चलो दिलदार चलो...

चलो दिलदार चलो...

अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाने के लिए तैयार स्पेसएक्स कंपनी का फॉल्कन-9 रॉकेट। -एजेंसी

हिंदी फिल्म पाकीजा का मशहूर गीत है- चलो दिलदार चलो चांद के पार चलो ...। चांद के पार चलने या आसमान की सैर करने जैसी कल्पनाएं भी अब सच होने लगी हैं। अब अंतरिक्ष से पृथ्वी को निहारना और चांद पर उतरना सिर्फ अनुसंधानभर तक सीमित रहने वाली बात नहीं रही। खरबों रुपये लगाकर सरकारें बेशक वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में भेजती रही हैं, लेकिन अब निजी कंपनियों के आगे आने से दौलतमंद लोगों के लिए भी आसमान को छूना संभव होने लगा है। पिछले दिनों निजी कंपनी स्पेसएक्स ने चार यात्रियों को स्पेस स्टेशन पहुंचाया है। निजी कंपनियों के जरिये अंतरिक्ष सफर की पूरी डगर को समझा रहे हैं अभिषेक कुमार सिंह

दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो अंतरिक्ष में दूर तक की सैर का ख़्वाब देखते हैं। लेकिन अंतरिक्ष तो अनंत है। आज तक विज्ञान भी उसके ओर-छोर का सही अंदाजा नहीं लगा पाया है। खगोलविदों ने अरबों-खरबों किलोमीटर के विस्तार वाले इस अंतरिक्ष के एक हिस्से को ही जाना है। लेकिन जब इस अंतरिक्ष की सैर की बात आती है, तो उसकी सीमाएं और भी ज्यादा हैं। अभी तक इंसान का बनाया कोई यान सौरमंडल को भी पार नहीं कर पाया है। वायज़र नामक यान इस कोशिश में जरूर है, लेकिन सौरमंडल छोड़ने में ही उसे शायद कुछ सदियां लग जाएं। इसके अलावा मंगल ग्रह और पृथ्वी के प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा पर ही हमारे यान उतर सके हैं और चंद्रमा को छोड़कर इंसान के कदमों की छाप पृथ्वी के अलावा कहीं और नहीं पड़ सकी है। शायद यही वह अधूरापन है जो इंसान को परेशान करता है और उसे प्रेरित करता है कि किसी तरह वह अंतरिक्ष की सैर पर जाकर इस रहस्यमय संसार की कोई थाह पा सके। स्पेस की यह सैर मुमकिन तो हुई है, लेकिन इसमें बड़ा पेच यह है कि यह काम अभी तक सिर्फ सरकारी स्पेस एजेंसियों की बदौलत हो सका है। वर्ष 2020 में यह मिथक टूट रहा है। इस साल अब तक दो मौके आ चुके हैं, जब एक प्राइवेट स्पेस एजेंसी ने सफलता के साथ कुछ अंतरिक्षयात्रियों को स्पेस में पहुंचाया है। यह कारनामा किया है कि स्पेसएक्स नामक कंपनी ने, जिसके संस्थापक इलान मस्क ने पैसे खर्च करके स्पेस की सैर में यकीन करने वाले अमीरों को अपना यह सपना साकार करने देने का बीड़ा उठाया है।

 पिछले दिनों इंटरनेशनल स्पेस सेंटर के लिए रवाना होने से पहले अंतरिक्ष यात्री बाएं से विक्टर

ग्लोवर, क्रू के कमांडर माइकल हॉप्किंस, शैनॉन वॉकर और जापान के सोइची नुगुची। - एजेंसी

