वीएसके के मंच से पंडित राजन-साजन मिश्र, गिरिजा देवी, अश्विनी भिड़े-देशपांडे, उल्हास कशालकर, विद्याधर व्यास, वेंकटेश कुमार, छन्नूलाल मिश्र, शुभा मुद्गल, लक्ष्मी शंकर, शुजात खान और अनेक अन्य शीर्ष कलाकार जुड़े। साथ ही कपूर की विशेष रुचि उन कलाकारों को सुनने और सामने लाने में रही, जिन्हें मुख्यधारा के मंचों पर पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा था।
युवावस्था में विनोद कपूर कुछ मित्रों के साथ बरेली से रामपुर के एक मेले में यूं ही घूमने निकले थे। संगीत में उनकी कोई विशेष दिलचस्पी नहीं थी। मेले की भीड़ में अचानक दूर से आती एक स्त्री-आवाज़ ने उन्हें रोक लिया। आवाज़ का पीछा करते हुए वे एक खुले मंच तक पहुंचे, जहां एक गायिका गा रही थीं। रात, खुला आकाश, सामने बैठे कुछ श्रोता और हवा में तैरता वह स्वर—कपूर वहीं बैठ गए। कार्यक्रम समाप्त होने तक उठे नहीं। फिर उनके भीतर एक और इच्छा पैदा हुई—इस गायिका को बरेली बुलाकर सुनना चाहिए। वह गायिका थीं गिरिजा देवी।
कपूर ने साहस करके उनसे संपर्क किया और उन्हें बरेली आने का निमंत्रण दिया। 1960 के दशक का वह प्रसंग बाद के पूरे जीवन की दिशा तय करने वाला साबित हुआ। गिरिजा देवी तब वह विराट सार्वजनिक नाम नहीं थीं, जो आगे चलकर बनीं। स्वयं कपूर के शब्दों में, तब वे ‘बेगम अख्तर’ नहीं थीं। लेकिन उस रात का संगीत इतना गहरा था कि कपूर के भीतर शास्त्रीय संगीत के लिए एक ऐसा दरवाज़ा खुल गया, जो फिर कभी बंद नहीं हुआ।
संगीत मंच के बजाय बैठक में
1980 के दशक में पंचशील पार्क स्थित कपूर के घर में संगीत की अनौपचारिक महफ़िलें होती थीं। भोजन के बाद बैठक शुरू होती, लोग फर्श पर बैठते, संगीत शुरू होता और रात कब गहराती चली जाती, पता नहीं चलता। धीरे-धीरे इन निजी शामों ने एक ऐसी परंपरा का रूप ले लिया, जिसमें कलाकार मंच पर ‘प्रदर्शन’ करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि सामने बैठे श्रोताओं के साथ संगीत साझा करने वाला सहभागी बन जाता था। कपूर का आग्रह था कि संगीत को सुनने के लिए दूरी नहीं, निकटता चाहिए—कलाकार और श्रोता आमने-सामने हों, जूते बाहर उतर जाएं, लोग फर्श पर बैठें, बीच-बीच में बातचीत हो, ‘वाह’ या ‘क्या बात है’ जैसी स्वाभाविक प्रतिक्रियाएं दबाई न जाएं और कलाकार को घड़ी देखकर अपनी रचना समाप्त न करनी पड़े। वर्ष 1998 में यह निजी प्रयोग सार्वजनिक रूप ले सका। रोहित खट्टर के माध्यम से इंडिया हैबिटैट सेंटर के साथ बातचीत हुई और 28 अगस्त 1998 को पहली वीएसके बैठक आयोजित हुई। पंडित राजन-साजन मिश्र इसके पहले कलाकार बने। आयोजन का स्थान था हैबिटैट सेंटर का तहखाना।
कपूर को आशंका थी कि क्या सार्वजनिक संस्था उनके घर की बैठक जैसा वातावरण बना पाएगी। लेकिन जब वे कार्यक्रम से लगभग डेढ़ घंटे पहले पहुंचे, तो सीढ़ियों से लेकर सभागार तक की व्यवस्था देखकर प्रभावित हुए—फूल, जूते रखने की जगह, चाय-कॉफी, फर्श पर सफेद चांदनी, गद्दे और गोल तकिए; पीछे उन लोगों के लिए कुर्सियां थीं, जो फर्श पर नहीं बैठ सकते थे।
