अरावली पर्वतमाला की गोद में बसा माउंट आबू राजस्थान का इकलौता हिल स्टेशन है। ठंडी हवाएं, हरियाली, नक्की झील और मनोरम पहाड़ियां इसे गर्मियों में सुकून का ठिकाना बनाती हैं। पौराणिक महत्व, प्राकृतिक सौंदर्य और रोमांटिक माहौल के कारण यह पर्यटकों और हनीमून कपल्स की पहली पसंद बना हुआ है।
आमिर खान स्टारर सुपरहिट फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ देखी है न? फिल्म में माउंट आबू के चप्पे-चप्पे की खूबसूरती को बारीकी से पेश किया गया था। माउंट आबू इस लिहाज से बेमिसाल है कि यह राजस्थान का इकलौता ठिकाना है, जहां गर्मियों और सर्दियों में बराबर सुहानी हवाएं चलती हैं, जिससे यह साल-भर घूमने लायक बना रहता है। माउंट आबू तमाम हिल स्टेशनों से भी ज़रा हटकर है, क्योंकि यहां ढलाननुमा छतों वाले घर नहीं हैं। गर्मियों में जब समूचा राजस्थान तपता है, तब यही पहाड़ियां ठंडक के झोंकों का अहसास कराती हैं।
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, यहीं गुरु वशिष्ठ ने राजपूतों के चार अग्निकुल वंश स्थापित किए थे। इनसे पहले सूर्यवंशी और चंद्रवंशी नाम के दो ही प्रमुख कुल थे। अग्निकुल के राजपूतों ने ही माउंट आबू को गर्मियां बिताने का अपना सैरगाह बनाया। पीछे-पीछे खास और आम सभी लोग माउंट आबू का रुख करने लगे। धीरे-धीरे यह शहरियों का आराम का ठिकाना बनकर उभरा। हवाओं में रोमांस तैरता है, इसलिए कई हनीमून युगल भी यहां आना पसंद करते हैं। और फिर, माउंट आबू के दिल में बसी झील क्या शानदार है। अरावली पहाड़ों पर इधर-उधर कई एकांत स्थल हैं, जहां डूबते सूरज का नजारा देखते-देखते हाथ में हाथ थामे घंटों टहला जा सकता है।
नक्की लेक का नज़ारा
झील कहलाती है नक्की लेक। माउंट आबू नक्की लेक के इर्द-गिर्द ही बसा है। झील का नामकरण प्राचीन कथा-कहानियों के आधार पर हुआ है। पुराणों में उल्लेख है कि देवताओं ने इस झील को अपने नाखूनों से खोदा था। तभी से इसका नाम पड़ गया नक्की झील। झील में बोटिंग के अलावा आसपास रॉक क्लाइंबिंग का भी अच्छा-खासा इंतजाम है। हालांकि, नक्की लेक पर बोटिंग माउंट आबू के सबसे बड़े आकर्षणों में शुमार है। खासतौर से गर्मियों में नक्की झील के इर्द-गिर्द टहलना खासा सुकून भरा अनुभव है। यूं भी, झील वाले अन्य हिल स्टेशनों के मुकाबले यहां भीड़ काफी कम रहती है, इसलिए यह और बेहतर लगता है।
नक्की लेक पर बोटिंग करने का बेहतरीन समय सुबह-सवेरे ही है। सुबह झील की अदा देखते ही बनती है। ढलते सूरज की लालिमा भरी किरणों के बीच बोटिंग ज़रा कम आनंददायक हो जाती है, क्योंकि तब ज्यादातर पर्यटक उमड़ पड़ते हैं। किश्तियां भी कैसी-कैसी हैं—मोटर बोट हैं, पैडल बोट भी हैं। यही नहीं, हंस की शक्ल की बोट तो बेहद आकर्षक हैं। यादगार फोटो खींचने के लिए यहां क्या-क्या नजारे हैं। बोटिंग करते-करते टॉड रॉक की तरफ, जंगल के नजदीक, परिंदों का कलरव तन-मन को उत्साह से लबरेज कर देता है।
हनीमून प्वाइंट और...
