शीघ्र न्याय से उपभोक्ता अदालतों पर बढ़ा भरोसा : The Dainik Tribune

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शीघ्र न्याय से उपभोक्ता अदालतों पर बढ़ा भरोसा

शीघ्र न्याय से उपभोक्ता अदालतों पर बढ़ा भरोसा

श्रीगोपाल नारसन

'तारीख-पे-तारीख' के मिथक को तोड़ते हुए जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग द्वितीय जोधपुर ने पीड़ित उपभोक्ता को उसके मुकदमा दर्ज कराने की चौथी तारीख पर ही न्याय देकर उपभोक्ता कानून की मूल भावना का सम्मान किया है। जोधपुर जिले के गवाल बेरा, नारवां निवासी गोपाराम और देवाराम ने डिस्कॉम, मंडोर के सहायक अभियंता के विरुद्ध जिला उपभोक्ता आयोग में परिवाद प्रस्तुत कर बताया कि उनकी तरफ से 3 वर्ष पहले आवेदन करने और विभाग द्वारा संपूर्ण राशि जमा करा लेने के बावजूद अभी तक विद्युत कनेक्शन उपलब्ध नहीं करवाया जा रहा है। डिस्कॉम की ओर से अगली तारीख पर जवाब प्रस्तुत किया गया कि दिसंबर, 2019 में ही कनेक्शन के आदेश जारी कर दिए गए थे लेकिन पड़ोसियों की तरफ से बाधा उत्पन्न की गई, जिस वजह से कनेक्शन नहीं किया जा सका। परिवादी ने तर्क दिया कि पुलिस सहायता से भी कनेक्शन को सुचारू किया जा सकता है।

कंपनी की सेवा में कमी

आयोग के अध्यक्ष डॉ़ श्याम सुन्दर लाटा, सदस्य डॉ़ अनुराधा व्यास, आनंद सिंह सोलंकी की बेंच ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद निर्णय में कहा कि विद्युत अधिनियम की धारा 43 के अनुसार, आवेदन करने पर विद्युत कंपनी की तरफ से एक माह के अंदर कनेक्शन दिया जाना आवश्यक है। वहीं पुलिस सहायता लिये जाने की ड्यूटी विभाग की है। आयोग ने कनेक्शन में विलंब के लिए डिस्कॉम को सेवाओं में कमी का दोषी मानते हुए उपभोक्ता को एक माह में कनेक्शन नहीं देने पर 200 रुपए प्रतिदिन हर्जाना अदा करने का आदेश दिया है। इसी प्रकार जिला उपभोक्ता आयोग हरिद्वार ने आईक्यू सुपर स्पेशलिटी आई हॉस्पिटल को चिकित्सा सेवा में लापरवाही के लिए दोषी मानते हुए पीड़ित उपभोक्ता को उपचार खर्च व वाद व्यय के रूप में 27575 रुपये मय 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दिये जाने का फैसला सुनाया है।

ऑपरेशन में लापरवाही मामला

विनीत नगर रुड़की निवासी एसपी वत्स ने 10 नवंबर, 2018 को एक आई हॉस्पिटल की चिकित्सक से उनकी आंख का कोर्निया ऑपरेशन करवाया। लेकिन आपरेशन के बाद आंख में चुभन रहने लगी और दृष्टि कमजोर हो गई। पीड़ित ने किसी अन्य चिकित्सक को दिखाया तो उन्होंने बताया कि ऑपरेशन में लापरवाही के कारण आंख में लैंस पीस रह गया है जिससे आंख में इंफेक्शन हुआ। उनके द्वारा आंख से लैंस पीस तो निकाल दिया गया लेकिन आंख पूरी तरह ठीक नहीं हो पाई। जिला आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपने निर्णय आदेश में चिकित्सक को चिकित्सा सेवा में लापरवाही के लिए दोषी मानते हुए पीड़ित उपभोक्ता को उक्त उपचार में व्यय हुई राशि 17575 रुपये मय 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज व अधिवक्ता शुल्क एवं वाद व्यय के रूप में दस हजार रुपये यानि 27575 रुपये एक माह में अदा करने का आदेश दिया है। इस तरह के अनेक मामलों में उपभोक्ता समयबद्ध न्याय प्राप्त करने में सफल रहे हैं।

विवाद समाधान की सरलीकृत प्रक्रिया

बाजारवाद के इस दौर में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए पहली बार उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम,1986 बनाया था। लेकिन बदलते समय और शिकायतों के निवारण में व्याप्त जटिलता के कारण इस अधिनियम को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के द्वारा बदल दिया गया। नया अधिनियम, अधिक समग्र व कठोर होने के साथ-साथ सरलीकृत विवाद समाधान प्रक्रिया और शिकायतों के ई-फाइलिंग का प्रावधान भी लाया है। अब उपभोक्ता अपनी शिकायत, अपने निकटतम जिला उपभोक्ता आयोग में दर्ज करा सकता है। जबकि पहले शिकायत वहीं दर्ज हो सकती थी जहां विक्रेता या सेवा प्रदाता का कारोबार, कार्यालय होता था। जो न्याय के प्रति सुलभता का प्रमाण है। कुछ विक्रेता और कम्पनियां कई बार लोगों को घटिया गुणवत्ता की वस्तुएं बढ़िया क्वालिटी की बताकर बेच देते हैं यहां तक कि टूटे हुए उत्पाद भी। वहीं तय कीमत से अधिक वसूल लेते हैं और कई बार तो वस्तु की मात्रा भी कम दी जाती है। इस तरह की धोखाधड़ी आये दिन किसी न किसी उपभोक्ता के साथ होती रहती है।

-लेखक राज्य उपभोक्ता आयोग के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।

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