एक ऐसा भी समय था, जब भारत में एक सींग वाले गैंडे का भविष्य बेहद अनिश्चित दिखाई देता था। शिकारियों की बंदूकें, सींग के लिए अवैध शिकार, सिकुड़ते घास के मैदान और लगातार बदलता प्राकृतिक आवास—इन सबने इस विशालकाय जीव को विलुप्ति के कगार पर पहुँचा दिया था। लेकिन आज कहानी बदल चुकी है। जिस देश में 1960 आते-आते एक सींग वाले गैंडों की संख्या घटकर महज 600 तक सिमट गई थी, वहीं 2024 में इनकी जनगणना किए जाने पर इनकी संख्या 4,000 पार कर चुकी थी और इस समय यानी 2026 में देश में तकरीबन 4,014 एक सींग वाले गैंडे हैं। ये महज किसी वन्यजीव की आबादी बढ़ने की कहानी नहीं है। यह सफलता बताती है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और जंगल की निगरानी—ये सारे काम एक साथ हों, तो विलुप्ति की ओर बढ़ती प्रजातियों को भी वापस लाया जा सकता है।
भारत के गैंडा संरक्षण की सबसे बड़ी कहानी असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान से जुड़ी हुई है। ब्रह्मपुत्र के बाढ़ के मैदान में फैला हुआ यह इलाका एक सींग वाले गैंडे का सबसे महत्वपूर्ण आवास है। मार्च 2022 में की गई गणना के अनुसार, यहाँ 2,613 गैंडे थे। काजीरंगा की खासियत सिर्फ उसका बड़ा गैंडा समूह भर नहीं है। यहाँ बाढ़ भी पारिस्थितिकी का हिस्सा है। दरअसल, ब्रह्मपुत्र की बाढ़ घास के मैदानों और आर्द्रभूमियों में पोषण तत्त्व पहुँचाती है, जिससे गैंडे के लिए भोजन उपलब्ध होता है। लेकिन यही बाढ़ कई बार इनके लिए जानलेवा भी बनती है और जानवरों को ऊँचे इलाकों की तलाश में पार्क के बाहर जाना पड़ता है। इसलिए गैंडे को बचाने का अर्थ उसके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को भी सुरक्षित रखना है।
भारत आज दुनिया में एक सींग वाले गैंडों की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। लेकिन उन्हें ज्यादातर गैंडे कुछ ही संरक्षित क्षेत्रों में सीमित रह जाएँ, तो किसी महामारी, प्राकृतिक आपदा या बड़े पैमाने पर आवास विनाश की स्थिति में भी पूरी आबादी जोखिम में आ सकती है। यही वजह है कि संरक्षण की अगली चुनौती संख्या बढ़ाने से आगे बढ़कर आबादी को अलग-अलग सुरक्षित आवासों में फैलाने की है। असम में इसी सोच के तहत गैंडों को एक संरक्षित क्षेत्र से दूसरे उपयुक्त क्षेत्र में स्थानांतरित किया गया। इंडियन राइनो विजन 2020 जैसी पहल का उद्देश्य केवल गैंडों की संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि उनकी आबादी को नए सुरक्षित क्षेत्रों में स्थापित करना और दीर्घकाल में उनके आवास का विस्तार करना भी था।
दरअसल, गैंडे का सींग सदियों से अवैध वन्यजीव व्यापार का निशाना रहा है। इसलिए संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण मोर्चा रहा है—‘शिकारियों को जंगल तक पहुँचने से रोकना।’ काजीरंगा में गश्त, निगरानी, आधुनिक तकनीक, खुफिया सूचनाओं और वन्यकर्मियों की तैनाती को मजबूत किया गया।
गैंडे जैसे बड़े जानवरों के लिए सुरक्षित और जुड़े हुए आवास बेहद जरूरी हैं। इसी संदर्भ में असम में कालियाबोर से नुमालीगढ़ तक करीब 90 किलोमीटर के कॉरिडोर का विकास महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें 35 किलोमीटर का एलिवेटेड वन्यजीव कॉरिडोर प्रस्तावित है, ताकि वाहनों की आवाजाही और वन्यजीवों की आवाजाही के रास्ते अलग-अलग बने रहें। इ.रि.सें.

