सर्वाइकल कैंसर निदान में इनका बड़ा योगदान

सर्वाइकल कैंसर निदान में इनका बड़ा योगदान

साल का पहला महीना यानी जनवरी, सर्वाइकल कैंसर के प्रति जागरूकता के लिए भी जाना जाता है। इस रोग की पहचान और इसके निदान के उपायों की खोज से पहले न जाने कितने लोग असमय ही काल कवलित हो गये। आज इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाने में स्वास्थ्यकर्मी बड़ा योगदान दे रहे हैं। जागरूकता का यह अभियान तभी संभव हो पाया जब इस बीमारी के कारणों और निदान के उपायों का पता चल पाया। सर्वाइकल कैंसर संबंधी खोज प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले वैज्ञानिकों के बारे में बता रही हैं प्रमीला गुप्ता

सर्वाइकल कैंसर। स्तन कैंसर के बाद महिलाओं में होने वाली दूसरी घातक बीमारी। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर प्रीवेंशन एंड रिसर्च (एनआईसीपीआर) द्वारा किए गए अध्ययन में सामने आया है कि हर आठ मिनट बाद सर्वाइकल कैंसर के कारण एक महिला की मृत्यु हो जाती है। सोचिए, जब इसके कारण और निदान का पता नहीं चल पाया होगा तब स्थिति कितनी घातक होगी। कुछ वैज्ञानिकों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से इस दिशा में क्रांतिकारी शुरुआत की थी। उनके द्वारा किए शोध कार्यों के आधार पर अब इस रोग का शुरुआत में निदान कर उसको आगे बढ़ने से रोक पाना संभव हो गया है। यह कैंसर गर्भाशय में कोशिकाओं की अनियमित वृद्धि के कारण होता है। यह निदान व उपचार के अभाव में घातक सिद्ध हो सकता है। बेशक, आज उपाय हैं, लेकिन जागरूकता के अभाव में इसका भयावह रूप दिख जाता है। आज भी इसमें सबसे बड़ी बाधा महिलाओं में लज्जा होना और जागरूकता का अभाव है। यह स्थिति भारत ही नहीं, बल्कि अन्य देशों में भी है। जागरूकता के लिए ही हर साल दुनियाभर में जनवरी का महीना सर्वाइकल कैंसर जागरूकता अभियान के रूप में मनाया जाता है। गनीमत है कि महिलाएं जागरूक हो रही हैं। आइये जानते हैं इसकी खोज की दिशा में बढ़े कदमों के बारे में। आज स्त्री रोग विशेषज्ञ ओपीडी में ही एक छोटी सी खोज ‘पैप मियर टेस्ट’ द्वारा जांच कर लेता है। इसकी रिपोर्ट भी शीघ्र ही आ जाती है। डॉक्टर को पता चल जाता है कि रोगी के गर्भाशय मुख पर कैंसर के जीवाणु विकसित हो रहे हैं अथवा नहीं। असामान्य स्थिति में ‘कोल्पोस्कोपी’ द्वारा विशिष्ट जांच की जाती है। नोबेल विजेता विषाणु विज्ञानी हराल्ड-जुर-हौसन ने दस साल की अथक खोज के आधार पर इस बात की पुष्टि की कि लगभग 98 फीसदी मामलों में सर्वाइकल कैंसर का मूल कारण एचपी वायरस होता है। यह सुनिश्चित हो जाने के बाद रोग विज्ञानियों ने इसकी रोकथाम के लिए वैक्सीन तैयार करने की दिशा में प्रयास करने शुरू कर दिये। शोधकर्ताओं ईआन फ्रेज़र और जिआनझाऊ को 2006 में अमेरिका की एफडीए ने यूएस पेटेंट कानून के अंतर्गत पहली रोग निवारक एचपीवी वैक्सीन को स्वीकृति प्रदान की जो अब संपूर्ण विश्व में अनगिनत महिलाओं की इस घातक रोग से रक्षा कर रही है। सर्वाइकल कैंसर के निदान व रोकथाम में चार रोग विज्ञानियों के शोधकार्य उल्लेखनीय हैं। उनके अथक प्रयासों के फलस्वरूप ही आज इनके निदान एवं रोकथाम के लिए चिकित्सा जगत में सतत प्रयास व शोध कार्य चल रहे हैं। अनगिनत महिलाएं इस घातक रोग की चपेट से सुरक्षित हैं। सभी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में सर्वाइकल कैंसर के निदान, रोकथाम की जानकारी पढ़ने के लिए मिल जाती हैं लेकिन उन महान विज्ञानियों के नाम शायद ही किसी को मालूम हों जिन्होंने अपने सतत प्रयासों द्वारा इसके निदान व रोकथाम में अविस्मरणीय योगदान दिया। उनके बारे में भी जानना जरूरी है।