शास्त्रीय संगीत को गरिमा
शुभा मुद्गल ने कलाकारों का परिचय कराया और राजन-साजन मिश्र ने आधी रात तक गाया। वह केवल एक सफल कार्यक्रम नहीं था; वह एक विचार का सार्वजनिक प्रमाण था—कि शास्त्रीय संगीत को बड़े सभागार की औपचारिकता के बिना भी, बल्कि शायद उससे अधिक प्रभावशाली ढंग से, सुना जा सकता है।
क्षेत्र से जुड़ाव
कपूर का मानना है कि कलाकार को श्रोता की ऊर्जा दिखाई और सुनाई देनी चाहिए। सभागार में मंच और दर्शक के बीच दूरी होती है। रोशनी मंच पर केंद्रित होती है और श्रोता अंधेरे में बैठता है। बैठक में स्थिति उलट जाती है। कलाकार श्रोताओं के चेहरों को पढ़ सकता है, उनकी प्रतिक्रिया महसूस कर सकता है और उसी क्षण अपने संगीत को आगे बढ़ा सकता है।
कपूर के अनुसार, बैठक में कलाकार और श्रोता के बीच सहज आदान-प्रदान संगीत का अभिन्न हिस्सा बन जाता है। कलाकार पर समय की वैसी पाबंदी नहीं होती, जैसी औपचारिक संगीत समारोहों में होती है। वह अपनी पसंद के राग को अपनी गति से विकसित कर सकता है। इसीलिए वीएसके की बैठकों में कई बार एक ही कलाकार ने घंटों गाया। ऐसे अवसरों ने यह प्रमाणित किया कि संगीत की गहराई को समय की कृत्रिम सीमा में बांधना आवश्यक नहीं।
वीएसके के मंच से पंडित राजन-साजन मिश्र, गिरिजा देवी, अश्विनी भिड़े-देशपांडे, उल्हास कशालकर, विद्याधर व्यास, वेंकटेश कुमार, छन्नूलाल मिश्र, शुभा मुद्गल, लक्ष्मी शंकर, शुजात खान और अनेक अन्य शीर्ष कलाकार जुड़े। साथ ही कपूर की विशेष रुचि उन कलाकारों को सुनने और सामने लाने में रही, जिन्हें मुख्यधारा के मंचों पर पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा था। इस अर्थ में वीएसके केवल प्रतिष्ठित कलाकारों का मंच नहीं था; वह प्रतिभा की खोज का भी एक माध्यम था।
परवीन सुल्ताना का सम्मोहन
कपूर की संगीत-दृष्टि को समझने के लिए परवीन सुल्ताना से जुड़ा एक प्रसंग शायद सबसे अधिक अर्थपूर्ण है। पंचशील पार्क स्थित उनके घर में एक रात परवीन सुल्ताना ने ऐसा गाया कि श्रोता देर तक उस सम्मोहन से बाहर नहीं आ सके। कार्यक्रम समाप्त होने पर उनके मित्र, ठाकुर हरनारायण सिंह ने उनसे पूछा—‘आपने हमारे संगीत समारोह में इस तरह क्यों नहीं गाया?’ परवीन सुल्ताना का उत्तर था—‘लेकिन आपने मुझे ऐसा माहौल ही कहां दिया था!’ यह छोटा-सा वाक्य वीएसके बैठक की पूरी अवधारणा को जैसे एक पंक्ति में समेट देता है।
कपूर के लिए माहौल केवल सजावट का दूसरा नाम नहीं था। माहौल का अर्थ था विश्वास। कलाकार को यह विश्वास कि सामने बैठे लोग सुनने आए हैं, समय बिताने नहीं; और श्रोता को यह भरोसा कि कलाकार अपनी कला को किसी निर्धारित समय में पूरा करने नहीं, बल्कि उसके भीतर उतरने आया है।
व्यवसाय से संगीत तक
