जिंदगी से उनकी होने लगी मुलाकात

हरियाणा की जेलों में अनेक बंदी बने रेडियो जॉकी, बदला जीने का अंदाज

जिंदगी से उनकी होने लगी मुलाकात

चित्रांकन : संदीप जोशी

जीवन की स्याह-सफेद चादर पर कल्पनाओं के ‘कुछ रंग’ बिखेरने के लिए सही ‘कूची’ मिल जाये तो उदास माहौल में भी रंगत आ ही जाती है। ऐसा ही हुआ है हरियाणा की जेलों में। एक साल पहले आज ही के दिन यानी 16 जनवरी को पानीपत की जेल से इसकी शुरुआत हुई। कैदियों को आरजे बनने का मौका मिला तो उनकी जिंदगी बदल गयी और साथ ही बदल गया जीने का अंदाज। इस बदले अंदाज में अपने हुनर का ‘तिनका-तिनका’ समेटकर अब अनेक कैदी कल्पनाओं के फलक पर सपनों की ऊंची उड़ान भरते हैं और देखने लगते हैं अपने अंदर का ‘अच्छा इंसान।’

केवल तिवारी

उनमें विनम्रता आ रही है। उनके कंठ से मधुर सुर फूट रहे हैं। वह बोल रहे हैं तो फरमाइशों का अंबार लग रहा है। इस बदले अंदाज से उनके प्रति नजरिया बदल रहा है। इसीलिए तो उनका मन भी ‘अच्छा इंसान’ बनने को डोल उठा है। डोलेगा क्यों नहीं, उनके हुनर को मंच जो मिल रहा है। इससे पहले तो अनेक सालों से वे इस बात से अनजान थे कि इन दीवारों के बाहर हो क्या रहा है। लेकिन अब उनकी आवाज उनके अपनों तक पहुंच रही है। इसी से उनको अपनापन मिल रहा है। वे यहां क्यों आये?, इसकी चर्चा लंबी हो सकती है। फिलवक्त तो चर्चा इस पर हो रही है कि यहां से निकलने की राह जब भी बनेगी उनके हुनर को पंख लगे होंगे और वे उड़ेंगे अपनी कल्पना के आकाश में। यहां से निकलने के बाद अच्छे इंसान बनेंगे। नहीं निकलने की सूरत में औरों के लिए नजीर बनेंगे। जी हां, ये कैदी हैं। अपराधी का ‘टैग’ लगा है इन पर। कोई सजायाफ्ता है और कोई ‘अंडर ट्रायल।’ उनमें परिवर्तन इसलिए आया है कि उन्हें संस्था ‘तिनका-तिनका’ के मार्फत रेडियो जॉकी (आरजे) बनने का मौका मिला है। इस मौके ने रचनाशीलता के द्वार खोल दिए हैं। इसीलिए कुछ लिखने और कुछ गुनगुनाने का सिलसिला शुरू हो चुका है। अब तो इनमें से कुछ बंदी लगातार कार्यक्रम कर रहे हैं, कुछ की तैयारी जारी है। कोविड काल में हुई तैयारी भी रंग लाई और आज के माहौल में तो रेडियो जेल का यह कार्यक्रम नयी रंगत बिखेर रहा है। आज इस नयी शुरुआत की चर्चा हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हरियाणा में इसकी यात्रा का एक बड़ा पड़ाव पूरा हुआ है। पानीपत की जेल से एक साल पहले यानी 16 जनवरी, 2021 को इसकी शुरुआत हुई थी। आज हरियाणा की विभिन्न जेलों में अनेक आरजे बने हैं और कई अन्य लोगों ने गीत-संगीत से मंत्रमुग्ध किया है।

