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समुद्री जीवन का विशाल रहस्यमय प्राणी

लेदरबैक टर्टल

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चर्म कवच कछुआ दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री कछुआ है, जो उष्णकटिबंधीय सागरों में पाया जाता है। इसकी शारीरिक संरचना अनूठी होती है, और यह जैलीफिश जैसी समुद्री जीवों का शिकार करता है।

चर्म कवच कछुआ विश्व का सबसे बड़ा समुद्री कछुआ है। इसे अंग्रेजी में लेदरी टर्टल या लेदरबैक टर्टल कहा जाता है। यह कछुआ विश्व के सभी उष्णकटिबंधीय सागरों और महासागरों में पाया जाता है। कभी-कभी यह उप-उष्णकटिबंधीय सागरों में भी देखा जाता है, लेकिन यहां इसकी संख्या कम होती है। चर्म कवच कछुआ मुख्यतः गर्म सागरों में पाया जाता है, किंतु कभी-कभी यह समशीतोष्ण सागरों में भी मिल जाता है। चर्म कवच कछुए का क्षेत्र उत्तर में न्यूफाउंडलैंड और नार्वे से लेकर दक्षिण में न्यूजीलैंड तक फैला हुआ है। शोधों से पता चला है कि यह कछुआ बहुत बड़े क्षेत्र में पाया जाता है और अन्य समुद्री कछुओं के समान लंबी-लंबी यात्राएं करता है। कभी-कभी यह जलधाराओं के साथ बहते हुए सागर तटों पर भी आ जाता है।

चर्म कवच कछुए के शरीर का ऊपरी कवच अव्यवस्थित हड्डियों वाली प्लेटों से बना होता है, और इन प्लेटों के ऊपर चमड़े की एक परत होती है। इसीलिए इसे चर्म कवच कछुआ कहते हैं। इसकी पीठ (ऊपरी भाग) का रंग गहरा कत्थई या काला होता है, जबकि पेट (नीचे का भाग) सफेद होता है और उस पर काले रंग के निशान होते हैं। इसके ऊपरी कवच की लंबाई दो मीटर से अधिक और वजन 700 किलोग्राम से भी ज्यादा हो सकता है। चर्म कवच कछुए की गर्दन बहुत लंबी होती है। चर्म कवच कछुए के सामने के पैर अन्य समुद्री कछुओं के समान पतवार जैसे होते हैं और ये भी असामान्य रूप से लंबे होते हैं।

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चर्म कवच कछुए की आंखों में अक्सर आंसू दिखाई देते हैं। जब यह जमीन पर आता है तो इसकी आंखों में अधिक आंसू आते हैं। ये आंसू दुख के आंसू नहीं होते। जीवविज्ञानी कहते हैं कि सागर तटों की रेत अक्सर इसकी आंखों में चली जाती है, जिससे इसकी आंखों में पानी आ जाता है। इसके साथ ही यह अपने शरीर के अतिरिक्त लवणों को भी आंखों के पानी के साथ बाहर निकालता है। चर्म कवच कछुआ मांसाहारी कछुआ है। यह कोमल शरीर वाले और अत्यधिक धीरे तैरने वाले समुद्री जीवों का शिकार करता है। चर्म कवच कछुए का प्रमुख आहार प्लैंकटन में पाए जाने वाले समुद्री घोंघे, जैलीफिश और साल्प हैं। इसके अलावा, यह जैलीफिश और साल्प के भीतर रहने वाले छोटे-छोटे जीव और एम्फीपॉड भी खाता है। इस प्रकार के छोटे जीव जैलीफिश के झुंड के पास बहुत बड़ी संख्या में जमा हो जाते हैं। चर्म कवच कछुए के मुंह और गर्दन के पास 5 सेंटीमीटर से लेकर 8 सेंटीमीटर तक लंबे कांटे होते हैं, जो इन चिकने और फिसलने वाले जीवों को शिकार करने में विशेष रूप से सहायक होते हैं।

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चर्म कवच कछुए का समागम और प्रजनन सामान्य समुद्री कछुओं की तरह होता है। समागम के समय नववयस्क कुछ कछुओं की गर्दन और पतवार जैसे पैरों पर पीले और सफेद रंग के धब्बे उभर आते हैं। इसी समय ये गहरे पानी में समागम करते हैं, और इसके बाद मादाएं अंडे देने के लिए सागर तट की ओर चल पड़ती हैं। चर्म कवच कछुए की मादाएं अंडे देने के लिए हमेशा छोटे-छोटे झुंड बनाकर प्रजनन स्थलों पर पहुंचती हैं।

चर्म कवच वाली मादा कछुआ प्रायः अर्धरात्रि के बाद रेतीली जमीन पर आती है और सूखी रेत पर अपना घर बनाती है। यह पतवार जैसे अपने चारों पैरों की सहायता से अपने शरीर के बराबर लंबा, चौड़ा और गहरा गड्ढा तैयार करती है। इसका गड्ढा इतना बड़ा होता है कि मादा पूरी तरह इसमें छिप जाती है। पहला गड्ढा तैयार होने के बाद मादा कुछ समय तक आराम करती है और फिर अपने पीछे वाले पैरों की सहायता से पूंछ की ओर एक छोटा-सा दूसरा गड्ढा तैयार करती है। यह गड्ढा पहले वाले गड्ढे के भीतर होता है और इसमें मादा अंडे देती है। मादा जितना गहरा गड्ढा बना सकती है, उतना गहरा बनाती है। मादा चर्म कवच कछुआ एक बार में 60 से 100 तक अंडे देती है। इसके अंडे का व्यास 5 सेंटीमीटर से 5.5 सेंटीमीटर तक होता है। अंडे देने के बाद मादा अन्य समुद्री कछुओं के समान गड्ढे को पुनः रेत से ढंक देती है और ऊपर से कुछ रेत इस प्रकार बिखर देती है कि घोसला दिखाई न दे। चर्म कवच कछुए के अंडे सूर्य की गर्मी से परिपक्व होते हैं। ये लगभग सात सप्ताह बाद फूटते हैं और इनसे बच्चे निकल आते हैं। नवजात बच्चों का ऊपर और नीचे का कवच बहुत कोमल होता है, फिर भी ये अंडों से निकलने के बाद सीधे सागर की ओर भागते हैं। चर्म कवच कछुए के नवजात बच्चे सागर तटों पर कभी नहीं रुकते और सीधे गहरे पानी में चले जाते हैं।

चर्म कवच कछुए के अंडों के बच्चों के वही शत्रु होते हैं जो अन्य समुद्री कछुओं के होते हैं। इन्हें दिन के समय भूमि पर घूमने वाले शिकारी पक्षियों से खतरा रहता है और सागर में पहुंचने के बाद तटों पर रहने वाली मांसाहारी मछलियों से भी इन्हें सावधान रहना पड़ता है। इ.रि.सें.

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