नींद न मुझको आए... : The Dainik Tribune

नींद न मुझको आए...

नींद न मुझको आए...

नींद व्यक्ति के अच्छे स्वास्थ्य के लिए अहम है। हालिया शोधों के मुताबिक, नींद की मात्रा का किसी भी शख्स की उदारता, सेहत व कामकाज से सीधा संबंध है। नींद की कमी भ्रम व कई रोगों का कारण बन सकती है। दरअसल भौतिक तरक्की, टीवी-मोबाइल-इंटरनेट के बेतहाशा उपयोग ने हमारे नींद के कुदरती पैटर्न को बदल दिया जिससे दुनिया की बड़ी आबादी में नींद न आने व नींद उचटने की दिक्कत आ गई। इस लिस्ट में भारत समेत कई एशियाई व अफ्रीकी देश भी हैं। उनींदेपन के कार्य क्षमता पर असर के चलते कई कंपनियां कार्यालयों में कर्मियों के लिए पॉवर नैप के इंतजाम करने लगी हैं व स्लीप के हॉलीडे पैकेज भी मिलने लगे हैं। वहीं कई देशों में काम के दौरान नींद आने पर सजा का प्रावधान है। नींद में दुर्घटनाएं होने का भी खतरा है।

डॉ. संजय वर्मा

जरा सोचिए कि अगर दुनिया में नींद न होती। शायद दिन और रात का जो मौजूदा क्रम कमोबेश पूरे ब्रह्मांड समेत हमारी पृथ्वी पर बना है, नींद उसी की पैदावार हो सकती है। फिर भी अगर हम सोना न जानते तो क्या होता। जैसे हाल तक यह माना जाता था कि मकड़ियां सोती नहीं हैं। पर अब कुछ अध्ययन सामने आए हैं जो बताते हैं कि मकड़ियों का भी एक निद्रा चक्र होता है। ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल अकैडमी ऑफ साइंसेज’ नामक प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित कोंस्टांज और उनके साथियों का एक शोध हाल में प्रकाशित हुआ है, जिसमें दावा किया गया है कि एक वक्त आता है जब काम करते-करते मकड़ियां आंखें झपकने लगती हैं और उनकी टांगें मुड़ने लगती हैं। ऐसे में वे कुछ समय के लिए अपने बनाए जाले में ही झूल जाती हैं। हालांकि मकड़ियों की ऐसी नींद के बारे में रैपिड आई मूवमेंट (आरईएम) नामक गतिविधि का हवाला दिया गया है। तीव्र नेत्र गति या कहें कि नींद जैसी इस स्थिति में दिमाग पूरी तरह निष्क्रिय नहीं होता बल्कि उसके कुछ हिस्से सक्रिय हो जाते हैं। इसे सपने देखने वाली अवस्था बताया गया है। पर सवाल है कि अचानक नींद चर्चा में क्यों है।