‘तिनका तिनका’ की संस्थापक डॉ. वर्तिका नन्दा कहती हैं, ‘बहुत भावुक होता है वह पल जब जेल रेडियो के जरिये लंबे समय बाद रिश्ते आपस में मिलते हैं, एक नये अंदाज में। बंदियों के परिवार भी उन्हें तवज्जो देने लगे हैं। आज इनकी जिंदगी बदली तो इनके जीने का अंदाज बदल गया।’ गौर हो कि डॉ. वर्तिका ने तिहाड़ जेल में वर्ष 2013 में पहली बार तिनका-तिनका शृंखला की शुरुआत की। उन्हें भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने स्त्री शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया। कितनी मुश्किल आई इस तरह के कठिन पथ पर चलते वक्त, पूछने पर तिनका तिनका फाउंडेशन की संस्थापक और दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज के पत्रकारिता विभाग की प्रमुख वर्तिका नन्दा कहती हैं, ‘असल बात होती है मन को सुकून मिलने की और किसी के चेहरे पर हंसी देखने की। जिन परिवारों में मुलाकातें नहीं हो रही थीं, आज वे मिल रहे हैं। उनके काम की सराहना कर रहे हैं, यह सब देखकर बहुत अच्छा लगता है। यही हमारा मकसद है कि जेलों में भी इंद्रधनुषी रंग बिखरें।’ बता दें कि ‘तिनका तिनका’ को दो बार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में जगह मिली। बताया गया कि इस प्रयास की ही बदौलत सुप्रीम कोर्ट ने भी संज्ञान लिया।

हरियाणा की 12 जेलों में रेडियो पर काम

हुनर को मंच देने और जिंदगी से उदासी हटाने के अपने अभियान में ‘तिनका-तिनका’ की ओर से हरियाणा की 12 जेलों में रेडियो लाया जा चुका है। इस क्रम में 50 से अधिक बंदियों को प्रशिक्षित किया गया है। डॉ. वर्तिका ने बताया कि आने वाले दिनों में कुरुक्षेत्र, यमुनानगर, जींद और सोनीपत मे भी जेल रेडियो लाये जाने की तैयारी है। अब तक जिन बंदियों ने रेडियो जॉकी बन बुलंदियों को छूने की कोशिश की उनमें सोनिया के अलावा आरती, शिक्षा, ज्योति, विवेक, अमित, मुकेश, वीरेंद्र, दिनेश आदि हैं।

... वह भावुक पल और मां-बेटे का मिलन

सोनिया चौधरी नाम की एक महिला सजायाफ्ता है। बेटा भी मां से नाता तोड़ चुका था। करीब 21 साल जेल में गुजार चुकी सोनिया अपने इकलोते बेटे से बात करने के लिए तड़प उठती थी। तभी एक दिन बेटा अचानक जेल में आया, मां से माफी मांगी और गले लग गया। इस भावुक पल को देख जेल स्टाफ की आंखें भी नम हो गयीं। असल में जेल में तन्हा जीवन काट रही सोनिया के लिए चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा था। इकलौता बेटा भी ‘बहुत दूर’ हो चला था। जिला जेल, करनाल में एक दिन उसने तिनका जेल रेडियो की शुरुआत की बात सुनी और अन्य बंदियों के साथ ऑडिशन दिया। अंतत: इस जेल से 10 बंदियों का जेल रेडियो के जॉकी के तौर पर चयन हुआ। सोनिया भी उनमें से एक थी। फिर क्या था तिनका-तिनका के यूट्यूब पर बेटे ने अपनी मां का बदला अंदाज देखा। मां के संबंध में कुछ सूचनाएं उसे जेल विभाग से भी मिलीं। इधर, मीडिया में भी सोनिया की चर्चा हुई। आखिरकार मां के प्रति बेटे की सोच ही बदल गयी। जो बेटा अपनी मां से बात नहीं करना चाहता था, उसने जेल प्रशासन से समय मांगा और मां के गले लग गया। वहां मौजूद सभी लोग भावुक पल में खो गये। अब सोनिया बहुत खुश है कि उसकी आवाज को उसका बेटा अक्सर सुनता है। उसका कहना है कि उसकी आवाज और काम ने उसके बेटे के मन मे उसकी एक नयी छवि को गढ़ा है। बता दें कि गत वर्ष तिनका-तिनका नेशनल अवार्ड के लिए देशभर से दो महिलाओं को चुना गया था। इनमें से एक सोनिया थी। जेल के वरिष्ठ अधिकारी एवं अन्य लोग भी मानते हैं कि कोरोना के दौर में जेल का रेडियो मानसिक खुराक बना है।

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