माउंट आबू के बड़े आकर्षणों में एक और है—सनसेट प्वाइंट। यहीं किडीज़ एम्यूजमेंट पार्क भी है, जो खासतौर से बच्चों की दुनिया है। बच्चे साथ हों, तो सनसेट प्वाइंट का रुख कीजिए। अगर विवाह के बाद फैमिली लाइफ शुरू करने वाले हैं, तो हनीमून प्वाइंट भी यहीं है। उधर गुरु शिखर पर चढ़ना भी कम रोमांचक नहीं है। उल्लेखनीय है कि गुरु शिखर अरावली पहाड़ों की सबसे ऊंची चोटी है। यहां से दूर-दूर तक फैले मैदानों, चट्टानों और पहाड़ों को निहारना बेहद मजेदार है। गुरु शिखर पर ही शिवजी का मंदिर भी है। इधर-उधर फैले बीहड़ जंगल वाइल्ड लाइफ के लिए मशहूर हैं, इसलिए अंधेरा ढलने के बाद यहां टहलना खतरे से खाली नहीं बताया जाता।
घूमने-फिरने और देखने लायक एक और जगह है—वाइल्ड लाइफ सेंचुरी। यह 288 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली है और माउंट आबू से ज्यादा दूर नहीं, महज 8 किलोमीटर पर है। परिंदों की निराली दुनिया भी यहां बुलाती-सी लगती है। ढाई सौ से ज्यादा पक्षी हर सुबह यहां-वहां उड़ते दिखाई देते हैं और उनका कर्णप्रिय गान कानों में मधुरता घोलता रहता है। तेंदुआ और चिंकारा ज़रा रेअर हैं, पर कभी-कभार दिख जाते हैं। हालांकि जंगलों में लंगूर कूदते-फांदते हरदम दिखाई देते हैं।
नजदीक ही ब्रिटिश कर्नल ट्रेवर की याद में बना ‘ट्रेवर टैंक’ है। अगर सही वक्त पर यहां आएं, तो ट्रेवर टैंक या ताल में पानी पीते जानवर और पक्षी भी खूब नजर आते हैं। कबूतर, तीतर वगैरह भी आसपास होते हैं। जंगली भालू भी ज़रा-ज़रा दूरी पर दिख ही जाते हैं। पहाड़ों के बीच ताल के इर्द-गिर्द घने जंगल के साए में राष्ट्रीय पक्षी मोर की विविध अदाओं को करीब से देखना मन मोह लेता है।
धर्मस्थल भी खास
माउंट आबू धर्मस्थलों का घर भी है। सबसे भव्य और खास है दिलवाड़ा जैन मंदिर। नक्काशीदार संगमरमर से बने इस मंदिर के कोने-कोने की खूबसूरती बेमिसाल है। रास्ते में ‘दातदा सी वर्ल्ड’ है, जहां खासे लंबे-चौड़े एक्वेरियम देखने का मौका मिलता है। उधर आधार देवी मंदिर के पास कुदरती झरना गौमुख पर बहता है। गौमुख में गाय का सिर बना है। यह वही स्थल है, जहां गुरु वशिष्ठ ने अग्निकुल यज्ञ किया था। गौमुख पर भक्त माथा टेकते हैं और वहीं शिवजी के प्रिय नंदी की प्रतिमा भी है।
माउंट आबू से करीब 8 किलोमीटर दूर अचलगढ़ किला खड़ा है। किले का निर्माण राणा कुंभा ने करवाया था। साथ ही अचलेश्वर मंदिर भी भक्तों की भीड़ खींचता है। किले में मंदाकिनी कुंड है। प्राचीन काल में इसी कुंड से किले को पानी मुहैया होता था। आज इसका जल पावन-पवित्र माना जाता है।
आधार देवी मंदिर में दर्शन करने के लिए 365 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह मां दुर्गा का मंदिर है, जो गुफा रूप में स्थित है। हर सीढ़ी साल के एक दिन का प्रतीक है। यहीं ब्रह्मकुमारी संस्था का मुख्यालय भी है।

