पान, जिसे ऐतिहासिक दृष्टि से ताम्बूला भी कहते हैं, का उल्लेख प्राचीन संस्कृत व तमिल साहित्य और पांचवीं शताब्दी के कालिदास के लेखन में भी मिलता है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों जैसे चरक संहिता में बताया गया है कि यह पाचन में मदद करता है, श्वांस में ताज़गी लाता है और शरीर के दोषों को संतुलित करता है। कामसूत्र में कहा गया है कि पान चबाने से रोमांस में वृद्धि होती है। इस पृष्ठभूमि में पान का भारतीय संस्कृति का अटूट हिस्सा बनना स्वाभाविक था और वह भी इस हद तक कि प्राचीन व मध्ययुग की हिंदू रियासतों में राजा के हाथों से पान हासिल करना बहुत बड़ा शाही सम्मान माना जाता था। स्वागत व विदाई में पान के पत्तों की संख्या से हैसियत मालूम होती थी— राजा को 32 पान, राजकुमार को 24 पान, ज्ञानी को 12 पान और साधारण व्यक्ति को 4 पान। औपचारिक समारोह में मेज़बान दोनों हाथों से पान पेश करता। दूसरों के सामने पान खाना और उन्हें पेश न करना बदतमीजी में शुमार होता था। प्रतिद्वंद्वी से पान लेने के लिए मजबूर होना अपमान का घूंट पीना था।
मुग़लकाल में पान का सेवन ललित कला के स्तर तक पहुंच गया। चांदी व सोने के पानदान कुलीन जीवन का आवश्यक अंग बन गये। यूरोपीय यात्रियों जैसे थॉमस रो ने लिखा है कि बादशाह जहांगीर के अपने पानदान से पान मिलना ज़बरदस्त राजनयिक सम्मान का प्रतीक था। दिल्ली व लखनऊ के नवाबी दौर में पान शेर-ओ-शायरी, संगीत व तवाइफों की तहज़ीब का हिस्सा बन गया।
ब्रिटिश प्रशासनिक व सेनेटरी दृष्टिकोण के तहत पान को ‘गंदी देशज प्रथा’ के रूप में देखा जाने लगा। छाली व तम्बाकू युक्त पान खाने की आदत को मुंह व गले के कैंसर से जोड़ा जाने लगा। लेकिन इस ‘कोलोनियल कलंक’ के बावजूद पान खाने का सिलसिला जारी रहा, रोजमर्रा के स्ट्रीट फूड के रूप में, खाने के बाद हाजमे के लिए और मेहमाननवाज़ी के तौर पर शादियों, उत्सवों व समारोह में। पहले जहां सिर्फ़ तीन क़िस्म के पान खाए जाते थे—मीठा पान, सादा पान व ज़र्दा पान तो अब चॉकलेट, फ्रूट-फ्लेवर, फायर पान आदि भी आ गये हैं।
दिलचस्प बात यह है कि पान भारतीय पौधा नहीं है। यह इण्डोनेशिया के द्वीपों व मलय प्रायद्वीप से पानी के व्यापारी जहाज़ों के ज़रिये भारत आया। कर्नाटक के बेलूर में चेन्नाकेशव मंदिर, जिसका निर्माण 12वीं शताब्दी में होयसल राजवंश ने कराया था, की बाहरी दीवारों पर एक महिला को पान के पत्ते लिए हुए दर्शाया गया है, जिससे मालूम होता है कि पान को भारत में कितनी जल्दी स्वीकृति मिली और अब कोई हिंदू समारोह इसके बिना पूर्ण नहीं होता है।
तमिल संगम कविता 2,000 वर्ष पुराने संसार को बयान करती है जो पान से परिचित थी। पातिप्पलाई कविता में पुहार के व्यस्त बाज़ारों का वर्णन है, जहां पान के पत्ते बेचे जाते थे। असम में मेहमान को सबसे पहले छालियां या सुपारी पेश की जाती थीं। भूटान में जब भी दो लोग मिलते तो ‘डोमा ज़्हेस’ (कृपया पान व छाली लें) कहते। पटनायक का कहना है, ‘एक पौधा जो समुद्र के रास्ते से दूर के द्वीपों से आया, वेदों में जिसका ज़िक्र नहीं, जो होयसल मंदिरों की दीवारों पर मौजूद है, वह त्रिदेव का प्रतीक बन गया, एक साथ लक्ष्मी व यम का वास बन गया और मानव संबंधों का व्याकरण भी।’ इ.रि.सें.

