चैत्र नवरात्रि में त्रिकुट पर्वत स्थित वैष्णो देवी धाम राष्ट्रीय आस्था, श्रद्धा और संकल्प का सबसे जीवंत केंद्र बन जाता है।
देश में 51 शक्तिपीठों में से मौजूद हर शक्तिपीठ नवरात्रि के समय आस्था और आध्यात्म का जगमगाता केंद्र होता है, लेकिन जब बात वैष्णो देवी मंदिर की हो, तब तो कहना ही क्या? विशेषकर चैत्र नवरात्रि के समय यह राष्ट्रीय आस्था का सबसे स्पंदित केंद्र बन जाता है। ऐसा क्यों होता है, इसे समझने के लिए हमें वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा पर चलना होगा। जम्मू-कश्मीर के कटरा से लगभग 12-13 किलोमीटर ऊपर की तरफ त्रिकूट पर्वत पर लगभग 5200 फीट की ऊंचाई पर स्थित वैष्णो देवी मंदिर तीन पिंडियों (महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती) के रूप में विराजमान हैं। श्रद्धालुओं के आवक के हिसाब से देश के सबसे व्यस्त मंदिरों में से एक वैष्णो देवी मंदिर का प्रबंधन वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड करता है। यहां पैदल, घोड़ा, पालकी, हेलीकाॅप्टर और हाल के सालों में ‘रोप वे’ सुविधा के जरिये श्रद्धालु पहुंचते हैं। आमतौर पर इस मंदिर मंे हर साल 80 लाख से एक करोड़ के बीच लोग दर्शन के लिए आते हैं और इनमें करीब 30 से 40 प्रतिशत श्रद्धालु सिर्फ नवरात्रि के समय ही आ जाते हैं, उनमें भी चैत्र नवरात्रि पर विशेष रूप से सबसे ज्यादा। वैष्णो देवी मंदिर भारत के सबसे अधिक दर्शनीय और व्यवस्थित तीर्थस्थलों में गिना जाता है।
इस मंदिर की बहुआस्था का कारण इसकी पौराणिक और आध्यात्मिक मान्यता है। माना जाता है कि वैष्णो देवी मंदिर जिस त्रिकुटा पर्वत पर स्थित है, उसकी ही गुफा मंे देवी मां ने तपस्या की थी, साथ ही भैरवनाथ वध की कथा भी यहां की धार्मिक चेतना का केंद्र है। चैत्र नवरात्रि चूंकि देवी शक्ति के जागरण का समय माना जाता है, इसलिए यह स्थान चैत्र नवरात्रि के समय न केवल विशिष्ट आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है बल्कि देश विदेश से आये श्रद्धालुओं से भी भर जाता है। चैत्र नवरात्रि का समय देवी उपासना का चरमकाल समझा जाता है। कचैत्र नवरात्रि से हिंदुओं का नववर्ष प्रारंभ होता है। ऐसे में यह समय सिर्फ पूजा का नहीं बल्कि नये संकल्पों का समय भी होता है। देशभर में जब घर-घर में इन दिनों घट स्थापना होती है, तब उसका राष्ट्रीय प्रतिरूप वैष्णो देवी मंदिर के रूप में दिखता है। उत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्र में स्थित यह मंदिर उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम, देश की सभी दिशाओं को आपस में जोड़ता है। कश्मीर की धरती पर इसका स्थित होना केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय एकता का प्रतीक भी है। जब देश के कोने-कोने से लाखों लोग चैत्र नवरात्रि के समय या साल में किसी भी समय आस्था के इस हृदय स्थल तक पहुंचते हैं, तब यह तीर्थस्थल भर नहीं रह जाता बल्कि राष्ट्रीय समावेशन का इंद्रधनुषी दृश्य बन जाता है।
इस डिजिटल मीडिया युग में इसकी जगमगाहट कुछ और ही निखरकर देश के कोने-कोने तक अपना उजास पहुंचाती है, जिसका जरिया मंदिर का लाइव दर्शन, सोशल मीडिया ट्रेंड, आॅनलाइन पंजीकरण और डिजिटल कतार प्रबंधन में भी देखा जा सकता है। चैत्र नवरात्रों मंे यह मंदिर एक राष्ट्रीय इवेंट सेंटर की तरह उभरता है। शायद ही कोई ऐसा बड़ा न्यूज चैनल हो, जो चैत्र नवरात्रि के समय एक बार या पूरे नौ दिन तक वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा न करता हो। चैत्र नवरात्रि के दौरान देशभर के न्यूज चैनल जिनको धार्मिक कवरेज भी नहीं करनी होती, वह भी अलग-अलग उद्देश्यों से वैष्णो देवी मंदिर का कवरेज जरूर करते हैं। ऐसे में यह पूरे देश के लोगों के बीच राष्ट्रीय चेतना बनकर उभरता है। यह देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को भी बहुत अच्छी तरह से प्रभावित करता है। चूंकि कटरा और उसका आसपास का क्षेत्र हमेशा मंदिर के तीर्थयात्रियों से भरा होता है, इसलिए इस क्षेत्र की आर्थिक स्थिति बेहद सम्पन्न है और जम्मू-कश्मीर की सम्पन्नता में भी इस मंदिर की एक विशिष्ट भूमिका है। नवरात्रि के समय और बाकी समय भी होटल, ट्रांसपोर्ट, स्थानीय व्यापार, सब उच्चतम स्तर तक पहुंच जाते हैं। स्थानीय लोगों को हर समय यहां अस्थायी रोजगार उपलब्ध रहता है, बशर्ते वो करना चाहें। इसलिए वैष्णो देवी मंदिर सिर्फ धार्मिक आस्था का ही नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक गतिविधि का भी एक सचल केंद्र बनकर उभरता है।
सालभर खुला रहने वाला और कठिन पर्वतीय यात्रा का अनुभव देने वाला यह मंदिर सामूहिक संकल्प और तपस्या का प्रतीक भी है। चैत्र नवरात्रि के समय ये सब चीजें एक साथ सक्रिय होती हैं। इसलिए यह देश में मौजूद अन्य शक्तिपीठों से अलग हो जाता है। जैसा कि हम जानते हैं अविभाजित भारत में 51 शक्तिपीठ थे, जिनमें से अब कुछ पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमा में चले गये हैं। फिर भी देश में स्थित महत्वपूर्ण शक्तिपीठों मसलन कामाख्या मंदिर, ज्वालमुखी मंदिर और काली घाट मंदिरों के मुकाबले वैष्णो देवी मंदिर की अलग विशेषता इस मायने में है कि यह देश के दूसरे शक्तिपीठों से इतर सर्वाधिक संगठित और प्रबंधित तीर्थस्थान है। इसलिए यह विशेष रूप से उत्तर भारत के मध्यवर्गीय और ग्रामीण लोगों की संकल्प यात्रा का केंद्र बन जाता है। यहां की धार्मिक यात्रा में श्रम, आस्था और सामूहिकता सबके दर्शनीय होते हैं।
आस्थावान हिंदू यहां अपने जीवन के हर संकट का समाधान खोजने की कोशिश करता है। इस कारण यह मंदिर सिर्फ भक्ति और पूजा का स्थल नहीं बल्कि राष्ट्रीय, भावनात्मक सहारा बन जाता है। इ.रि.सें.