इसकी एक नहीं, कई वजहें हैं। इधर एक शोध प्रकाश में आया है जिसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति की दयालुता या उदारता का संबंध इससे नहीं है कि उसके पास कितना पैसा है बल्कि इससे है कि वह व्यक्ति कितनी देर अच्छी नींद ले पाता है। यानी नींद आधी-अधूरी और उखड़ी-उखड़ी तो व्यक्ति भी उखड़ा-उखड़ा। यह दिलचस्प शोध बर्कले विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने किया। उन्होंने निष्कर्ष में पाया कि जब लोग तीन अलग-अलग तरीकों से थके हुए थे तो उनकी दयालुता में फर्क पाया गया। एफएमआरआई इमेजिंग का उपयोग करके प्रतिभागियों के दिमाग की गतिविधि स्तरों का अध्ययन और 171 प्रतिभागियों से ऑनलाइन प्रश्नावली भरवाने के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे कि नींद की कमी से थके हुए लोगों की परोपकारिता उन लोगों के मुकाबले कम थी, जिन्होंने भरपूर नींद ली थी। यही नहीं, अमेरिका में 38 लाख से अधिक धर्मार्थ दान-पुण्य के कार्यों के विश्लेषण में और कोरोना संक्रमण के पहले व बाद के हफ्तों में नींद खोने वाले लोगों की ओर से दान में 10 फीसदी की कमी दर्ज की गई। उदारता में उतार-चढ़ाव से नींद का ज्यादा संबंध सेहत और कामकाज में रुचि से है। सदियों तक इंसान की नींद का जो क्रम था, वह अन्य जीवधारियों जैसा ही था। पौ फटने पर जगना और सांझ ढले सो जाना। लेकिन औद्योगिक क्रांति और बिजली व बल्ब के आविष्कार के बाद मोबाइल-इंटरनेट ने हमारी नींद उचटा दी है। ज्यादा तब्दीली पिछले आठ-दस दशकों में आई है, जब कामकाज की शैलियां बदल गई हैं और लोगों को देर रात काम करना पड़ रहा है। इससे नींद का नया संकट पूरी दुनिया में पैदा हो गया है। लोगों की आंखों की नींद या तो उड़ गई है या फिर उसमें कमी आ गई है। नींद का पैटर्न भी बदल गया है। जैसे-जैसे नींद उचटने लगी है, वैसे-वैसे नींद के जरिए शरीर को मिलने वाले आराम और मानसिक सेहत में भी खलल पड़ा है। विज्ञान के नजरिए से भी नींद की ये समस्याएं मानव सभ्यता के एक बड़े संकट का संकेत हैं। इसलिए इसे नए सिरे से जानने-समझने और इसकी कमी के उपचार के तौर-तरीके खोजे जाने लगे हैं। जैसे, एक तरीका बेंगलुरु की गद्दा बनाने वाली कंपनी ने खोजा है। वेकफिट नामक इस कंपनी ने अपने सभी कर्मचारियों को ईमेल लिखकर ताकीद की है कि वे हर कामकाजी दिन में दफ्तर में काम करते हुए दोपहर 2 से ढाई बजे के बीच पॉवर-नैप ले सकते हैं। तीस मिनट की यह झपकी उनके शरीर के तंतुओं को रिचार्ज कर सकती है। इससे उनका काम में ज्यादा मन लग सकता है- ऐसा कंपनी ने माना है। एक आंकड़ा है कि वर्ष 2008 से अब तक 34 फीसदी अमेरिकी कंपनियां अपने कर्मचारियों को पॉवर-नैप लेने की छूट पहले ही दे चुकी हैं। गूगल और बेन एंड जैरी जैसी कंपनियों ने इसके लिए अपने दफ्तरों में खास कमरों और आंखों को सुकून देने वाले पॉड्स तक का निर्माण करवाया है। लास वेगास स्थित एक ऑनलाइन रिटेल फर्म जैप्पोस ने द टैंक नाम से अपने यहां पॉवर-नैप लेने वाला कमरा बनवाया है। सवाल है कि आखिर नींद लाने को लेकर इतनी जद्दोजहद क्यों। क्या नींद में वास्तव में कोई खलल पड़ गया है जिसे दुरुस्त करने और जिसकी भरपाई की जरूरत है।

बदल गया पैटर्न

सबसे बड़ी मुश्किल यह बताई जा रही है कि इंसान के सोने-जागने का पैटर्न अब वैसा नहीं रहा, जैसा वह औद्योगिकी क्रांति से पहले सदियों तक रहा है। अमेरिका स्थित यूमास मेमोरियल मेडिकल सेंटर के स्लीप डिसऑर्डर सेंटर में कार्यरत एक जाने-माने मनोवैज्ञानिक और लेखक (किताब- से गुडनाइट टू इंसोमनिया) ग्रेग जैकब्स ने नींद के पुरातन और नए तरीकों का आकलन किया और बताया कि आधुनिक जीवनशैली ने इंसान के सोने के सदियों पुराने पैटर्न को बदल दिया है। इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। ग्रेग जैकब्स के मुताबिक युद्ध और किसी आपदा के दौर को छोड़ दिया जाए, तो मानव सभ्यता का इतिहास बताता है कि इंसान ज्यादातर समय शाम ढलते ही पशु-पक्षियों की तरह सो जाता था और सूर्योदय से पहले जाग जाता था। दुनिया के कुछ ग्रामीण अंचलों में सोने और जागने की यह प्रक्रिया अभी भी जारी है। हालांकि गांव-देहात में भी टेलीविजन और इंटरनेट की पहुंच ने असर डाला है। वहां भी लोग अब देर रात तक जागने लगे हैं। लेकिन शहरियों के लिए नींद आधुनिक वक्त की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। नींद पर शोध करने वाले वर्जीनिया (अमेरिका) के एक प्रख्यात इतिहासकार रोजर इकिर्च कहते हैं कि वैसे तो मनुष्य का शरीर 24 घंटे में एक से अधिक बार नींद लेने के हिसाब से बना है लेकिन बढ़ती भागदौड़ और आधुनिक शहरी जीवन ने इस क्रम को काफी ज्यादा छिन्न-भिन्न कर दिया है। देर रात तक ऑफिस में काम करना और घर आकर भी टीवी देखना या मोबाइल में व्यस्त रहना- इन सबने रात वाली नींद में व्यवधान उत्पन्न कर दिया है। इकिर्च के मुताबिक इससे लोगों में एक खास तरह का अनिद्रा का रोग पैदा हो जाता है। इसमें लोगों की रात में कई बार नींद खुलती है और फिर दोबारा सोने में दिक्कत आती है। मुश्किल यह है कि नए जमाने के कामकाज के तौर-तरीकों में पुरातन नींद के लिए न तो जगह बची है और न उसकी भरपाई के ठीक-ठाक विकल्प। ऐसे में कई बार लोगों को सड़क पर दौड़ते वाहन पर बैठे-बैठे या फिर संसद जैसी जगहों पर भी कार्यवाही के बीच नींद आ जाती है। ऐसी घटनाओं के कारण कई बार हादसे हो जाते हैं या फिर संसद में सोता व्यक्ति उपहास का पात्र बनता है। वैज्ञानिक और चिकित्सक कहते हैं कि नींद का हर हाल में सम्मान किया जाए और दिन में कहीं भी आ जाने वाली नींद के कारण पैदा होने वाली समस्याओं के समाधान का प्रयास किया जाए।

