होली सिर्फ एक रंगों का पर्व नहीं है, बल्कि यह प्रेम, उल्लास और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। भारतीय कला में होली के रंगों का गहरा संबंध है, जिसमें राधा-कृष्ण के चित्र, संगीत, नृत्य और लोककला के माध्यम से रंगों की अनूठी अभिव्यक्ति होती है, जो जीवन को दिव्यता, आनंद, एकता और समृद्धि प्रदान करती है।
होली के मौके पर रंग केवल रंग नहीं होते, वे भावनाओं की अभिव्यक्ति बन जाते हैं। जैसे चित्रकार जब कैनवास पर लाल, पीले, नीले और हरे रंग बिखेरता है, तो वह वही मुक्तानंद व्यक्त करता है, जो होली के दिन आम लोगों की होली की गतिविधियों में अपना व्यवहारिक रूप पाता है। होली हमें सिखाती है कि जीवन एकरंगी नहीं है, बल्कि बहुरंगी है, और कला इसी बहुरंग बोध का फलक रचती है। होली में कला अपनी सम्पूर्ण ऊंचाइयों पर पहुंचती है, जब रंगोत्सव के आनंद में अमीर, गरीब, छोटे और बड़े का भेद मिट जाता है। आज भी होली के मौके पर कला के नाम पर जो चित्र सबसे ज्यादा बिकते हैं, वो राधा-कृष्ण की होली खेलते हुए चित्र होते हैं। नृत्य और लोकगीत में भी प्रेम और समानता का ऐसा जज्बा कहीं देखने को नहीं मिलता, जैसा होली के सरस रंगों में दिखता है। होली का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि इसमें औपचारिकता नहीं होती। हर कोई स्वाभाविक हो जाता है। कला भी तब सबसे सुंदर होती है, जब यह बनावटी न होकर प्राकृतिक रूप में होती है।
जैसे बच्चे बिना नियम के होली के समय रंगों से खेलते हैं, वैसे ही भारत के कई रचनात्मक कलाकार होली के मौके पर अपने भीतर के बच्चे को जीवित रखते हैं। होली के रंग भले कुछ घंटों या दिनों में मिट जाएं, लेकिन उसकी स्मृतियां हमेशा ताजा और बहुरंगी होती हैं। जैसे होली खेलते श्रीकृष्ण की पेंटिंग सदियों से जीवित है, वैसे ही कला के विभिन्न पहलू होली के रंगों को विशिष्ट कैनवास बना लेने के कारण हमारे जीवन के बीहड़ में अपने रंग दिव्यता का पर्व बन जाते हैं। इसलिए होली में रंगों की अपनी मुखर स्मृति हम सबको रंगने में अहम भूमिका निभाती है। होली भारतीय आत्मा के कॉमन और भावनात्मक पक्ष की अभिभूति होती है। भारतीय कला, चाहे वह चित्रकला हो, संगीत हो, नृत्य हो, साहित्य हो, सबमें होली की चटख मौजूदगी है। क्योंकि होली एक पर्वभर नहीं, बल्कि इंसान के भीतर छिपे हुए प्रेम, उल्लास और मुक्ति की जीवंत गाथा है।
भारतीय चित्रकला में होली का विशेष रूप से ध्यान खींचता इतिहास रहा है। राजस्थानी और पहाड़ी शैली की लघुचित्र कला में राधा और कृष्ण के होली खेलते दृश्य केवल रंगों का संयोजन नहीं होते, बल्कि प्रेम, आह्लाद, उन्मुक्तता और विश्रांति के बोध होते हैं। राधा-कृष्ण की होली के चित्र गहरी भक्ति और आध्यात्मिकता के साक्षात्कार रूप माने जाते हैं, और सदियों से न केवल कलाकारों द्वारा चित्रित किए जाते रहे हैं, बल्कि होली के अवसर पर सबसे ज्यादा बिकने वाले भी यही चित्र रहे हैं।
15वीं और 16वीं शताब्दी में भी लोक चित्रकार साल भर राधा-कृष्ण के होली खेलते चित्र बनाते थे, जो होली पर बिक जाते थे। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारतीय कला पर होली पर्व का कितना गहन रिश्ता रहा है। सदियों से लोक कलाकारों के होली पर बनाए गए चित्र उनकी रोजी-रोटी का जरिया रहे हैं। राजस्थानी और पहाड़ी शैली की लघुचित्रकला वास्तव में राधा-कृष्ण की होली खेलने की परंपरा पर आधारित कला शैली है, जिसमें रंगों और दृश्यों से ज्यादा प्रेम और आध्यात्मिकता चित्रित होती है। लाल रंग प्रेम और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, जबकि पीला रंग आस्था और पवित्रता का प्रतीक होता है। ज्यादातर राधा-कृष्ण के होली चित्र पीले और लाल रंगों के अद्भुत संयोजन से बनते हैं।
ब्रज क्षेत्र की होरी, ठुमरी और धमार में होली केवल एक घटना नहीं, बल्कि रंग और संगीत की अनुगूंज होती है। इसलिए आज भी लाखों चित्रकारों ने ‘आज ब्रज में होली रे रसिया’ जैसी पंक्तियों के अनंत आयामों को चित्रित किया है, और इनकी रंग संभावनाओं को समेटने में कलाकार अब तक सफल नहीं हो पाए हैं। 15वीं और 16वीं शताब्दी से लेकर आज तक होली गीतों से होली चित्र सजते रहे हैं। नृत्यकला में भी होली का विशेष स्थान है, विशेषकर कथक और ओडिसी जैसे शास्त्रीय नृत्यों में होली आधारित विभिन्न नृत्य प्रस्तुतियां रंग और कला की उच्चतम कल्पनाओं को दर्शाती हैं। होली के जितने भी भावनात्मक पहलू मन में उठते हैं, कलाकारों ने उन सभी भावों को चित्रमय रूप दिया है।
इसलिए होली महज एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय जीवनशैली के सारे उच्चतम मानकों को निर्धारित करने वाली गतिविधि है। होली का भारतीय कला जगत में उतना ही महत्व है, जितना नृत्य और संगीत का अभिनय जगत में है।
हर साल आने वाली होली भारतीय कला को बार-बार नए आयाम तक पहुंचाती रही है। इसका सबसे भावनात्मक पहलू यह है कि यह इंसान को कला के किसी भी रूप में पूरी मासूमियत के साथ जोड़ती है। रंग कला के साथ भी यही हुआ है। इ.रि.सें.