पैप स्मियर टेस्ट के जनक-जॉर्ज निकोलस पैपनिकोल

जॉर्ज निकोलस पैपनिकोल

जॉर्ज निकोलस पैपनिकोल ने मूलतः महिला प्रजनन प्रणाली की कोशिका तथा शारीरिक विशिष्टताओं का विस्तृत अध्ययन कर उनकी व्याख्या की है। सामान्यत: वह पैपनिकोल टेस्ट यानी पैप स्मियर टेस्ट के जनक के रूप में जाने जाते हैं। पैप स्मियर टेस्ट सर्वाइकल कैंसर की शुरुआती अवस्था की जांच की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था। इसने तथा इसके बाद की अन्य खोजों ने सर्वाइकल कैंसर को आगे बढ़ने से रोकने में एक नयी दिशा प्रदान की।

पैपनिकोल का जन्म 13 मई, 1883 को ग्रीक के यूओबिया द्वीप के ‘किमी’ नगर में हुआ था। संगीत तथा मानव विज्ञान में रुचि होते हुए भी चिकित्सक पिता द्वारा प्रोत्साहित करने पर एथेंस विश्वविद्यालय से 1904 में इन्होंने स्नातक की डिग्री ली और प्रथम स्थान प्राप्त किया। कुछ समय के लिए मिलिट्री में असिस्टेंट सर्जन के पद पर काम करने के बाद अपने गृह नगर लौट आए। वहां पर नगर से बाहर रह रहे कुष्ठ रोगियों की दो साल तक देखभाल की। वर्ष 1910 में म्युनिख विश्वविद्यालय से प्राणि विज्ञान में डिग्री ली। मिलिट्री परिवार की लड़की मैरी से विवाह कर लिया। सन 1913 में नवदंपति ने करिअर में आगे बढ़ने के लिए अमेरिका जाने का फैसला किया। फैसला क्षणिक और साहसी था। न पैसे थे और न ही आय का कोई साधन। डिपार्टमेंटल स्टोर में काम करने लगे। बाद में कई और छोटे-मोटे काम किए। अंततः साल 1914 में पैपनिकोल को न्यूयार्क यूनिवर्सिटी के पैथोलोजी विभाग तथा कोर्नेल यूनिवर्सिटी मेडिकल कालेज के एनाटोमी विभाग में काम मिल गया। पत्नी भी वहीं पर तकनीशियन का काम करने लगीं।

पैपनिकोल ने वर्ष 1920 में अपना ध्यान मानव प्रजनन प्रणाली के कोशिका विज्ञान पर केंद्रित किया। अपने जांच और खोज अभियान के दौरान उन्हें सर्वाइकल की सामान्य तथा कैंसरस (संघातक) कोशिकाओं का अंतर जानने में सफलता मिल गयी। साल 1928 में उन्होंने अपने इस प्रारंभिक शोध को प्रकाशित किया, लेकिन किसी ने इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया। वह साल पैपनिकोल के लिए सुखद आश्चर्यों से भरा था। उनको अमेरिका की नागरिकता मिल गयी थी। यही नहीं, कोर्नेल यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त हो गए थे। न्यूयार्क में वे स्त्री रोग विशेषज्ञ, पैथोलोजिस्ट डॉ. हर्बट ट्राट के साथ काम करने लगे। वर्ष 1943 में उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'डायग्नोसिस ऑफ यूटरिन कैंसर बाय वेजिनल स्मियर' प्रकाशित हुई। इसमें मासिक धर्म के समय महिला की शारीरिक संरचना पर सांघातिक तथा हार्मोनल प्रभाव का विवरण था। उल्लेखनीय बात थी कि अब एक छोटी सी जांच के बाद सामान्य तथा असामान्य स्थिति का सरलता से पता चल सकता था। अब यह सरल प्रक्रिया पैप-स्मियर-टेस्ट के नाम से विश्व प्रसिद्ध है। इससे बहुत कम खर्च पर सर्वाइकल कैंसर का पता शुरू में ही लगाया जा सकता है। विश्व स्तर पर प्रयुक्त होने के कारण इस प्रक्रिया से सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित महिलाओं की संख्या में बहुत कमी आई है।