नींद की कमी क्या कर सकती है, इसके असंख्य उदाहरण हैं। एक वाकया 1959 का है। तब अमेरिकी डीजे पीटर ट्रिप न्यूयॉर्क के टाइम स्क्वायर से लाइव प्रसारण के लिए लगातार 201 घंटे तक जागते रहे। हालांकि पीटर के रिकॉर्ड को 1964 में एक किशोर रैंडी गार्डनर ने तोड़ दिया था। वह स्कूल के एक प्रोजेक्ट के लिए लगातार 260 घंटे (करीब 11 दिन) तक जागता रहा। पीटर और रैंडी, दोनों के बारे में ये सूचनाएं आईं कि वे नींद की कमी के शिकार हो गए। एक वक्त ऐसा भी आया, जब उन्होंने लोगों से बात करना कम कर दिया। कभी-कभी वे भ्रमित होने लगे। दोनों मतिभ्रम का शिकार हो गए। पीटर के बारे में दावा किया जाता है कि उन्हें ऐसा लगता था कि उनके जूतों में मकड़ी के जाले लग गए हैं या फिर उनकी डेस्क की दराज में आग लग गई है। धीरे-धीरे इलाज की मदद से पीटर और रैंडी अनिद्रा के कारण पैदा समस्याओं से निजात पा गए, लेकिन इन उदाहरणों से और अन्य शोध कार्यों से साबित हुआ कि नींद की दीर्घकालिक कमी तंत्रिका संबंधी स्थायी समस्याएं पैदा कर सकती है। नींद की कमी से इंसान के व्यवहार के ज्यादा पहलुओं पर असर होता है, सोचने और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है। 1988 में एसोसिएशन ऑफ प्रोफेशनल स्लीप सोसाइटीज़ ने स्लीप जर्नल में एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया था कि नींद पूरी नहीं होने से दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है, खास तौर से रोड एक्सिडेंट बढ़ जाते हैं।

दिन में सड़क पर होने वाली कहासुनी और मारपीट की घटनाओं यानी रोडरेज को भी नींद की कमी से पैदा होने वाली समस्या के रूप में देखा जाता है। अमेरिकी स्वास्थ्य जर्नल- न्यूरोलॉजी में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक आज हर 7 में से 1 व्यक्ति स्लीप ड्रंकननेस (नींद से इस कदर बोझिल होना जैसे खूब शराब पी हो) की बीमारी से ग्रसित है। इस तरह की बीमारी में व्यक्ति भ्रम का शिकार हो जाता है और कुछ का कुछ करने लगता है। जैसे यदि घड़ी का अलार्म बजने पर फोन उठाकर बात करने लगता है। अभी तक यह बीमारी बच्चों तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन अब वयस्क भी बड़ी संख्या में इसके शिकार होने लगे हैं। करीब 19 हजार अमेरिकी वयस्कों पर किए एक सैंपल सर्वे के आधार पर तैयार रिपोर्ट में स्टैनफोर्ड स्कूल ऑफ मेडिसिन में निद्रा मनोचिकित्सक डॉ. मौरिस ओहयॉन ने लिखा है कि इस बीमारी से ग्रसित व्यक्ति ऐसा व्यवहार करता है मानो उसे अचानक नींद से जगा दिया गया हो। कई बार तो ऐसे लोगों को यह याद तक नहीं होता कि उन्होंने नींद की ऐसी अवस्था में क्या-क्या कर डाला है। शोध में यह भी पाया गया है कि स्लीप ड्रंकननेस नामक बीमारी से जूझ रहे 70 फीसदी लोगों में निद्रा की कोई न कोई समस्या या मानसिक बीमारी भी अवश्य होती है। भ्रम पैदा करने वाली निद्रा की यह बीमारी कम नींद लेने या अत्यधिक नींद लेने के कारण पैदा होती है। साइंटिस्टों और मनोचिकित्सकों ने चेताया है कि यदि सुरक्षा व यातायात संचालन जैसे पेशों से जुड़े ऐसे लोगों का वक्त पर इलाज न हो तो ये लोग दूसरों की जिंदगी के लिए भी भारी मुसीबत खड़ी कर सकते हैं।

