थाली में कुछ ठंडा हो जाये

थाली में कुछ ठंडा हो जाये

पुष्पेश पंत

धधकते सूरज के साथ भारत के कुछ इलाकों की गर्मी कितनी बड़ी यातना होती है, इसे कौन नहीं जानता? आसमान से जब आग बरसती है तो कई इलाके 50 डिग्री तापमान के साथ हॉटस्पॉट बन जाते हैं। यह ऐसा मौसम है जिसके बारे में 17वीं शताब्दी की शुरुआत में हिंदी कवि बिहारी ने टिप्पणी की थी, ‘छांह चाहती छांह’ अर्थात छांह को भी छांह की जरूरत महसूस हो रही है। और हिरण और शेर उस एक ही पोखर से पानी पीते हैं जो तेजी से सूख रहा है, जबकि खूंखार कोबरा उस छाया के नीचे आराम करता है जो उसके शत्रु मोर ने की है। संस्कृत के कवि कालिदास ने अपनी गीत कविता ऋतुसंहार में उन चीजों का वर्णन किया है जो गर्मी से राहत देती हैं। इन छंदों में उल्लिखित चन्द्रमा की किरणें, पानी के ताल और मोती, सुंदर बारामासा लघु चित्रों के लिए प्रेरणा के स्रोत बनते हैं। यानी ऐसी चीजों का जिक्र जिनकी छवि मन-मस्तिष्क में बनती है। आयुर्वेद में कहा गया है कि ग्रीष्म ऋतु वह समय होता है जब प्रकृति हमारे शरीर से ऊर्जा खींचती है। आदान काल से इतर ग्रहण काल-शरद ऋतु, सर्दियों और वसंत में प्रकृति बतौर इनाम हमारे शरीर के लिए उन चीजों की भरपाई करती है जो गर्मी और मानसून के दौरान बाहर निकल गए थे।

चलिए बात गर्मी की करते हैं क्योंकि मौसम उसी का है। आयुर्वेद में तासीर एवं अनुभूति के आधार पर गर्मी के संबंध में रोचक निर्धारण किया गया है- एक तो है बाहरी (ताप) और दूसरा आंतरिक बेचैनी (दाह)। आयुर्वेद में बड़ी सावधानी के साथ ऐसी गर्मी को मात देने के लिए ऐसे नुस्खों का विवरण दिया गया है जो समय की कसौटी पर परखे गये और जिनमें रीहाइड्रेट तत्व हैं। एक समय था जब इस पारंपरिक चीजों का ज्ञान जमीनी स्तर पर घरेलू रसोई में काम करने वाली महिलाओं या पेशेवर कुक को ही था जिन्हें परिवार के चिकित्सकों ने सलाह दी थी कि मौसम के चक्र के साथ व्यंजनों को बदला जाए। चीजें बदल तो गयी हैं और हर बदलाव बेहतरी के लिए हो, यह जरूरी नहीं। देखा जाये तो आधुनिक जीवन शैली ने हमारी भोजन शैली के साथ खिलवाड़ किया है। कुछ नामालूम कारणों से ज्यादातर भारतीय इस बात पर जोर देते हैं कि गर्मी जब चरम पर हो तब भी भोजन गर्म ही परोसा जाना चाहिए। खैर... आइये विभिन्न देशों के भोजन पर एक नजर डालें-

अलग-अलग है प्रचलन

भारत की तरह विश्व के अन्य कई देशों में भीषण गर्मी के दौरान भी गरम-गरम खाने पर जोर नहीं डाला जाता, भीषण ठंड वाले देशों में सर्दी में भी कोल्ड कट का आनंद लिया जाता है। स्मोर्गास्बोर्ड (एक तरह का भोजन) स्कैंडिनेवियाई देशों - स्वीडन, डेनमार्क और नॉर्वे की पाक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा है। यूरोप के ‘कोल्ड टेबल’ में कई तरह का पनीर, ब्रेड और मक्खन भरा होता है जो ज्यादातर मांसाहार के बीच शाकाहारियों को एक विकल्प प्रदान करता है। भूमध्यसागरीय इलाकों में ‘मेजे’ आहार का एक महत्वपूर्ण अंग है। यद्यपि कुछ हॉट डिश (तापमान के हिसाब से) भी हैं, लेकिन ठंडी चीजें ज्यादातर शाकाहारियों के लिए है जिनमें ऑलिव, बैगन, पनीर, टमाटर, शिमला मिर्च और फल जैसे कि अंजीर, अंगूर आदि शामिल होते हैं।

