गुम दस्तावेज के लिए बैंक ही जिम्मेदार

गुम दस्तावेज के लिए बैंक ही जिम्मेदार

पुष्पा गिरिमाजी

मैंने अपनी बेटी की उच्च शिक्षा के लिए एजूकेशन लोन लिया था और इसकी अंतिम किस्त का भुगतान पिछले साल मार्च के तीसरे सप्ताह में किया। इसी दौरान कोविड-19 के प्रसार को रोकने के उद्देश्य से सरकार ने राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा कर दी। इसके चलते मैं लोन के लिए बंधक के तौर पर दिए गए प्रॉपर्टी डीड को लेने तुरंत बैंक नहीं जा सकी। अब लॉकडाउन में हालिया छूट के बाद मैं कागजात लेने के लिए बैंक गयी, लेकिन वहां जाकर मुझे तब गहरा धक्का लगा जब बैंक ने मुझे बताया कि मेरे कागज खो गये हैं। अब मुझे आगे क्या करना चाहिए?

वास्तव में यह दुर्भाग्यपूर्ण है और बैंक को अपनी लापरवाही के कारण आपको होने वाले नुकसान को कम करने के लिए हर संभव प्रयास करना होगा। इस प्रयास में इनकी देखभाल के दौरान टाइटल डीड के खोने की पावती, इस नुकसान के संबंध में थाने में एफआईआर दर्ज कराना, इसके संबंध में एक नोटिस को तीन अखबारों (अंग्रेजी एवं क्षेत्रीय भाषा) में छपवाना और सब रजिस्ट्रार कार्यालय से टाइटल डीड की प्रमाणित प्रतिलिपि उपलब्ध कराना और कोई भी मदद जो संपत्ति पर आपके हक को स्थापित करता हो, करना शामिल है। और इस सबकी कीमत उसे वहन करनी होगा। इसके अलावा, बैंक को उस वित्तीय नुकसान की भरपाई भी करनी होगी जो मूल कागजात के बिना संपत्ति बेचने पर आपको होगा। बेशक इस नुकसान का अभी मूल्यांकन करना मुश्किल है क्योंकि यह बिक्री के समय संपत्ति के मूल्य और कागजात न होने के कारण तात्कालिक परिस्थितियों और मूल्य पर निर्भर करेगा। ऐसे मामलों में क्षतिपूर्ति का आदेश देते वक्त उपभोक्ता अदालतें कुछ कच्चा अनुमान लगा सकती हैं, लेकिन बैंक को तो मुआवजा देना ही होगा। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो आपको इस मामले में उपभोक्ता अदालत की मदद लेनी होगी।

क्या आप इसी तरह के किसी मामले में उपभोक्ता अदालत के हालिया फैसले का हवाला दे सकते हैं?

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बनाम अमितेश मजूमदार (2019 के आरपी नंबर 2732) मामले में, 3 जनवरी, 2020 को दिए अपने फैसले में निचली उपभोक्ता अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा जिसके तहत बैंक को आदेश दिया गया कि वह उपभोक्ता को पांच लाख रुपया बतौर मुआवजा और 30 हजार रुपये मूल्य के रूप में अदा करे।

उसने निचली उपभोक्ता अदालत के उस आदेश को भी बरकरार रखा जिसमें बैंक से एफआईआर दर्ज कराने और कागजात खोने के संबंध में तीन समाचारपत्रों में नोटिस छपवाने का आदेश दिया गया था।

शीर्ष उपभोक्ता अदालत के समक्ष अपनी पुनरीक्षण याचिका में बैंक ने कहा कि वह टाइटल डीड की एक प्रमाणित प्रति प्राप्त करने, समाचार पत्रों में विज्ञापन जारी करने और बैंक के उपभोक्ता को कागजात खोने संबंधी विवरण के लिए एक पावती देने के लिए तैयार है। हालांकि उसने नकद मुआवजे के खिलाफ जिरह की। बैंक की दलील को खारिज करते हुए शीर्ष उपभोक्ता अदालत ने मुआवजे एवं मूल्य संबंधी आदेश को बरकरार रखते हुए यह इंगित किया कि यदि उपभेक्ता बगैर टाइटल डीड के संपत्ति को बेचने की कोशिश करेगा तो उसे नुकसान होगा।

आयोग ने इस पर गौर किया, ‘बाजार में कोई भी मार्केट वैल्यू पर उस प्रॉपर्टी को खरीदने में राजी नहीं होगा जब उसे पता चलेगा कि बेचने वाले के पास इसके मूल टाइटल डीड नहीं हैं। हमेशा यह आशंका बनी रहेगी कि कोई बेईमान व्यक्ति अचल संपत्ति के टाइटल डीड्स का दुरुपयोग कर सकता है। वह उस टाइटल डीड को बोनाफाइड ऋणदाता के साथ जमा करके उसका दुरुपयोग कर सकता है। बिना टाइटल डीड के प्रॉपर्टी को बेचने से यदि इसकी कीमत में कमी आती है तो जिला उपभोक्ता फोरम द्वारा दिए गए मुआवजे का आदेश और इसे राज्य आयोग द्वारा बरकरार रखे जाने के बाद भी यह प्रॉपर्टी के मार्केट वैल्यू में आई क्षति के समान नहीं है।’

आयोग ने अन्य उन समस्याओं के प्रति भी ध्यान दिलाया जो टाइटल डीड के न होने पर उपभोक्ता को झेलनी पड़ सकती हैं। आयोग ने कहा, ‘अगर शिकायतकर्ता संपत्ति के कागजात के जरिये संपत्ति लोन लेना चाहे तो टाइटल डीड के बगैर वह ऐसा नहीं कर पाएगा क्योंकि उसे बाजार में कोई भी ऐसा नहीं मिलेगा जो संपत्ति के टाइटल डीड के बगैर लोन दे दे। कोई भी बैंक एक अचल संपत्ति के खिलाफ ऋण देने के लिए तैयार नहीं हो सकता है जब तक कि संपत्ति के टाइटल डीड इसके लिए जमा नहीं होते हैं। इसलिए निचली उपभोक्ता अदालतों द्वारा दिया गया मुआवजे का आदेश न्याय संगत है।’ इसलिए इस केस का जिक्र आप अपनी प्रॉपर्टी की कीमत और आपको हुए नुकसान का अंदाजा लगाते हुए उचित मुआवजा पाने के लिए जिरह में कर सकते हैं। आप वेबसाइट पर जाकर आयोग के मूल आदेश को देख सकते हैं।

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