पैपनिकोल कोर्नेल यूनिवर्सिटी मेडिकल कालेज में साल 1951 में एमेरिटस प्रोफेसर बन गए। वहां पर उनके नाम पर दो लेबोरेटरी स्थापित हैं। पैपनिकोल ने 4 पुस्तकें तथा 100 शोध पत्र लिखे। अमेरिका, इटली, ग्रीस ने उनके उल्लेखनीय काम के लिए अनेक मानद उपाधियां प्रदान कीं। यूरो आने से पहले ग्रीस के 10,000 दरहम के नोट पर उनका चित्र अंकित है। ग्रीस ने उनकी स्मृति में अनेक डाक टिकट जारी किए। कोर्नेल में 50 साल तक काम करने के बाद 1961 में उन्होंने न्यूयार्क छोड़ कर मियामी की कैंसर इंस्टीट्यूट के प्रमुख का कार्यभार संभालने का फैसला किया। दुर्भाग्य से मियामी पहुंचने के तीन महीने बाद ही 19 फरवरी, 1962 को पैपनिकोल का देहांत हो गया। उनके सम्मान में मियामी कैंसर इंस्टीट्यूट का नाम पैपनिकोल कैंसर इंस्टीट्यूट रख दिया गया। वर्ष 1998 में उनके एक प्रशंसक ने उनकी महान खोज के बारे में लिखा, 'उनके चिरस्मरणीय योगदान ने सिद्ध कर दिया कि कैंसर को हराया जा सकता है। पैपनिकोल का स्क्रीनिंग टेस्ट इस रोग के निदान में सदैव शक्तिशाली उपकरण रहेगा। पथ प्रदर्शक के रूप में देखने वाले उसके प्रति सदैव कृतज्ञ रहेंगे। वे महिलाएं जिन को इस टेस्ट के माध्यम से नया जीवन मिला है, ऋणी रहेंगी।'