डोलमा : अंगूर के पत्तों में लिपटा चावल ग्रीस में बहुत लोकप्रिय है जबकि तुर्की को अपने ‘बाबा गेनोश’ पर गर्व है जो बिहारी चोखा और दहीवाला बैगन के भर्ते की तरह है-दोनों चीजें खुशनुमा माहौल में परोसी जाती हैं और इनका खूब आनंद लिया जाता है।

यहां अलग वैराइटी : स्पेन की ओर बढ़ेंगे तो वहां मांसाहारी भोजन की प्रचुरता मिलेगी। इनमें ज्यादातर छूने पर ठंडे लगेंगे। किंवदंती है कि जब एक राजा ने अपने सूखते गले को तर करने के लिए एक सराय में प्रवेश किया और मीठी शेरी ली तो बार टेंडर ने इसे ब्रेड की स्लाइस से इसलिए ढककर पेश किया कि कहीं कोई मक्खी उसमें न गिर जाये। अचानक तपस (स्नैक्स का एक प्रकार) ऊपर आ गया, समय बीतने के साथ इस पर एक टुकड़ा रखने का रिवाज बन गया। असल में स्नैक में मौजूद नमक प्यास को बढ़ाता है और उससे ग्राहक ज्यादा ड्रिंक्स का ऑर्डर करता है। आजकल कुछ तपस प्रेमी इसका भोजन बनाते हैं। बेल्जियम में विभिन्न तरह की बीयर को अलग-अलग तरीके से पेश किया जाता है।

जापान का सूशी : जापान में सूशी, पाक कला के रूप में विकसित ठंडा भोजन है। इसे अचार, अदरख, सोया सॉस और सेक (चावल की वाइन) के साथ सर्व किया जाता है। यह गर्मियों के लिए एक हल्का पौष्टिक विकल्प है। शुरुआत में, सूशी केवल उन आला रेस्तरां में उपलब्ध थी, जो जापानियों को शहरों में रहने के लिए खानपान देते थे, जहां इंडो-जापानी संयुक्त उद्यम चालू थे। अब यहां कई भारतीय उद्यमी इसमें देसी तड़का लगाने की कोशिश करने लगे। आजकल, इसे अधिकांश महानगरों और मिनी-महानगरों में एक आकर्षक बॉक्स में टेकअवे के रूप में ऑर्डर किया जा सकता है।

कुछ ठंडा सूप हो जाये...

गैजपाचो एक अनूठे किस्म का ठंडा पेय है। इस शानदार रिफ्रेशिंग ठंडे स्पैनिश सूप को शिमला मिर्च, खीरा और टमाटर से तैयार किया जाता है। इससे मिलती-जुलती सूप ठंडी कोरियन सूप है जिसमें बहुतायत में मूली होती है जिसे नूडल्स या बिना नूडल्स के साथ लिया जाता है। इस कोरियाई सूप में गोभी को भी मिलाकर सर्व किया जाता है। इन चीजों का भारतीयकरण करके ये गर्मियों के बहुत संतुलित भोजन बन सकते हैं। ‘न्यू वर्ल्ड’ के तौर पर हम जिस समाज का उल्लेख करते हैं उसमें कभी भी ठंडे पदार्थों की कमी नहीं हुई है। मैक्सिको में इस तरह के अनेक पदार्थों का प्रयोग शुरू हुआ। हाल के वर्षों में टेक्स-मेक्स व्यंजनों ने भारतीय दिलों में जगह बनाई है फैजिटास और गैजपाचो हमारे लिए अब अजनबी नहीं।

भूख मिटाए सैंडविच : अब बात करते हैं सैंडविच की। खुले या बंद, हमेशा टोस्ट या ग्रिल्ड किए हुए नहीं। गर्मियों में कई लोग लंच पर सूप एवं सलाद लेना पसंद करते हैं और भूख महसूस हुई तो सैंडविच ले लिया। पुरानी दिल्ली में बॉम्बे चटनी सैंडविच, फ्रूट सैंडविच हो या फिर पालक सैंडविच, पनीर टिक्का, कॉर्न सैंडविच आदि कई तरह के सैंडविच मिल जाएंगे जो रूम टेंपरेचर पर सर्व किए जाते हैं। हॉटडॉग से लेकर हैमबर्गर जिसमें हाई टी के दौरान फिंगर सैंडविच भी शामिल है, की उत्पत्ति की अलग रोचक कहानी है। इसी संदर्भ में यहां उल्लेखनीय है कि सैंडविच के भारतीय अवतार पाव वड़ा आज दूर-दूर तक प्रसिद्धि पा चुका है।

