठे दर्द से भरे आह्वान के साथ रहने दिया जाए! क्यों न उसमें वीरानी और इंतज़ार के अहसासों को दूर से देखा जाए! वही तो उसके रंग हैं। सचमुच ही वसंत ऋतु प्रकृति का शृंगार है। इस ऋतु में पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आया करता है। जल, थल और नभ में सुंदरता का साज सजता है। चारों ओर आनंद का स्रोत उमड़ता है। यह ऋतु कवियों को प्रेरणा देती है, मानव को नवीन चेतना और पक्षीगण को अपूर्व आनंद प्रदान करती है।
मन प्रफुल्लित छटा
किसानों का मन लहलहाती फसल को देखकर प्रफुल्लित हो जाता है। चारों तरफ सरसों के पीले फूल धरती की सुंदरता को अनुपम बना देते हैं। हमारी संस्कृति में पीला रंग शुभ माना गया है। यह परिपक्वता, उल्लास और आनंद की अनुभूति कराता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार रंगों का हमारे जीवन से गहरा संबंध है। पीले रंग के परिधान हमारे मस्तिष्क के उस भाग को सक्रिय करते हैं, जो हमारी चिंतन-शक्ति का केंद्र है। वसंत ऋतु के लगभग दो महीनों का यह समय संपूर्ण प्राणियों को जीने की नई ऊर्जा प्रदान करता है। हमारे तन-मन को प्रफुल्लित करता है।
ऋतुराज की संज्ञा
सचमुच वसंत नव-जीवन और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक है। शीत ऋतु की कनकनी से जब सृष्टि त्रस्त हो जाती है, तो मन बेसब्री से वसंत के आने की प्रतीक्षा करने लगता है। इसलिए इसे ऋतुराज की संज्ञा भी दी गई है।
इस ऋतु में धरती की उर्वरा शक्ति, यानी उत्पादन क्षमता, अन्य ऋतुओं की अपेक्षा बढ़ जाती है। यही कारण है कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं को ऋतुओं में वसंत कहा है। वे सारे देवताओं और परम शक्तियों में सबसे ऊपर हैं, वैसे ही वसंत ऋतु भी सभी ऋतुओं में श्रेष्ठ है।
इसलिए आवश्यक है जीवन में वसंत का आना। उससे भी अधिक आवश्यक है मन का वसंत हो जाना।