स्पेसएक्स की ताजा उपलब्धि यह है कि उसने 15 नवंबर, 2020 को अपने ताकतवर रॉकेट फॉल्कन-9 से चार अंतरिक्षयात्रियों को फ्लोरिडा स्पेस सेंटर से रवाना किया और 27.5 घंटे के सफर के बाद ये सभी सकुशल अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) में पहुंच गए। स्पेसएक्स के क्रू-ड्रैगन कैप्सूल-रेजिलिएंस से गए इन यात्रियों में से तीन अमेरिकी और एक जापानी हैं। रेजिलिएंस-क्रू के कमांडर माइकल हॉप्किंस के साथ नासा के दो अंतरिक्ष यात्री विक्टर ग्लोवर और शैनॉन वॉकर थे। जापान के सोइची नुगुची तीसरी बार आईएसएस पर जा पहुंचे हैं। यहां उल्लेखनीय है कि पहले की यात्राएं रूसी रॉकेटों की मदद से संपन्न हुई थीं, जबकि 2020 में दो ऐसी यात्राएं अपने रॉकेट- फॉल्कन-9 से संपन्न करवा कर निजी अंतरिक्ष एजेंसी स्पेसएक्स ने साबित कर दिया है कि अब अंतरिक्ष की सैर के लिए सरकारी इंतजामों से बाहर निकला जा सकता है। इससे पहले इसी साल 30 मई को फॉल्कन-9 ड्रैगन कैप्सूल लेकर कैनेडी स्पेस सेंटर से उड़ा था और 19 घंटे की यात्रा के बाद उसने कैप्सूल को आईएसएस से जोड़ दिया था। उस कैप्सूल में रॉबर्ट बेनकेन और डगलस हर्ले नामक दो अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री थे, जिन्हें एक विशुद्ध निजी उड़ान से अंतरिक्ष में पहुंचने का गौरव मिला था। ये दोनों चार महीने तक आईएसएस पर रहे थे। इस उपलब्धि के साथ अमेरिका, कनाडा और दक्षिण अफ्रीका की एक साथ नागरिकता रखने वाले अरबपति इलान मस्क की कंपनी- स्पेसएक्स दुनिया की पहली ऐसी प्राइवेट कंपनी बन गई थी, जो अपने रॉकेट से लोगों की अंतरिक्ष पर्यटन के लिए ले जा सकती है। बेशक, अंतरिक्ष की ऐसी सैर बहुतों को लुभाती है, पर सवाल है कि आखिर ऐसी यात्राओं का मकसद क्या है। क्या इसका उद्देश्य अमीरों को स्पेस की सैर के लिए लुभाकर कमाई करना है, लंबी अंतरिक्ष यात्राओं का रास्ता खोलना है या फिर भारी आर्थिक बोझ से जूझ रही सरकारी स्पेस एजेंसियों को अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए संसाधन जुटाने में मदद करना है।

 स्पेसएक्स ड्रैगन के इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर पहुंचते वक्त का नजारा नासा टीवी पर। - एजेंसी

हाथ खींचतीं सरकारें

अंतरिक्ष यात्राओं और अनुसंधान पर बढ़ रहे खर्च के कारण सरकारें इससे हाथ खींचने लगी हैं। नासा के बारे में तो अक्सर ही खबरें आती रहती है कि अमेरिकी प्रशासन इसके बजट में कटौती कर रहा है क्योंकि अंतरिक्ष से कुछ ऐसी उपलब्धियों की संभावनाएं खत्म हो गई हैं जिनसे कमाई का कोई रास्ता खुलता हो। अंतरिक्षीय पिंडों से खनिजों और बहुमूल्य धातुओं के खनन की बात अक्सर कही-सुनी जाती है, लेकिन वह काम इतना खर्चीला और झंझट भरा है कि कोई सरकार इसकी शुरुआत कर अपने हाथ नहीं जलाना चाहती है। शीतयुद्ध काल में अंतरिक्ष अनुसंधान के बहाने अंतर-महाद्वीपीय (बैलिस्टक) मिसाइलों के विकास का जो काम किया जाता था, अब वे सारे मकसद भी हासिल हो चुके हैं। महाशक्ति बनने का जो उद्देश्य ऐसे कार्यक्रमों के जरिए अमेरिका हासिल करना चाहता था, वह भी उसे मिल चुका है। अब तो रॉकेट प्रक्षेपण और अंतरिक्ष अनुसंधान का ज्यादातर कामकाज भारत-चीन जैसे एशियाई देशों की तरफ शिफ्ट हो चुका है। स्पेस एजेंसी नासा अपने उपग्रहों का प्रक्षेपण यूरोपीय स्पेस एजेंसी और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) तक से करवाती है और बाकी बचे ज्यादातर काम निजी कंपनियों के हवाले कर दिए हैं। खासतौर से अंतरिक्ष भ्रमण से लेकर खोज तक के लिए वह सरकारी पैसे के इस्तेमाल से बचना चाहती है। हालांकि अंतरिक्ष पर्यटन अकूत कमाई की संभावना वाला एक क्षेत्र है, लेकिन इसमें भी निजी कंपनी (स्पेसएक्स) को मौका देकर अमेरिकी प्रशासन ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि अत्यधिक जोखिम वाले ऐसे कार्यों में वह अपने वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की सेवाएं प्राइवेट एजेंसियों को दिला सकता है, लेकिन खर्च से यथासंभव बचना चाहेगा।

