नृत्य, संगीत, आस्था और प्रकृति के अद्भुत संगम वाला लाई हाराओबा उत्सव मणिपुर की जीवंत सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है।
भारत के उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर की सांस्कृतिक पहचान जितनी प्राचीन है, उतनी ही जीवंत भी है। इसका सबसे सुंदर प्रतीक है यहां का लाई हाराओबा उत्सव। इसका मतलब है देवताओं की प्रसन्नता यानी ‘देव उत्सव’। जो न केवल मणिपुर की सभ्यता, लोक आस्था और जीवनदर्शन का जीवंत मंच है बल्कि इस उत्सव के जरिये मानव जीवन की नश्वर यात्रा और प्रकृति के साथ उसके आत्मीय संबंधों को भी भव्य ढंग से अभिव्यक्ति मिलती है। मुख्यतः मैतेई समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला यह उत्सव लगभग एक महीने तक चलता है, जो आगामी 12 मई को संपन्न होगा।
देव पूजा और सृष्टि की उत्पत्ति का जश्न
इस उत्सव में देवताओं की पूजा की जाती है, सृष्टि की उत्पत्ति का जश्न मनाया जाता है और मानव जीवन की यात्रा तथा प्रकृति के साथ उसके संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिशें की जाती हैं। यह उत्सव उमंग और उत्साह की सामूहिक अभिव्यक्ति होता है।
परंपराओं के प्रति श्रद्धा
मणिपुर का समाज धार्मिक और उत्सवप्रिय है। अपनी परंपराओं पर मणिपुर के लोगों को गर्व भी है। इसलिए प्राचीनकाल से ही मैतेई समुदाय द्वारा मनाये जाने वाले इस उत्सव पर आज तक बाजार या किसी दूसरे कारकों का जरा भी असर नहीं पड़ा, जिससे कि इस उत्सव में कभी कोई कमी दिखी हो। मैतेई समुदाय के लोग अपने पुरखों द्वारा मनाये जाने वाले देवताओं की पूजा के इस उत्सव को आज भी उतने ही उत्साह और उमंग के साथ मनाते हैं।
नृत्य में सृष्टि की विकास गाथा
लाई हाराओबा उत्सव में ‘मैबी’ यानी महिला पुजारिनें और ‘मैबा’ यानी पुरुष पुजारी, दोनों ही मुख्य पात्र होते हैं। उत्सव के दौरान महिला पुजारिनों द्वारा किया जाने वाला भव्य लोकनृत्य मनोरंजनभर ही नहीं होता बल्कि इस नृत्य में सृष्टि के क्रमिक विकास की एक लयात्मक कथा प्रस्तुत की जाती है। ये कथा दर्शातेे नृत्य अलग-अलग विषयों में अलग-अलग भाव-भंगिमाओं वाले होते हैं जिनके विषय मुख्यतः पृथ्वी की उत्पत्ति, मानव का जन्म, कृषि की शुरुआत, प्रेम और सामाजिक संबंधों को बड़े विस्तार और मनभावन ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। ये नृत्य एक तरह से पृथ्वी में जीवन उत्पन्न होने की क्रमिक ढंग से कहानी कहते हैं। कुल मिलाकर लाई हाराओबा उत्सव एक तरह से मानव जीवन का लोक इतिहास है, जिसे सदियों से मैतेई समाज अपनी आने वाली पीढ़ियों को विरासत के रूप में सौंपता रहा है। इसलिए कहते हैं मणिपुर की संस्कृति को समझना हो तो यहां के लाई हाराओबा उत्सव में शामिल होना चाहिए या उसे प्रत्यक्ष देखना चाहिए।
लोककथाएं और धार्मिक मान्यताएं
इस उत्सव में स्थानीय मिथकों, लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं का सुंदर और सकारात्मक समावेश है। इस उत्सव से इस समुदाय की धार्मिक आस्था व समाज के नैतिक मूल्यों की भी झलक मिलती है।
देवी-देवताओं की सरस कथाएं
यह उत्सव विशेषतः पंथोइबी और निंगथौ जैसे देवी-देवताओं की सरस कथाओं को नृत्य और गीत के साथ जीवंत ढंग से पेश करने का तरीका है। जैसे कि उत्तर-पूर्व के ज्यादातर उत्सव व्यक्तिगत न होकर सामुदायिक होते हैं, उसी तरह यह भी सामुदायिक उत्सव है। पूरा समुदाय मिलकर इस खुशी का आयोजन करता है, इसमें हिस्सेदारी करता है और उसका आनंद उठाता है।
हरेक की विशिष्ट भूमिका
लाई हाराओबा उत्सव कोई एक व्यक्ति नहीं मनाता बल्कि पूरा गांव, पूरा समुदाय मिलकर इस उत्सव को मनाता है। लेकिन इस उत्सव में हरेक व्यक्ति की अपनी एक विशिष्ट भूमिका होती है। चाहे उसे अनुष्ठान में भाग लेना हो, नृत्य करना हो, विशेष वाद्य बजाना हो, खाना बनाना हो या उसमें सहयोग करना हो। कुछ लोगों की जिम्मेदारी सिर्फ सफाई करना और आयोजन स्थल की सुरक्षा करना भी होता है।
वाद्ययंत्रों का भी विशेष महत्व
इस उत्सव को मणिपुर की आत्मा का उत्सव कहा जाता है, जिसमें वाद्ययंत्रों का भी विशेष महत्व है। खासकर मणिपुरी ड्रम का, जिसे यहां की स्थानीय भाषा में ‘पुंग’ कहते हैं और ऐसा ही एक दूसरा वाद्य जो बहुत मशहूर है, उसे ‘पेना’ कहा जाता है। यह एक पारंपरिक तंतुवाद्य होता है, जिससे सुरीली धुनें विकसित की जाती है। इन दोनों वाद्यों की संगति से निकली ध्वनि पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर देती है।
ध्वनियाें की आध्यात्मिक ऊर्जा
लाई हाराओबा उत्सव में ध्वनियां दर्शकों को आध्यात्मिक ऊर्जा और अनुभव प्रदान करती हैं। यह सामूहिक उत्सव केवल अतीत की गाथाओं को ही नहीं दोहराता बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है।
इस उत्सव में प्रकृति के प्रति सम्मान, सामूहिक जीवन और संतुलित अस्तित्व का संदेश दिया जाता है। इसे मणिपुर की आत्मा का उत्सव कहा जाता है, जो हमें सीख देता है कि संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं बल्कि वर्तमान के जीने का ढंग भी होती है। इ.रि.सें.

