विशाल काले ग्रेनाइट का शिवलिंग 17 जनवरी को पूर्वी चम्पारण ज़िले के केसरिया–चकिया हाईवे पर स्थित कैथवलिया गांव में स्थापित किया गया। इसके दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। शिवलिंग की ऊंचाई और परिधि 33 फीट है तथा इसका वज़न 210 टन है।
भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का एक चर्चित लेख है ‘चम्पारण में बापू के साथ’, जिसे बचपन में पढ़ा था। तभी से चम्पारण का नाम आते ही महात्मा गांधी की भी याद आ जाती है। बिहार में नेपाल की सीमा से सटा चम्पारण ज़िला अब दो ज़िलों—पूर्वी और पश्चिमी चम्पारण—में विभाजित हो चुका है, लेकिन इसका ऐतिहासिक महत्व आज भी बरकरार है।
गांधीजी ने 1917 में यहीं अपने सत्याग्रह का पहला सफल प्रयोग किया था। ब्रिटिश शासक और उनके चाटुकार चम्पारण में किसानों का आर्थिक शोषण करते हुए उनसे बेहद मामूली पैसों पर जबरन नील की खेती कराते थे। गांधीजी ने इस शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई, जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेज़ सरकार को अपने नियम बदलने पड़े और किसानों को उनका हक़ मिला।
सबसे ऊंचे चट्टानी शिवलिंग
अब चम्पारण में आकर्षण का एक नया केंद्र भी जुड़ गया है, जिसके कारण पर्यटकों—विशेषकर धार्मिक पर्यटकों—की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। चम्पारण में विश्व के सबसे ऊंचे चट्टानी शिवलिंग की स्थापना की गई है।
यह विशाल काले ग्रेनाइट का शिवलिंग 17 जनवरी को पूर्वी चम्पारण ज़िले के केसरिया–चकिया हाईवे पर स्थित कैथवलिया गांव में स्थापित किया गया। इसके दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। शिवलिंग की ऊंचाई और परिधि 33 फीट है तथा इसका वज़न 210 टन है।
विराट रामायण मंदिर परिसर
भक्तों और पर्यटकों की संख्या में आगे और वृद्धि का अनुमान इसलिए भी है क्योंकि यह शिवलिंग विराट रामायण मंदिर परिसर का हिस्सा है, जिसका निर्माण कार्य जारी है। मंदिर का निर्माण कराने वाली महावीर मंदिर ट्रस्ट के एक अधिकारी के अनुसार यह मंदिर संसार का सबसे ऊंचा मंदिर होगा।
महावीर मंदिर ट्रस्ट का दावा है कि प्रस्तावित विराट रामायण मंदिर 2030 तक पूर्ण हो जाएगा और यह विश्व का सबसे ऊंचा हिंदू मंदिर होगा। योजना के अनुसार मंदिर की लंबाई 1,080 फीट और चौड़ाई 540 फीट होगी। इसमें 12 शिखर होंगे, जिनमें सबसे ऊंचा शिखर 270 फीट का होगा। महावीर मंदिर ट्रस्ट के सचिव के अनुसार, ‘पूर्ण होने पर यह मंदिर दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर होगा।’
शिवलिंग निर्माण की प्रक्रिया और यात्रा
यह शिवलिंग काले ग्रेनाइट की एक ही चट्टान से तराशा गया है, जिसका चयन वर्ष 2014 में तमिलनाडु के महाबलिपुरम में किया गया था। मूल ग्रेनाइट चट्टान का वज़न 354 टन था।
शिवलिंग का निर्माण करने वाली कंपनी के प्रतिनिधि के अनुसार, ‘यह चट्टान तमिलनाडु के तिरुनेलवेली से मंगवाई, क्योंकि यह सर्वोत्तम गुणवत्ता की एकल ग्रेनाइट चट्टान थी। इसे तराशने में लगभग तीन वर्ष लगे और 25 से 30 कारीगर रोज़ाना 9 से 10 घंटे की शिफ्ट में काम करते थे।’
इस वर्ष जनवरी के पहले सप्ताह में शिवलिंग को पट्टिकाडु से चम्पारण तक विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए ट्रक से लाया गया। 2,565 किलोमीटर की यह यात्रा पूरी करने में 45 दिन लगे।
राम-जानकी पथ मान्यता
मंदिर का निर्माण राम–जानकी पथ पर कराया जा रहा है। मंदिर निर्माण समिति के सदस्य के अनुसार मान्यता है कि जनकपुर में माता सीता से विवाह के बाद भगवान राम की बारात जब अयोध्या लौट रही थी, तो वह एक रात इसी स्थान पर रुकी थी, जहां आज मंदिर का निर्माण हो रहा है।
आर्थिकी समृद्धि
इस मंदिर से चम्पारण को निश्चित रूप से आर्थिक लाभ मिल रहा है, जिसके संकेत अभी से दिखाई देने लगे हैं। मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर फूल, मिठाई और पूजा सामग्री बेचने के लिए अस्थायी दुकानें लग गई हैं। रीति-रिवाज का मार्गदर्शन करने वाले पुजारियों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
स्थानीय विक्रेता के अनुसार, वे रोज़ाना 2,000 से 2,500 रुपये कमा लेता हैं, जबकि पहले अपने गांव के मंदिर से उन्हें मुश्किल से महीने में 5,000 रुपये मिल पाते थे।’
अन्य आकर्षण
मंदिर पर्यटन की गति केवल चम्पारण तक सीमित नहीं है। पास के सीतामढ़ी ज़िले में, जिसे माता सीता का जन्मस्थल माना जाता है, पुनौरा धाम में एक विशाल मंदिर निर्माण की योजना है। केंद्रीय गृह ने पिछले वर्ष अगस्त में निर्धारित स्थल पर भूमि पूजन किया था। यह परियोजना 68 एकड़ से अधिक क्षेत्र में विकसित की जाएगी।
चम्पारण ऐतिहासिक और पर्यटक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। पूर्वी चम्पारण में स्थित केसरिया स्तूप संसार का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप है और एक प्रमुख पुरातात्त्विक स्थल है। मोतिहारी में गांधी संग्रहालय है, जो 1917 में गांधीजी के पहले सत्याग्रह को समर्पित संग्रहालय और स्मारक है तथा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में इसका विशेष महत्व है।
पूर्वी चम्पारण का चंद्रहिया भी महत्वपूर्ण स्थल है, क्योंकि गांधीजी ने नील प्लांटर्स के विरुद्ध अपना आंदोलन यहीं से आरंभ किया था। इनके अतिरिक्त भी चम्पारण में अनेक ऐतिहासिक स्थल हैं, जो पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