सुरक्षा का क्या होगा

स्पेसएक्स के कारनामे से यह तो तय हो गया है कि अमेरिका या उसकी स्पेस एजेंसी नासा अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष स्थित पृथ्वी की कक्षा में भेजने के काम के मामले में दूसरे देशों की दया पर निर्भर नहीं रहेगी। ध्यान रहे कि बीते करीब 9 वर्षों से आईएसएस पर अपने अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने के लिए नासा रूसी रॉकेट सोयूज की सेवाएं लेती रही हैं। इसके लिए उसे प्रति सीट 9 करोड़ डॉलर की भारी-भरकम रकम चुकानी पड़ी है। अब स्पेसएक्स ने उसे फॉल्कन-9 रॉकेट के रूप में एक नया विकल्प भी दे दिया है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले नासा ने जुलाई, 2011 तक अपने रॉकेटों का इस्तेमाल किया था, लेकिन बाद में बढ़ते खर्च और दुर्घटनाओं के तहत उसने रूसी रॉकेटों की मदद लेनी शुरू कर दी। बाद में, 2014 में स्पेसएक्स और एक अन्य कंपनी बोइंग के साथ यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने का करार किया था। अब इसी एक साल में ये दो अवसर ऐसे बने हैं, जब निजी उड़ानों से इंसान को स्पेस में ले जाया गया है। निश्चित तौर पर यह अंतरिक्ष में एक नए युग की शुरुआत है लेकिन इसके जरिए एक तीर से कई निशाने साधे जा सकेंगे। जहां एक ओर यह अत्याधुनिक तकनीक के सर्वसुलभ होने का मामला बनता है, वहीं दूसरी ओर इससे सरकारी अनुदान पर घिसट-घिसट कर चलने वाले अंतरिक्ष कार्यक्रमों के अब प्राइवेट हाथों में पहुंचने से उनमें नयी गति आने की संभावना भी बनती है। साथ ही बढ़ते खर्च के कारण सरकारी स्पेस एजेंसियों के अंतरिक्ष अनुसंधान से हाथ खींच लेने की स्थितियों में प्राइवेट एजेंसियां एक नया संबल दे सकती हैं क्योंकि ये स्पेस की सैर के मुरीद अमीरों से इसके लिए अच्छी-खासी रकम बना सकती हैं। हालांकि कुछ सवाल भी हैं। जैसे प्राइवेट एजेंसियों की मदद लेने पर अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा का मामला कहीं हाशिये पर न चला जाए। या फिर अब स्पेस एजेंसियां कमाई का जरिया मानते हुए अंतरिक्ष को सिर्फ टूरिस्ट स्पॉट में ही न बदल दें और लंबी अंतरिक्ष यात्राओं व अंतरिक्ष अन्वेषण का काम ठंडे बस्ते में न डाल दिया जाए। पर इन सारे सवालों के बीच भी ताजा उपलब्धि का महत्व कहीं से भी कम नहीं होता। बात चाहे साइंटिस्टों को अंतरिक्ष में भेजने की हो या किसी पर्यटक को, यह काम बेहद मुश्किल है। ऐसे कई खतरे हैं जिनका सामना पूरी ट्रेनिंग के बाद भी अंतरिक्षयात्रियों को करना पड़ता है। जैसे, उनका सामना गहन अंतरिक्ष से आने वाली कॉस्मिक किरणों से हो सकता है। भारहीनता के दौरान उनके रक्तचाप में भी भारी उलटफेर हो सकता है। सबसे ज्यादा खतरा तो यान के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने का है। स्पेसएक्स की तरह एक अन्य प्राइवेट स्पेस एजेंसी वर्जिन गैलेक्टिक का स्पेसशिप अक्तूबर, 2014 में अपनी परीक्षण उड़ान के दौरान ध्वस्त हो गया था। उसमें यान का एक पायलट भी मारा गया था। इससे वर्जिन गैलेक्टिक के अभियान को भारी धक्का लगा था। यही वजह है कि ऐसी कंपनियां अंतरिक्ष के पर्यटकों की सौ फीसदी सुरक्षा की गारंटी नहीं ले पा रही हैं। हालांकि उन्होंने यात्रियों की सुरक्षा के कुछ उपाय अपनाना अवश्य शुरू कर दिया है। जैसे वर्जिन ग्रुप ने अपने यान में एक ऐसा ग्लाइड-स्लोप सिस्टम अपनाने की बात कही है जो यान के खराब होने की दशा में यात्रियों को सुरक्षित धरती पर वापस ला सकता है। इसी तरह कॉस्मोकर्स नामक स्पेस कंपनी ने अपने यात्रियों को ले जाने वाले रॉकेट और वापसी के कैप्सूल में एक पैराशूट सिस्टम लगाने की बात कही है, जिसका अभी भी सोवियत रूस के यानों में इस्तेमाल हो रहा है। पर अंतरिक्ष को छूने की तमन्ना ऐसी है कि करोड़ों का खर्च करने के साथ-साथ लोग ऐसे सारे जोखिम भी लेने से नहीं चूकते हैं।