कोल्पोस्कोप के आविष्कारक-हेन्स हिंसल्मन

हेन्स हिंसल्मन

सर्वाइकल कैंसर का पैप स्मियर टेस्ट करने के बाद असामान्य कोशिकाओं के होने पर आगे की जांच प्रशिक्षित डाक्टर कोल्पोस्कोप द्वारा करता है। डॉक्टर कोल्पोस्कोप के माध्यम से प्रारंभिक असामान्य विकार के सही केन्द्र बिन्दु को चिन्हित कर गर्भाशय के मुख से ऊतक (टिशू बायोप्सी) का एक नमूना काट कर लेबोरेटरी में कैंसर की अवस्था का पता लगाने के लिए भेज देता है। कोल्पोस्कोप उपकरण को विकसित करने वाले हेन्स हिंसल्मन का जन्म 6 अगस्त, 1884 को जर्मनी में न्यूम्युन्स्टर के रूढ़िवादी परिवार में हुआ था। हाई स्कूल में प्राकृतिक विज्ञान में उनकी गहन जिज्ञासा और विलक्षण प्रतिभा से सभी आश्चर्यचकित थे। हाई स्कूल के बाद उन्होंने हेडलबर्ग में मेडिकल की पढ़ाई की। साल 1910 में जेना के गायनाेकोलोजी विभाग और 1911 में यूनिवर्सिटी में काम किया। प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918 तक) अनेक बाधाएं आने के बावजूद वे गायनोकोलोजी के विभागाध्यक्ष बन गए। वहां पर उन्होंने वान एकिन के फ्रंटल लेंस से जांच करने की कोशिश की, लेकिन ऐसा कर पाना कठिन था। हिंसल्मन ने इसका समाधान निकाला और थोड़े से दर्द की स्थिति में पीड़ित की जांच की। जांच की इस प्रक्रिया में रोगी को थोड़ा सा दर्द होता था और थोड़ा रक्त बहने की आशंका थी। दृढ़ निश्चयी हिंसल्मन ने कठिन परिस्थितियों में भी अपना शोधकार्य जारी रखा। परिणामस्वरूप उन्होंने अपने तकनीकी सहयोगियों की सहायता से 150 मिमी फोकल दूरी तक निरीक्षण करने वाले कोल्पोस्कोप (रोशनी के साथ आकार बड़ा करके दिखाने वाला उपकरण) का निर्माण करने में सफलता प्राप्त कर ली। वे अब कोल्पोस्कोप के माध्यम से असामान्य घाव को पहचान सकते थे। अपनी शल्य चिकित्सक की चिमटी से चिन्हित स्थान से ऊतक (टिशू बायोप्सी) निकालकर लेबोरेटरी में कैंसर की स्थिति का पता लगाने के लिए भेज देते थे। हेन्स हिंसल्मन ने साल 1926 में एल्टोना सिटी हॉस्पिटल में गायनाेकोलोजी विभाग का कार्यभार संभाला। अपने विभाग में कोल्पोस्कोपी द्वारा सर्वाइकल कैंसर का निरीक्षण करने और उस प्रक्रिया को आरंभ करने वाले वे विश्व के प्रथम चिकित्सक थे। उनके प्रोफेसरों ने साल 1930 में उनके उल्लेखनीय कार्य के लिए उन्हें आधिकारिक रूप से सम्मानित किया। शीघ्र ही कोल्पोस्कोपी पूरे जर्मनी में लोकप्रिय हो गयी। रियो-डी-जेनेरो विश्वविद्यालय ने उनको सर्वाइकल कैंसर के प्रारंभिक निदान व रोकथाम के लिए किए गए उल्लेखनीय कार्यों के लिए ‘डिप्लोमा होनोरिस कॉज़ा’ प्रदान किया था। हॅम्बर्ग में हिंसल्मन एलबे नदी के किनारे अपने पुराने खपरैल की छत वाले घर में रहते थे। साल 1959 में हॅम्बर्ग के घर में ही मृत्यु हो गयी। मृत्यु के समय भी वे कार्य में तल्लीन थे। ज्यूरिख से लौटने के बाद वे वियना में होने वाली कान्फ्रेंस के लिए रिपोर्ट तैयार कर रहे थे। उनका काम केवल कोल्पोस्कोप तक ही सीमित नहीं था। वे महिलाओं के अन्य रोगों पर भी शोध कार्य कर रहे थे। पैप स्मियर टेस्ट की तुलना में कोल्पोस्कोपी को विश्व में लोकप्रिय होने में काफी समय लग गया। इसके कुछ कारण थे। पहला यह कि साल 1950 के अंत तक कोई विशिष्ट शोध सामग्री उपलब्ध नहीं थी। दूसरा, हिंसल्मन का जर्मन नागरिक होना। उस समय शत्रु भाषा समझे जाने के कारण किसी अन्य भाषा के पाठक को जर्मन शोध कार्यों में कोई रुचि नहीं थी। तीसरी वजह थी, डाक्टर स्वयं कोल्पोस्कोपी परीक्षण करता है। चौथी वजह थी पैप-स्मियर-टेस्ट की तुलना में कोल्पोस्कोपी परीक्षण में ज्यादा समय लगना। समय के साथ-साथ ये बाधाएं समाप्त होती गयीं। वर्तमान में सारे विश्व में सर्वाइकल कैंसर की शुरुआती पहचान और रोकथाम के लिए महिलाओं के लिए यह एक सहज-सरल विकल्प है।

