जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप

हमारे आंगन में उतरता अंतरिक्ष

हमारे आंगन में उतरता अंतरिक्ष

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने अंतरिक्ष में स्थापित आधुनिक दूरबीन जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से खींची गई आकाशगंगाओं और बनते-बिगड़ते तारों की शुरुआती, बेहद दूरस्थ व स्पष्ट तस्वीरें जारी की हैं। इनमें एक तस्वीर 13 अरब साल पहले बने सितारों की है। इससे ब्रह्मांड जन्म के नये रहस्य जानने व उसमें पृथ्वी जैसा रहने योग्य ग्रह खोजने में मदद मिलेगी। इससे पहले हब्बल टेलीस्कोप यही कार्य कर रहा था। जेम्स वेब अपने पूर्ववर्ती हब्बल से कहीं उन्नत दूरबीन है जो अमेरिका की नासा तथा यूरोपीय और कनाडाई स्पेस एजेंसियों का साझा शाहकार है।

डॉ. संजय वर्मा

विश्व के पलकों पर सुकुमार विचरते हैं जब स्वप्न अजान, न जाने नक्षत्रों से कौन निमंत्रण देता मुझको मौन! हम सबके प्रिय कवि सुमित्रानंदन पंत ने जब अपनी कविता- ‘मौन निमंत्रण’ में आकाश या तारों भरे अंतरिक्ष की कल्पना की होगी, शायद तब वह जानते होंगे कि एक न एक दिन यह निमंत्रण इंसानी सभ्यता को नक्षत्रों-तारों के करीब से अवलोकन का अवसर अवश्य प्रदान करेगा। इधर जब अमेरिकी स्पेस एजेंसी- नासा द्वारा अंतरिक्ष में स्थापित बेहद आधुनिक दूरबीन जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से खींची गई आकाशगंगाओं, निहारिकाओं और बनते-बिगड़ते तारों की अद्भुत तस्वीरें सामने आईं तो अंतरिक्ष हमें और अपना लगने लगा। ऐसा लगा कि हम जिस अबूझे और रहस्यमय ब्रह्मांड को लेकर अनंत काल से असंख्य कल्पनाएं करते रहे हैं, वे कल्पनाएं एक झटके में साकार हो उठी हैं। अभी हालांकि जेम्स टेलीस्कोप से ली गई चुनिंदा तस्वीरों को ही नासा ने जारी किया है, लेकिन ये इतनी स्पष्ट और आकर्षक हैं कि अंतरिक्ष हमें अपने आंगन में उतरा महसूस होने लगा है। इन तस्वीरों की महत्ता सिर्फ यह नहीं है कि वे बेहद साफ हैं, चित्ताकर्षक हैं, मनोहारी हैं। बल्कि आकाशीय नृत्य करती आकाशगंगाओं, मरते तारों की नारंगी रोशनियों और नीले सितारों के ये लैंडस्केप अंतरिक्ष जन्म, ब्लैकहोल, तारों की मृत्यु जैसी अनगिनत गुत्थियों को सुलझाने में हमारी मदद कर सकेंगी- ऐसी उम्मीद की जा रही है।