स्पेस टूरिज्म की झलक

जहां तक बात दुनिया के पहले स्पेस टूरिस्ट की है, तो यह तमगा अमेरिकी टूरिस्ट डेनिस टीटो को मिला था, जिन्हें नासा के ऐतराज के बावजूद रूस ने सोयूज रॉकेट के सहारे इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन भेजना था। टीटो 30 अप्रैल, 2001 को वहां पहुंचे थे और इस तरह दुनिया के पहले स्पेस टूरिस्ट बन गए थे। उनके बाद दक्षिणी अफ्रीकी व्यवसायी मार्क शटलवर्थ (25 अप्रैल, 2002), अमेरिकी पूंजीपति ग्रेग ओल्सन (एक अक्तूबर, 2005), ईरान मूल की पहली महिला अनुशेह अंसारी (18 सितंबर, 2006) और एक सॉफ्टवेयर ऑर्किटेक्ट चार्ल्स सिमोनी (7 अप्रैल, 2007) ने पैसे खर्च करके अंतरिक्ष की सैर का आनंद लिया। कोई शक नहीं, अब तक निजी तौर पर स्पेस में भ्रमण को जाने वाले लोगों में प्राय: सभी बेहद दौलतमंद थे। डेनिस टीटो जैसे अमीरों ने इस महंगे शौक के लिए अरबों डॉलर चुकाए थे। अभी भी यह शगल सस्ता नहीं है। स्पेस की सैर कराने वाली प्रमुख कंपनी स्केल्ड कंपोजिट के यान ‘स्पेसशिप-2’ से अंतरिक्ष यात्रा के लिए दुनियाभर से जिन 600 लोगों ने बुकिंग करा रखी है, उनके टिकट की कीमत प्रति सीट ढाई लाख डॉलर है। इन लोगों को स्पेस की सैर कराई जाएगी, पर यदि कोई चांद पर जाने की मुराद रखता है, तो बताते हैं कि दो लोगों को एक निजी यान से वहां तक भेजने के टिकट की दर निजी कंपनियों ने डेढ़ अरब डॉलर रखी है। कह सकते हैं कि नासा दो सबसे ताजा मिशनों से कुल मिलाकर पांच अमेरिकी और एक जापानी अंतरिक्षयात्री ने धरती के 100 किलोमीटर ऊपर मौजूद कैरमन लाइन पार कर स्पेस को छूने का जो स्वाद चखा है, वह औरों को भी प्रेरणा देगा। इससे न सिर्फ प्राइवेट स्पेस एजेंसियों के कामकाज में बढ़ोतरी होगी, उनमें लोगों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि सुदूर अंतरिक्ष अनुसंधान के काम में भी प्रगति आएगी क्योंकि छोटे सफल मिशनों की कामयाबी की नींव पर ही किसी बड़े अभियान को अंजाम देने का हौसला बढ़ता है।

