चढ़ने वाली पर्च, जिसे अंग्रेज़ी में क्लाइंबिंग पर्च कहा जाता है, अद्भुत जीवट वाली मछली है। यह ताजे पानी में पाई जाती है, पानी के बाहर लंबे समय तक जीवित रहती है और जमीन पर चलकर नए जलाशयों की खोज करती है।
चढ़ने वाली पर्च का प्रमुख भोजन जलीय कीड़े-मकोड़े, छोटी-छोटी मछलियां तथा जलीय पौधे हैं। ताजे पानी की अधिकांश मछलियां पहले अपने बच्चों की देखभाल करती हैं और फिर बड़े होने पर उनका भक्षण करती हैं। इन सबके विपरीत चढ़ने वाली पर्च अन्य जीवों का तो भक्षण करती है, किंतु अपने बच्चों को कभी नहीं खाती। भारत की चढ़ने वाली पर्च प्रजनन काल में तालाबों के उथले पानी में जलीय पौधों के मध्य छोटा-सा घोसला बनाती हैं और इसी में अंडे देती हैं। इसके अंडे तुरंत सतह पर आ जाते हैं और चौबीस घंटे तक तैरते रहते हैं। इनमें अड़तालिस घंटों तक बच्चे निकल आते हैं और खुद विचरण करने लगते हैं।
पर्च मछली की कुछ जातियां नदियों और तालाबों में रहती हैं तथा कुछ सागरों-महासागरों में। पर्च बहुतायत से पाई जाने वाली मछली है। विश्व में पर्च के 150 परिवार यानी किस्में हैं। इनमें से 35 परिवार भारत में पाए जाते हैं। वृक्ष पर चढ़ने वाली मछली पर्च की एक जाति है। इसे अंग्रेज़ी में क्लाइम्बिंग पर्च कहते हैं। यह ताजे पानी की मछली है, जो दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत और श्रीलंका से लेकर फिलीपींस तक पाई जाती है। यह दक्षिण भारत के पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट के सागर तटों पर बहुतायत से मिलती है तथा उत्तरी-पूर्वी भागों में पर्याप्त संख्या में पाई जाती है। भारत में इसे कोई मछली के नाम से जाना जाता है।
चढ़ने वाली मछली सील की तरह अपना सिर इधर-उधर लुढ़काती हुई घास के मैदानों पर चलती है और लंबे समय तक पानी के बाहर जीवित रह सकती है। यह हमेशा तालाबों में रहती है तथा जब तालाब वाला निवास सूखने लगता है तो जमीन पर चलकर नए तालाब की खोज करती है। चढ़ने वाली पर्च अपने गलफड़ों के आवरण, छाती के मीनपंख तथा पूंछ की सहायता से जमीन पर चलती है। यह चलते समय अपने गलफड़ों के आवरण के सिरे के किनारे के कांटों को जमीन पर धंसा-धंसाकर आगे बढ़ती है। इस समय इसकी छाती के मीनपंख पैरों की तरह खंभे का कार्य करते हैं एवं पूंछ का सिरा आगे बढ़ने के लिए दबाव डालता है। यह जमीन पर ठीक ढंग से चल नहीं पाती अतः बेढंगी चाल से आगे बढ़ती है। यह एक घंटे में 200 मीटर की भी दूरी नहीं तय कर पाती। इसके छोटे-छोटे झुंड बरसात के मौसम में जमीन पर चलते हुए देखे जा सकते हैं।
चढ़ने वाली पर्च के शरीर में मौसम में अचानक होने वाले परिवर्तनों को सहन करने की अद्भुत क्षमता होती है तथा यह पानी के बाहर लंबे समय तक जीवित रह सकती है। चढ़ने वाली पर्च की शारीरिक संरचना सामान्य पर्च की तरह होती है। लंबाई 15 सेंटीमीटर से लेकर 22 सेंटीमीटर तक एवं रंग धूसर-हरा से लेकर धूसर-रूपहला। इसके मीनपंख कत्थई होते हैं एवं गलफड़ों के आवरण के पीछे एक गहरा धब्बा होता है और इनके किनारों पर कांटे होते हैं। इसी प्रकार पूंछ के मीनपंख के आधार पर भी एक गहरा धब्बा होता है, किंतु इसके किनारों पर कांटे नहीं होते।
चढ़ने वाली पर्च जमीन पर अपने गलफड़ों की एक बड़ी दरार द्वारा हवा खींचकर सांस लेती है। इसके गलफड़ों की दरार दो कक्षों में विभाजित होती है। छोटे और निचले कक्ष में सामान्य गलफड़े होते हैं तथा बड़े और ऊपरी कक्ष में लहरों जैसे किनारे वाली प्लेटों की अद्भुत संरचना होती है। ये प्लेटें एक के भीतर एक होती हैं एवं एक गुच्छे जैसी दिखाई देती हैं। इसी गुच्छे में पतली-पतली रक्त नलिकाओं का जाल होता है, अतः यह गुच्छा फेफड़े की तरह कार्य करता है। चढ़ने वाली पर्च हवा से आक्सीजन लेती है तथा अपनी गर्दन के दोनों ओर बने छिद्रों द्वारा प्लेटों के गुच्छे तक पहुंचाती है। ये छिद्र एक वाल्व द्वारा नियंत्रित होते हैं। इसके बाद फेफड़ों का कार्य करने वाला गुच्छा हवा से ऑक्सीजन ले लेता है। शेष बची हवा को सामान्य ढंग से गलफड़ों द्वारा शरीर के बाहर निकाल दिया जाता है। चढ़ने वाली पर्च सांस लेने के लिए इन अद्भुत अंगों का उपयोग जमीन पर ही नहीं, बल्कि पानी के भीतर भी करती है। अपने इन्हीं विशिष्ट अंगों की सहायता से यह सड़ी हुई वनस्पतियों वाले पानी, प्रदूषित पानी तथा कम ऑक्सीजन वाले पानी में भी सरलता से रह सकती है। इस प्रकार के पानी में यह सतह पर आती है और वायुमंडल से हवा लेकर पुनः लौट जाती है। शुष्क मौसम के आरंभ में यह जमीन के भीतर गड्ढा खोदती है और मछली के समान गहरी शीतकालीन निद्रा लेती है। इ.रि.सें.