विनोद कपूर का जीवन केवल संगीत की कहानी नहीं है। साल 1960 के दशक में उन्होंने मुर्गीपालन के क्षेत्र में काम शुरू किया और 1967 में ‘केगफार्म्स’ की स्थापना की। कपूर ने भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल पक्षियों के विकास पर विशेष ध्यान दिया और बाद में ‘कुरोइलर’ के माध्यम से ग्रामीण परिवारों की आजीविका से जुड़ा एक अलग मॉडल विकसित किया। एक ओर वैज्ञानिक अनुसंधान, व्यवसाय और ग्रामीण आजीविका; दूसरी ओर राग, ठुमरी, दादरा और बैठक—ऊपर से ये दो संसार बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। लेकिन कपूर के व्यक्तित्व में इनके बीच एक गहरा साझा सूत्र है : स्थापित रास्ते को स्वीकार करने के बजाय अपने अनुभव से बेहतर रास्ता खोजने की जिद।
व्यवसाय में उन्होंने भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल पक्षी विकसित करने की कोशिश की; संगीत में उन्होंने भारतीय संगीत को उसके आत्मीय सामाजिक वातावरण में वापस सुनाने की कोशिश की।
संगीत की सांस्कृतिक विरासत
कपूर का एक विशेष आग्रह पूरब अंग गायकी को लेकर रहा—ठुमरी, दादरा, चैती और उससे जुड़ी बनारसी सांगीतिक परंपरा। वे ‘हल्का शास्त्रीय’ कहे जाने वाले संगीत को हल्का मानने के पक्ष में नहीं थे। उनके लिए यह गंगा-जमुनी तहज़ीब, बनारस की सांस्कृतिक स्मृति और भारतीय जीवन की एक विशिष्ट संवेदना का प्रतिनिधि था।
इसी सोच से उन्होंने पूरब अंग उत्सव और गिरिजा देवी के नाम से पुरस्कार की पहल की। देशभर से कलाकारों की खोज, प्रतिभाओं की पहचान और युवा कलाकारों को अवसर देना—यह सब किसी सरकारी योजना की तरह नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के निजी जुनून की तरह शुरू हुआ। जिस कलाकार की आवाज़ ने युवावस्था में उन्हें संगीत से जोड़ा था, उसी कलाकार की सांगीतिक परंपरा को आगे बढ़ाना उनके लिए जीवन के एक वृत्त के पूरा होने जैसा था।
संगीत रसिक की बड़ी पूंजी
कोविड से पहले तो आलम यह था कि हर पखवाड़े वे बैठक का आयोजन करते थे। किंतु कोविड के दौरान उनकी धर्मपत्नी रानी कपूर का निधन हो जाने से कपूर थोड़ा विचलित ज़रूर हुए। उल्लेखनीय है कि रानी कपूर संगीत की बैठकों के आयोजन में दिन-रात एक कर देती थीं। अब कपूर लगभग हर माह एक बैठक करते हैं। वस्तुतः कपूर की असली उपलब्धि यह है कि उन्होंने श्रोता होने की गरिमा को पुनर्स्थापित किया। उन्होंने दिखाया कि संगीत सुनना भी एक कला है। उसके लिए धैर्य चाहिए, समय चाहिए, निकटता चाहिए और सबसे बढ़कर—मन चाहिए। आज जब संगीत का बड़ा हिस्सा तेज रोशनी, विशाल सभागार, ध्वनि-विस्तारक यंत्रों और क्षणिक प्रभाव की संस्कृति में घिरता जा रहा है, कपूर की बैठक हमें एक पुरानी लेकिन बेहद ज़रूरी बात याद दिलाती है—संगीत अंततः किसी मंच पर नहीं, दो मनुष्यों के बीच घटित होता है : एक जो गाता है और दूसरा जो सचमुच सुनता है। विनोद कपूर का जीवन उस एक स्वर के साथ चली इसी दीर्घ, आत्मीय और लगभग छह दशक लंबी यात्रा का नाम है।

