पैरेंटिंग

नाजुक वक्त में संयत हो साथ दें अभिभावक

नाजुक वक्त में संयत हो साथ दें अभिभावक

परीक्षा में अभिभावकों की उम्मीदों से तनिक कम नंबर आ जायें तो बड़े स्वीकार नहीं करते। ऐसे में बच्चा अवसाद में जा सकता है। जरूरी है कि ऐसे नाजुक वक्त में माता-पिता बच्चे को संबल दें कि ये केवल एक परीक्षा का रिजल्ट है। उसे प्रेरित करें कि वह कमियां दूर कर बेहतर तैयारी करे। अगली परीक्षा में सफलता पाये।

डॉ. मोनिका शर्मा

परीक्षाओं के नतीजे घोषित होते ही बच्चों के मन की टूटन और कभी-कभी अतिवादी कदम उठा लेने की खबरें भी आने लगती हैं। कोविड काल में ऑनलाइन पढ़ाई और सहज जीवन से कटकर बीते सेशन की उलझनों के बाद अब परीक्षाओं के रिजल्ट आ रहे हैं। ऐसे में अभिभावकों को बेहद सतर्क रहने की दरकार है। दुखद है कि कई बच्चे सिर्फ फेल हो जाने की वजह से नहीं बल्कि अपनी उम्मीदों के मुताबिक़ ऊंचे या बहुत ऊंचे अंक हासिल न कर पाने की वजह से ही अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं। उनके मन को थामने का काम केवल पैरेंट्स ही कर सकते हैं।

उम्मीद हो, बोझ नहीं

परीक्षा परिणामों के समय हमारे घरों में बच्चों को केवल उम्मीद भरी नज़र से ही देखा जाता है। सफलता या असफलता की स्वीकार्यता को लेकर उन्हें मानसिक रूप से तैयार नहीं किया जाता, न ही घर के बड़े सदस्य इसके लिए तैयार होते हैं। बच्चों को यह दिलासा भी नहीं दिया जाता कि अंक चाहे जैसे आएं, हम तुम्हारे साथ हैं। किशोरवय बच्चों के लिए सहयोग और आपसी समझ की यह कमी तकलीफदेह है। तभी तो परीक्षाओं के नतीजे आते ही बच्चों के घर छोड़ने और आत्महत्या करने जैसी ख़बरें सुर्खियां बनने लगती हैं। ऐसे में जरूरी है कि परिणाम आने के समय पर भी बच्चों को संबल दिया जाये। बच्चों को समझाएं कि अगर वे परीक्षा में असफल भी होते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि वे जीवन में असफल हो गए हैं। गुस्सा होने, किसी तुलना करने या ताने-उलाहने देने के बजाय संयत होकर साथ देना ही बड़े होते बच्चों को इस उलझन भरे समय से उबार सकता है। ऐसा तभी संभव है जब आपकी आशाएं उनकी बेहतरी से जुड़ें,पर बोझ न बनें।

नाकामयाबी के दौर में सहजता

हमारे परिवेश में बच्चों को असफल होने के हालात से सामना करना सिखाया ही नहीं जाता। तभी तो परीक्षा परिणाम मन मुताबिक न आएं तो वे अवसाद का शिकार हो जाते हैं। नंबर रेस में थोड़ा पीछे रह जाना भी हमारे यहां एक बड़ी कमजोरी की तरह देखा जाता है। जबकि यह कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है। न ही कोई परीक्षा जिंदगी का आखिरी इम्तिहान होती है। यही वजह है कि बच्चे रिजल्ट आने के समय भी कई चिंताओं से घिरे रहते हैं। यही तनाव कई बार आत्महत्या जैसा कदम उठाने की वजह बन जाता है। भारत में हर चार में से एक किशोर मानसिक अवसाद से पीड़ित है। इसकी वजह पढ़ाई का दबाव और बेहतर नतीजे लाने का तनाव ही है। पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए किशोरों को स्कूल और अभिभावक दोनों का ही दबाव झेलना पड़ता है। कई बार अभिभावकों की अवास्तविक उम्मीदें बच्चों के मन पर जीवन के लिए बोझ भी बन जाती हैं। जब बच्चे इन आशाओं को पूरा नहीं कर पाते तो निराश-हताश महसूस करते हैं। यह असहनीय दबाव उनके जीवन से हार जाने का एक बड़ा कारण बनता है। बच्चों से अपेक्षाएं इतनी ज्यादा है कि कई बच्चे तो नतीजे आने से पहले ही असफल होने डर से आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।

भावनात्मक संबल जरूरी

माहौल को सहज, सहयोगी और संबल देने वाला बनाते हुए अभिभावकों को बच्चों का साथ देना चाहिए। अभिभावकों को समझना होगा कि बच्चों से हर हाल में अव्वल रहने की उम्मीद रखना उन्हें तनाव और अवसाद का शिकार बनाती है। इसीलिए परिणाम आने के समय पर बच्चों को थामना जरूरी है। यह सच है कि अपने बच्चों से जुड़ी अपेक्षाओं के चलते अभिभावकों को अपना सपना भी टूटता दिखता है पर यह समय सपनों के लिए ही नहीं बल्कि बच्चों की सलामती के लिए सोचने का भी होता है। असफलता हिस्से आये या सफलता मिले, जीवन गतिशील रहता है। हर परिस्थिति में अपने बच्चों का हाथ थामे रहना अभिभावकों का दायित्व भी है व समय की दरकार भी। यह संबल बच्चों को हिम्मत देता है। सकारात्मक और सार्थक ज़िंदगी की ओर मुड़ने में सहायक होता है। अभिभावकों का भावनात्मक सहारा हर हाल में बच्चों को अतिवादी कदम उठाने से बचाता है। भावी नागरिकों की ज़िन्दगी सहेज सकता है। इसीलिए अभिभावकों को चाहिए कि इस दौरान अपनी ख्वाहिशों के भार की याद दिलाने के बजाय बच्चों को भावनात्मक संबल देने के मोर्चे पर सबसे ज्यादा ध्यान दें। यूं समझिए कि बच्चों के रिजल्ट का समय बड़ों की परीक्षा का अवसर है।

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