यूं यह पहला मौका नहीं है जब अंतरिक्ष की अतल गहराइयों के चित्र किसी स्पेस टेलीस्कोप के लैंसों के जरिए हमारे सामने उपस्थित हुए हैं। ब्रह्मांड के सुदूर कोनों और दूरस्थ सितारों की जगमगाहट को नासा का ही इससे पहले का हब्बल टेलीस्कोप पहले ही अपने लैंसों की मार्फत दर्ज कर चुका है। लेकिन तुलना करें तो हब्बल के मुकाबले अंतरिक्ष की उन्हीं जगहों के चित्र विस्मित कर रहे हैं क्योंकि वे एकदम स्पष्ट हैं। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा है मानो सुदूर, गहन अंतरिक्ष को हम ठीक अपनी आंखों के सामने देख पा रहे हों। यही नहीं, जेम्स वेब टेलीस्कोप ने इंसानों की पहुंच अंतरिक्ष में वहां तक कर दी है, जहां पहुंचने के बारे में अभी तक सिर्फ अंदाजे ही लग रहे थे। जैसे इनमें एक तस्वीर 13 अरब साल पहले बने सितारों की है। जरा सोचिए कि जो अंतरिक्ष 14 अरब (सटीक संख्या 13.8 अरब है) साल पुराना है, उसके लगभग जन्म (उत्पत्ति) के समय की तस्वीर जेम्स की बदौलत हमारी आंखों के सामने है। यह कल्पना ही अपने आप में दिलचस्प है कि जो पृथ्वी खुद चार अरब साल पुरानी है, उस पर पैदा हुई मानव जाति खुद से करीब दस अरब साल पहले के स्पेस को एक टेलीस्कोप के माध्यम से निहार पा रही है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि अब हम ब्रह्मांड जन्म के रहस्यों को जानने के कितने करीब पहुंच गए हैं। एक और उल्लेखनीय बात यह है कि सरहदों में बंटी दुनिया को वैश्विक साझेदारी के किसी एकजुट मंच पर देखना-परखना हो, तो जेम्स स्पेस टेलीस्कोप और अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसे अभियान एक मिसाल के रूप में सामने आते हैं। जेम्स टेलीस्कोप भले ही अमेरिकी एजेंसी नासा की देन हो, लेकिन इसमें यूरोपीय और कनाडाई स्पेस एजेंसियों का योगदान रेखांकित किया जाने वाला है।

जेम्स अव्वल, लेकिन पहले हब्बल

अत्यधिक ऊंचे दर्जे यानी हाई रेजॉल्यूशन वाली इन्फ्रारेड तस्वीरें खींचने में माहिर जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने अपने लेंसों के जरिए यह मुमकिन कर दिया है कि गहन अंतरिक्ष के जिन कोनों पर ऐसी मशीनी आंखें झांक नहीं पाती थीं, अब वहां की तस्वीरें उतारी जा सकें। बहुत संभव है कि भावी पीढ़ी की अंतरिक्ष दूरबीनें इससे आगे की खोज-खबर भी हमें लाकर दें। लेकिन आज अंतरिक्ष के जिन हिस्सों तक जेम्स की पहुंच बनी है, उसमें पूर्ववर्ती हब्बल टेलीस्कोप का योगदान कम नहीं है। नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की ओर से वर्ष 1990 में अंतरिक्ष में भेजे गए नासा के हब्बल टेलीस्कोप के एक अहम कंप्यूटर ने लगभग उसी समय (30 साल पहले) आंशिक रूप से काम करना बंद कर दिया था। इसके बावजूद पिछले साल 2021 में कंप्यूटर के पूरी तरह ठप होने से पहले तक हब्बल ने जैसा काम किया, उसके आधार पर इसे ‘धरती की आंख’ की संज्ञा दी जाती रही है। अमेरिकी खगोल विज्ञानी एडविन पॉवेल हब्बल के नाम पर स्थापित यह टेलीस्कोप अपने समय में ऐसा इकलौता टेलीस्कोप था जिसे अंतरिक्ष में ही सर्विसिंग के मुताबिक डिजाइन किया गया था। पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित सवा 13 मीटर लंबे और 11 हजार किलोग्राम वजनी हब्बल ने अपनी जीवनकाल में बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून की बेमिसाल तस्वीरें लेकर उनके वायुमंडल में हो रहे बदलावों का रहस्य खोल दिया। इसने बृहस्पति के बदलते वातावरण, उसकी सतह पर आए तूफानों की जानकारी बटोरने के अलावा शनि और यूरेनस पर आने वाले मौसमी तूफानों को करीब से दर्ज किया था। बृहस्पति की सतह पर मौजूद विशाल लाल धब्बे (ग्रेट रेड स्पॉट) वहां आए एक तूफान की निशानी थे, यह रहस्य हब्बल की तस्वीरों ने ही खोला था। सौरमंडल के विभिन्न ग्रहों के मौसमी बदलावों की तस्वीरें खींचने की खूबी के कारण हब्बल को सौरमंडल का ‘वेदरमैन’ तक कहा जाता था। सौरमंडल से बाहर और पृथ्वी से करीब 2 हजार प्रकाशवर्ष दूर स्थित निहारिका और बनते हुए तारे की तस्वीर खींचकर हब्बल ने अपनी उपयोगिता साबित कर दी थी। लेकिन बढ़ती उम्र और बेकार हो चुके कंप्यूटर के कारण हब्बल ने आखिरकार हार मान ली और इसकी जगह 10 अरब डॉलर के खर्च से बने जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने ली, जो इससे कई मामलों में बेहतर और आधुनिक है।