एचपी वायरस के शोधकर्ता-हराल्ड-जुर-हौसन

हराल्ड-जुर-हौसन

महिलाओं के घातक रोग सर्वाइकल कैंसर की शुरुआती जांच और रोकथाम की दिशा में निरंतर शोधकार्य चल रहे थे लेकिन यह संक्रमण होता क्यों है- इस तरफ किसी का भी विशेष ध्यान नहीं गया था। जर्मन विषाणु विज्ञानी एवं शोधकर्ता हराल्ड-जुर-हौसन ने इस तरफ ध्यान दिया। उन्होंने तत्कालीन प्रचलित धारणाओं के विपरीत यह दावा किया कि सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण ‘ह्यूमन पेपिलोमा वायरस’ है। उन्होंने देखा कि ट्यूमर में एचपीवी डीएनए लम्बे समय तक निष्क्रिय पड़ा रह सकता है। वायरस की उपस्थिति का पता डीएनए की विशिष्ट जांच द्वारा लगाया जा सकता है। अपने सहयोगियों के साथ शोध करते समय उन्होंने पाश्चर इंस्टीट्यूट में विविध प्रजातियों के विषाक्त जीवाणुओं में एचपीवी को पाया। उनमें से केवल कुछ प्रकार के एचपीवी जीवाणु ही कैंसर का कारण बन सकते थे। दस वर्ष तक विभिन्न प्रकार के एचपीवी जीवाणुओं पर गहन अनुसंधान करने के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे। उन्होंने सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित रोगियों की बायोप्सी की जांच के बाद एचपीवी डीएनए में नए जीवाणुओं को पाया। साल 1983 में नए ट्यूमर उत्पादक एचपीवी 16 की खोज की। 1984 में उन्होंने सर्वाइकल कैंसर के लिए एचपीवी 16 तथा 18 को ज़िम्मेवार ठहराया। सम्पूर्ण विश्व में सर्वाइकल कैंसर से पीड़ित महिलाओं की बायोप्सी के उपरांत 70% बायोप्सी में एचपीवी 16 तथा 18 की नियमित उपस्थिति पायी गयी। हराल्ड-जुर-हौसन को उनकी इस खोज के लिए वर्ष 2008 का नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

वैक्सीन निर्माता-इयान फ्रेज़र तथा जिआनझाऊ

इयान फ्रेज़र

हराल्ड जुर हौसन द्वारा सर्वाइकल कैंसर के लिए एचपीवी की पुष्टि हो जाने के बाद शोधकर्ताओं ने प्रोत्साहित होकर इस दिशा में आगे अनुसंधान कार्य शुरू कर दिये। आस्ट्रेलिया की क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी में इसकी रोकथाम के लिए पहला वैक्सीन तैयार किया गया। इसको इआन फ्रेज़र व जिआनझाऊ ने विकसित किया था। परीक्षण में सफल होने के बाद 2006 में अमेरिका की एफडीए ने क्वींसलैंड के शोधकर्ताओं ईआन फ्रेज़र और जिआनझाऊ को रोग निवारक एचपीवी वैक्सीन को यूएस पेटेंट लॉ के अंतर्गत मान्यता प्रदान कर दी। वैक्सीन का नाम है ‘गार्डसिल’ और मार्केटिंग है मर्क एंड कंपनी के पास। कंपनी के अनुसार, 2007 के मध्य तक इसको 80 देशों में मान्यता प्राप्त हो चुकी थी।

जिआनझाऊ

वैक्सीन और अन्य उपाय

यद्यपि अभी तक सर्वाइकल कैंसर का स्थायी उपचार नहीं खोजा जा सका है तथापि इसकी रोकथाम व बचाव के लिए वैक्सीन महिलाओं के लिए अनुपम वरदान सिद्ध हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर के बढ़ रहे मामलों को गंभीरता से लिया है। उसने इस कैंसर से बचाव के लिए वर्ष 2030 तक पंद्रह वर्ष तक की 90 फीसदी लड़कियों को एचपीवी की वैक्सीन लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। वैक्सीन ने महिलाओं को इस कैंसर की रोकथाम के लिए एक नयी दिशा प्रदान की है लेकिन यह काफी नहीं है। ज़रूरत है महिलाओं में इस बारे में जागरूकता फैलाने की। लक्षण प्रकट होते ही लोकलाज छोड़कर अपना परीक्षण करवाना ज़रूरी है। जीवनशैली में परिवर्तन भी आवश्यक है। शरीर का वज़न ठीक रखना एक अन्य महत्वपूर्ण सावधानी है। नियमित रूप से पैप स्मियर टेस्ट करवाने से भी बचा जा सकता है। तो क्यों न जागरूक होकर सब महिलाएं विश्व को इस घातक रोग से मुक्त करने की दिशा में दृढ़ निश्चय के साथ आगे कदम बढ़ाएं।

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