... और यान बनाने की चुनौती

यूं तो जब हम किसी विमान में बैठते हैं, तो उड़ान भरते ही धरती से हमारा नाता टूट जाता और हम सब उस अंतरिक्ष से जुड़ जाते हैं जो अंतहीन विस्तारों तक फैला हुआ है। लेकिन मोटे तौर पर निजी कंपनियां अपने यानों से स्पेस कही जाने वाली जिस ऊंचाई तक टूरिस्टों को ले जाएंगी, वह जगह धरती की सतह से करीब 100 किलोमीटर ऊपर आकाश में है। जब कोई रॉकेट यात्रियों से भरे यान को इस ऊंचाई तक ले जाएगा, तो कहेंगे कि उन यात्रियों ने स्पेस को छुआ है। इस ऊंचाई पर स्पेस टूरिस्ट भारहीनता का अनुभव कर सकेंगे, स्पेस से वे पृथ्वी के ऐसे कल्पनातीत नजारों के दर्शन कर सकेंगे। हालांकि असीम ब्रह्मांड का हिस्सा होने के कारण पृथ्वी खुद भी अंतरिक्ष में स्थित है, खास तौर से यदि इसे हम बाहर से देखें, पर इस पर मौजूद रहते हुए अंतरिक्ष का पर्यटक बनना सच में एक अनूठी उपलब्धि माना जाएगा। इतिहास पर नजर डालने से पता चलता है कि इस स्पेस में झांकने वाले दुनिया के पहले नागरिक रूस के यूरी गागरिन थे जिन्होंने यह कारनामा 1961 में कर दिखाया था। उनके बाद भी स्पेस में वही लोग गए जिन्हें सरकारी अंतरिक्ष संगठनों ने शोध आदि उद्देश्यों के लिए चुना था। पर वर्ष 1996 में कुछ उद्यमियों ने पर्यटन के लिए अंतरिक्ष को एक शानदार विकल्प बनाने के उद्देश्य से एक वैश्विक प्रतियोगिता की शुरुआत की और इसके लिए दस लाख डॉलर के अंसारी प्राइज की घोषणा की। प्रतियोगिता में 26 टीमों ने हिस्सा लिया, जिन्हें ऐसा अंतरिक्ष यान बनाने की चुनौती दी गई जो कम से कम तीन यात्रियों को अंतरिक्ष में ले जा सकता हो। प्रतियोगिता की अहम शर्त यह थी कि ऐसा यान दोबारा इस्तेमाल में आ सकने वाला (रीयूजेबल) हो और इसके निर्माण का खर्च निजी हो, न कि सरकारी। इन सारी शर्तों के साथ जो टीम विजेता बनी, उसका नाम था ‘मोजावे एयरोस्पेस वेंचर्स’। इस टीम के दो संस्थापक थे- पहले-कंप्यूटर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक पॉल एलन और दूसरे- कंपनी स्केल्ड कंपोजिट के बर्ट रुटान। इस टीम ने स्पेस की सैर के दो इंतजाम किए। उन्होंने तीन सीटों वाला एक अंतरिक्ष-विमान बनाया ‘स्पेसशिप वन’ और इसे अंतरिक्ष में पहुंचाने वाला रॉकेट ‘व्हाइट नाइट’ बनाया। स्पेसशिप-वन ने 4 अक्तूबर, 2004 को अंतरिक्ष में निजी सैर की सारी शर्तें पूरी करते हुए प्रतिष्ठित अंसारी पुरस्कार जीता था।

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