साभार : नासा

हब्बल ने विज्ञान की काफी मदद की, लेकिन अंतरिक्ष से जुड़े कई सवाल ऐसे थे जिसके लिए बेहद उन्नत टेलीस्कोप की जरूरत थी। जैसे क्या हमारे ब्रह्मांड में पृथ्वी जैसे ग्रह मौजूद हैं या नहीं। यदि ऐसे ग्रह हैं तो उन पर जीवन की क्या संभावना है। इसी तरह ब्लैक होल कहां-कहां है, न्यूट्रॉन तारों की प्रकृति क्या है, आकाशगंगाएं कैसे बनती और विकसित होती हैं या ब्रह्मांड आखिर कितना विस्तृत होगा (फैलेगा) इत्यादि। अंतरिक्ष से जुड़े सवालों-जिज्ञासाओं की लंबी फेहरिस्त है। साथ ही एक मुश्किल यह है कि न तो चांद व मंगल के अलावा इंसान के बनाए यान किसी अन्य ग्रह पर उतरे हैं और निकट भविष्य में भी ऐसी कोई संभावना नहीं है। ऐसे में सारे रहस्यों की थाह लेने का दारोमदार या तो वायज़र सरीखे यानों पर टिका है, जो सौरमंडल के दूरस्थ ग्रहों के नजदीक तक पहुंचें या फिर स्पेस टेलीस्कोप ही कुछ कमाल दिखाएं। दमदार स्पेस टेलीस्कोप बनाने की एक सलाह अमेरिका में नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़, इंजीनियरिंग एंड मेडिसिन जैसी संस्था प्रत्येक 10 वर्ष में देती रही है। इस संस्था ने पिछली बार नासा को सलाह दी थी कि उसे अगले एक दशक में एक बड़ी प्राथमिकता पर अमल करना चाहिए। प्राथमिकता यह है कि नासा को अंतरिक्ष में पृथ्वी जैसा रहने योग्य ग्रह (एक्सोप्लैनेट) खोजना चाहिए। इसके लिए नासा एक बड़ा और फैंसी टेलीस्कोप बनाए। ऐसा स्पेस टेलीस्कोप इन्फ्रारेड, ऑप्टिकल और अल्ट्रावॉयलेट किरणों को पकड़ने और उनका विश्लेषण करने वाले सेंसरों से लैस हो। नासा ने इस सलाह पर गंभीरता से अमल किया और 25 दिसंबर 2021 को फ्रेंच गुयाना स्पेस सेंटर से पृथ्वी से करीब साढ़े नौ लाख मील (15 लाख किमी.) दूर स्थित कक्षा के लिए रवाना किया। करीब एक महीने के सफर के बाद यह टेलीस्कोप अपनी कक्षा में पहुंच गया। अपोलो मिशन का संचालन करने वाले नासा के दूसरे नंबर के प्रशासक (एडमिनिस्ट्रेटर) जेम्स ई. वेब के नाम पर बनाए गए इस स्पेस टेलीस्कोप ने कमाल की जो तस्वीरें भेजीं, उनके आधार पर वैज्ञानिक इस दूरबीन को ‘गोल्डन आई’ कह रहे हैं। अंतरिक्ष में स्थापित यह अब तक का सबसे ताकतवर और सबसे जटिल इन्फ्रारेड तकनीक से लैस टेलीस्कोप है, जो न सिर्फ शुरुआती ब्रह्मांड, आकाशगंगाओं के निर्माण, तारों के जीवन-मरण के साथ दूसरी दुनिया की संभावनाओं का पता लगाएगा, बल्कि अन्य ग्रहों पर ऑक्सीजन ऑर्गेनिक अणुओं की थाह भी ले सकेगा। इसने अपने काम की शुरुआत में ही करीब 4.6 अरब साल पुराने तारा समूह ‘एसएमएसीएस 0723’ की जो तस्वीर भेजी है, उसके बारे में नासा के वैज्ञानिकों का दावा है कि मानवता ने पहली दफा समय और दूरी के लिहाज से सबसे दूर स्थित अंतरिक्ष के कोने में अपनी पहुंच बनाई है। इस तस्वीर की महत्ता का बखान करते हुए नासा के एडमिनिस्ट्रेटर बिल नेल्सन ने कहा कि सफेद, पीली, नारंगी और लाल रंग की सैकड़ों छींटों, धारियों, सर्पिलों के गुच्छों से सजी यह फोटो असल में ब्रह्मांड का एक छोटा सा कोना है। इसके जरिए हम शुरुआती ब्रह्मांड देख रहे हैं। यह तस्वीर असल में आकाशगंगा समुच्च्य ( गैलेक्सी क्‍लस्‍टर) SMACS 0723 की है। इस एक रंगीन तस्‍वीर में ही हजारों आकाशगंगाएं मौजूद हैं। इस गैलक्‍सी क्‍लस्‍टर का संयुक्‍त द्रव्‍यमान (मास) एक गुरुत्‍वीय लेंस की तरह काम करता है। इसके पीछे कई और आकाशगंगाएं मौजूद हैं जो इस लेंस की वजह से दिखाई देती हैं।