कुछ पुरानी बातें

हम बात को आगे बढ़ाएं इससे पहले अपने पाठकों के साथ कुछ ऐसी बातें साझा करना चाहते हैं जो लंबे समय से हमें परेशान करती रही हैं। मसलन, इस उप महाद्वीप में ठंडे व्यंजन विकसित क्यों नहीं हुए? क्या इसलिए कि यहां का मौसम गर्म है और ऐसे मौसम में पका हुआ मीट और सब्जियां तेजी से खराब हो जाती हैं और स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकती हैं? या इसलिए कि बिना पका हुआ भोजन अशुद्ध प्रदूषणकारी माना जाता था? वैसे स्पष्ट कहें तो भारत में अनेक इलाके ऐसे हैं जहां गर्मियों के लिए मजेदार ठंडे भोज्य पदार्थ बनाए जाते हैं।

हमारा हर समय का पसंदीदा भोजन ओडिशा का पकाल है जिसे बंगाल एवं असम में पांथर भात कहा जाता है। पके हुए चावल को रातभर पानी में रखा जाता है ताकि इसमें हल्का खमीर उठ जाये। इसे अगले दिन लंच में अचार, भाजा, भर्ता, बड़ी और पापड़ के साथ सर्व किया जाता है। सभी ठंडे-ठंडे सर्व किए जाते हैं। इस ठंडे लंच के बाद आप लंबे समय तक आराम करने की स्थिति में आ सकते हैं। गरीब लोगों के पकाल को गर्मियों के व्यंजन के तौर पर कुलीन वर्ग ने भी अपनाना शुरू किया। खमीर उठे भोजन की बात करें तो गुजरात का ढोकला, लाचो और खांडवी को गर्म नहीं खाया जाता और यह मुख्य भोजन का रूप नहीं है। महाराष्ट्र में पूड़ी को श्रीखंड या आमरस के साथ रूम टेंपरेचर में परोसा जाता है। डेक्कन के देहात क्षेत्र में थेचा (आंवला, लहसुन, प्याज और मिर्च को कूटकर बनायी गयी चटनी) को ज्वार की रोटी और मल्टीग्रेन थाली के साथ परोसे जाने वाले पूर्ण आहार के तौर पर देखा जाता है।

भात (चावल) के विभिन्न प्रकार : नींबू चावल,

टमाटर चावल और दही चावल - को केले के पत्ते में पैक करके पौष्टिक पैकेट भोजन के रूप में दिया जाता है जिसे किसान अपने साथ खेतों और दूसरे अन्य अपने काम करने की जगह पर ले जाते हैं।

ठंडी दाल : अवध में धुली उड़द की खिलवाड़ दाल और सिकोरे वाली मसूर की दाल ठंडी परोसी जाती है और इसी तरह बिहार एवं उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में चोखा ठंडा ही परोसा जाता है उसके साथ सत्तू एवं दही-चिवड़ा। पूर्वोत्तर में, मछली, सोया बीन्स और बांस के अंकुर भोजन को ठंडे भोजन तौर पर परोसा जाता है। विदेशी कोल्ड रेसिपी के मुकाबले हमारे पास भले ही कुछ खास न हो, लेकिन उसमें नये प्रयोग करने एवं कुछ स्वदेशी मिक्सअप के बाद बहुत लजीज चीजें बनी हैं। शारीरिक जरूरतों, चिकित्सकीय महत्व और तापमान को ध्यान में रखते हुए गर्मी के भोजन में संतुलन बहुत जरूरी है। आखिरकार आलू, टमाटर और अनेक फल हमारे पास दूर विदेशों से आये हैं। थोड़ी सी मेहनत, खर्च और कुछ कल्पनाशीलता के साथ आप पचरी, कचंबर और उपकारी बनाकर बेहतरीन स्वाद ले सकते हैं। कुछ प्रयोग कीजिए और इस गर्मी से आसानी से मुकाबला कीजिए।

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