भारत भी अछूता नहीं

वर्ष 2012 में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक के मेडिकल स्कूल के रिसर्चरों ने नींद पर एक व्यापक शोध किया था। इस शोध में पता चला कि भारत जैसे विकासशील देशों के 15 करोड़ लोग नींद से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे हैं। इस शोध ने एक नए ट्रेंड की तरफ इशारा किया था। असल में, पहले माना जाता रहा है कि नींद की कमी और दिमागी चिंता जैसी बीमारियां सिर्फ विकसित समाजों का मर्ज है। लेकिन कई एशियाई और अफ्रीकी मुल्कों में कराए गए इस नए अध्ययन में पता चला कि इन मुल्कों की 16.6 फीसदी आबादी नींद की कमी से होने वाली समस्याओं की चपेट में है। यह आंकड़ा विकसित देशों की नींद संबंधी परेशानियों से पीड़ित 20 फीसदी आबादी के काफी करीब है, इसलिए मुमकिन है कि आने वाले वक्त में विकासशील देश इस मामले में विकसित देशों को पीछे छोड़ दें। नींद की कमी से जूझते भारत, बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि मुल्कों के निवासियों में भी वे मानसिक समस्याएं देखी जाने लगी हैं जो अभी तक खास तौर पर विकसित देशों का मर्ज मानी जाती थीं। अमेरिकी अध्ययन में बांग्लादेश में 43.9 प्रतिशत महिलाओं में निद्रा संबंधी दिक्कतों का आंकड़ा तो काफी बड़ा पाया गया क्योंकि यह विकसित देशों की महिलाओं के मुकाबले दोगुना था। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इंसानों की नींद में कमी का यह एक ग्लोबल ट्रेंड है। चाहे संसद हो, क्लासरूम या फिर घर से दफ्तर और कार्यालय से वापस घर पहुंचाने वाली ट्रेनों-बसों में भारी भीड़ के बावजूद नींद लेने के दृश्य, पूरी दुनिया में एक जैसे हो सकते हैं। भारत में, जहां पिछले दो दशकों में कॉल सेंटरों और बीपीओ सेवाओं ने लाखों-करोड़ों रोजगार पैदा किए हैं, वहां अक्सर रेखांकित किया जाता है कि इन पेशों ने लाखों युवाओं की स्वाभाविक नींद छीन ली है।

पलक झपकी और गई जान

काम के दौरान नींद लेने को वैसे तो अपराध माना जाता है। वाहन चलाते वक्त थकान के कारण नींद आने या मामूली झपकी लेने से बड़ी संख्या में दुर्घटनाएं भी होती हैं, पर कुछ देशों ने इसके लिए गंभीर सजाओं का प्रावधान तक किया है। इसके कुछ उदाहरण भी हैं। जैसे मई, 2015 में उत्तर कोरिया के रक्षामंत्री को एक सरकारी बैठक के दौरान झपकी आ गई, तो वहां के तानाशाह किम जोंग उन ने उस रक्षामंत्री को इस अपराध के लिए एंटी एयरक्राफ्ट गन से उड़ाने का आदेश दे दिया। यह इतिहास का पहला मौका था जब किसी को इसके लिए मौत की सजा दी गई हो। विकसित देशों में भी नींद को लेकर यही ट्रेंड है। मैक्सिको के मोंटरी में वर्ष 2015 में ही एक रेजीडेंट डॉक्टर ड्यूटी पर झपकी लेते दिखाई दीं और किसी ने उनका फोटो सोशल मीडिया पर डाल दिया। फोटो वायरल हुआ, तो पूरे देश में इसे लेकर बहस छिड़ गई। डॉक्टरों को कोसा जाने लगा कि वे ड्यूटी के दौरान नींद कैसे ले सकते हैं। इससे परेशान होकर मैक्सिको के एक अन्य डॉक्टर जुआन कार्लोस ने ट्विटर पर (#मेरी भी आंख लग गई) नाम का हैशटैग बनाया और लिखा कि मेरी भी रेगुलर शिफ्ट में एक से ज्यादा मरीजों का ऑपरेशन करने के बाद आंख लग जाती है, तो क्या यह अपराध है। कार्लोस के हैशटैग को भारी समर्थन मिला और यह साबित करने का प्रयास किया गया कि काम के दौरान नींद आ जाना स्वास्थ्य की निशानी है और इसकी आलोचना करने से बचना चाहिए।