टेलीस्कोप की संरचना

तीखी नोक और तिकोने आकार वाली यह वेधशाला हॉलीवुड की किसी साइंस फिक्शन फिल्म के यान (जैसे कि स्टार डेस्ट्रॉयर) जैसी दिखती है। इस वेधशाला का मुख्य हिस्सा इसमें फूल के आकार जैसा सोना चढ़ाया हुआ बेरिलियम दर्पण है। यह एक प्रकार का स्वर्ण दर्पण (गोल्डन मिरर) है, जिसकी चौड़ाई करीब 21.32 फुट (6.4 मीटर) है। असल में यह दर्पण मजबूत लेकिन बेहद हल्की धातु बेरिलियम निर्मित 18 षटकोण टुकड़ों को जोड़कर बनाया गया है। हर टुकड़े पर 48.2 ग्राम सोने की परत चढ़ी हुई है। बेरिलियम से निर्मित 18 खंडों वाले इस दर्पण के एक खंड पर मई में सूक्ष्म उल्काओं का प्रहार भी हुआ था, इसके बावजूद इस संवेदनशील दर्पण ने बिना किसी बाधा के तस्वीरें लेना जारी रखा।

यह भी उल्लेखनीय है कि जेम्स टेलीस्कोप को हब्बल के उत्तराधिकारी के रूप में बनाने का काम वर्ष 1989 में ही तब शुरू हो गया था, जब हब्बल को लॉन्च करने में एक साल का वक्त बचा था। असल में, उसी दौर में खगोलविदों को यह अहसास हो गया था कि यदि ब्रह्मांड के शुरुआती सितारों और आकाशगंगाओं से प्रकाश हासिल करना है, तो पृथ्वी की सतह से दूर अंतरिक्ष में एक ऐसी वेधशाला की जरूरत है जिसके काम में धरती पर पैदा होने वाली चमक कोई हस्तक्षेप न कर सके। मानव इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी वेधशाला सूरज की ताकतवर किरणों को झेल सकेगी और शून्य से 370 डिग्री फॉरेनहाइट नीचे के तापमान में बखूबी काम कर सकती है। जाहिर है, इतनी खूबियों से लैस करने में जेम्स वेब टेलीस्कोप की कीमत बढ़ते-बढ़ते 10 अरब डॉलर तक जा पहुंची जिसने इसे इतिहास की सबसे महंगी दूरबीन बना दिया। हालांकि इसमें नासा को दो सहयोगी मिल गए जिनमें से यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने 78.8 करोड़ डॉलर और कनाडाई अंतरिक्ष एजेंसी ने 15.8 करोड़ डॉलर का योगदान दिया। यूरोपीय एजेंसी ने यह खर्च वेधशाला और उपकरणों की लॉन्चिंग पर किया, जबकि कनाडा ने सेंसरों व अन्य उपकरणों पर रकम खर्च की।

हब्बल और जेम्स में अंतर

इन दोनों वेधशालाओं में मुख्य अंतर इनके दर्पण (मिरर) की कार्यप्रणालियों का है। हब्बल टेलीस्कोप का 8 फुट का दर्पण सामने से आ रहे प्रकाश को विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम के अल्ट्रावॉयलेट विकिरण के ऑप्टिकल तरंगदैर्घ्य में देखता और दर्ज करता रहा है। इसका मतलब यह है कि हब्बल अल्ट्रावॉयलेट और इन्फ्रारेड किरणें फेंककर सिर्फ दृश्यमान प्रकाश देख सकता है, ठीक उसी तरह जैसे कि हम प्रकाश को देखते हैं। जबकि जेम्स टेलीस्कोप के उपकरण (सेंसर) व 21 फुट का दर्पण इन्फ्रारेड विकिरण के निम्न आवृत्ति वाले तंरगदैर्घ्य को पकड़ सकते हैं। इसका मतलब है कि जेम्स वेब अपनी इन्फ्रारेड आंख से धूल से बने कॉस्मिक बादलों के पार की दुनिया में भी ताकझांक कर सकता है। उल्लेखनीय है कि अरबों साल पहले तारों से निकला प्रकाश बेहद लंबी निम्न आवृत्ति वाले तरंगदैर्घ्यों में फैल गया है, जिसकी सामान्य टेलीस्कोपों से थाह लेना असंभव है। एक खास बात और है। इन्फ्रारेड प्रकाश अस्पष्ट धूल के माध्यम से भी देखा जा सकता है। इसका मतलब यह है कि एक इन्फ्रारेड वेधशाला वे तमाम जानकारियां हासिल कर सकती है जो आरंभिक सितारों की उत्पत्ति, आकाशगंगाओं का निर्माण और विकास, नवजात और पूरी तरह से गठित ग्रहों की रचना और जीवन के लिए ग्रहों की संरचना के आवश्यक घटकों से संबंधित होती हैं। एक अंतर उस कक्षा या स्थान का भी है जहां ये वेधशालाएं स्थापित की गई हैं। हब्बल को पृथ्वी की सतह से सिर्फ 330 मील ऊपर की कक्षा में स्थापित किया गया था। यह वही कक्षा है जिसमें नासा के स्पेस शटल पहुंचते थे। इसकी तुलना में जेम्स वेब धरती से बहुत दूर 10 लाख मील की उस सीमा में है जिसे खगोलविज्ञानी लैगरेंज पॉइंट कहते हैं। यह वही जगह है जहां सूर्य और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल एक दूसरे को संतुलित करते हैं। ऐसी कक्षा में बने रहने के लिए यान या वेधशाला को न्यूनतम ईंधन या ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। अंतरिक्ष को और करीब से देखने के नजरिये से जेम्स की कक्षा महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां इसे हब्बल के मुकाबले कई गुना अधिक विस्तृत अंतरिक्ष के दर्शन हो रहे हैं। वैसे जेम्स अपनी श्रेणी में आखिरी वेधशाला नहीं है। जेम्स के बाद तैयारी स्पिटज़र वेधशाला की है जो इन्फ्रारेड विकिरण दर्ज कर सकेगी। लेकिन इसके बाद माइक्रोवेव और फिर रेडियो वेधशालाओं का विकास होगा, जिनसे अंतरिक्ष की अब तक की अनदेखी और रहस्यमयी दुनिया के कुछ और नए खुलासों की उम्मीद खगोल जगत कर सकता है।

लेखक बेनेट यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

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