पॉवर नैप के पैकेज

चूंकि चौबीसों घंटे कामकाज की अपेक्षा वाली नौकरियों ने युवा कर्मचारियों की आंखों से नींद छीन ली है। इसलिए देश में नींद के हॉलीडे पैकेज बेचे जाने की शुरुआत हुई है। कुछ कंपनियों और होटलों ने नींद लेने के लिए स्पेशल पैकेज बनाए हैं, जो खासे महंगे हैं पर धीरे-धीरे उन कर्मचारियों को आकर्षित करने लगे हैं जो अपनी नौकरी या कामकाजी जरूरतों के कारण नींद को पूरा वक्त नहीं दे पा रहे हैं। संडे रेस्ट नामक एक स्टार्टअप, ऑफबीट ट्रैक्स और एफसीएम ट्रेवल सॉल्यूशंस जैसी कंपनियों ने लोगों को किसी शांत या पहाड़ी जगह पर सुकून की नींद लेने वाले हॉलीडे पैकेज तैयार किए हैं और उनकी मांग अचानक बढ़ने लगी है। जापान के पॉड होटल की तरह मुंबई के अंधेरी में अर्बन पॉड नामक होटल नींद के पैकेज बेच रहा है। हैदराबाद में ऑफबीट ट्रैक्स के नाम से एक प्रायोगिक स्टार्टअप शुरू किया गया है, उसका मकसद भी नौजवान पीढ़ी को नींद पूरी करने के लिए छुट्टियों पर किसी शांत , पहाड़ी इलाके में भेजना है। इसके लिए ये स्टार्टअप और होटल करीब 14,500 रुपये प्रति रात की फीस लेते हैं। हालांकि कंपनियां कामकाज के दौरान ही कर्मचारियों को जिस तरह पॉवर नैप लेने को प्रेरित कर रही हैं, उसे समस्या का एक अच्छा समाधान माना जाता है। वैज्ञानिक शोधों में भी साबित हो चुका है कि अगर लोग काम के दौरान कुछ देर का पॉवर नैप यानी झपकी ले लें, तो इससे उनकी सक्रियता और काम के प्रति अटेंशन बढ़ जाती है। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स में किए गए एक अध्ययन में यह नतीजा निकाला गया कि काम के दौरान, खास तौर से दोपहर को अगर 20 मिनट की झपकी ले ली जाए, तो उनकी रचनात्मकता और उत्पादकता पर सकारात्मक असर पड़ता है।

सेहत का कनेक्शन

वैज्ञानिकों के मुताबिक, दोपहर में 20 मिनट की नींद डायबिटीज, दिल के रोगों और डिप्रेशन के खतरे को कम करने में मददगार साबित होती है। वैज्ञानिकों का मत है कि दोपहर की नींद व्यक्ति के अच्छे स्वास्थ्य की निशानी होती है। इस शोध के मुख्य लेखक भारतीय मूल के नीरेन रामलखन का कहना है कि दुनिया के कई शहरों में तो लोग रात में औसतन पांच घंटे की नींद ले पा रहे हैं और इसमें भी कहीं-कहीं एक घंटे की कमी पड़ रही है। यह एक खतरनाक ट्रेंड है और इसकी भरपाई दोपहर की पॉवर नैप से ही हो सकती है। पॉवर नैप की उपयोगिता को समझते हुए ही स्पेन के मैड्रिड शहर में पहला नैप बार खुला है। सीएस्ट ऐंड गो नामक इस नैप बार में सोने के लिए बेड, आराम करने और पढ़ाई करने के लिए आर्मचेयर्स और काम करने के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध कराई गई है। नींद के हॉलीडे पैकेज बनाए जाने और पॉवर नैप के इंतजामों से साफ है कि नींद रूपी प्रकृति की सबसे अनोखी और जरूरी नेमत को किसी की नजर लग गई है। उसकी नजर उतारने की जरूरत है।

-लेखक बेनेट यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

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