विदुषी शन्नो खुराना, शास्त्रीय संगीत की अमर धरोहर, 98 वर्ष की उम्र में भी रियाज़रत हैं। पद्मश्री और पद्मविभूषण सहित दर्जनों सम्मानों से सम्मानित, उनका जीवन संगीत, समर्पण और नवाचार की प्रेरक गाथा है, जो सुनने वालों को भाव-विभोर और प्रेरित करता है।
पद्मश्री, पद्मविभूषण सहित अन्य ढेर सारे पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित विदुषी शन्नो खुराना वर्तमान में देश की सबसे वरिष्ठतम शास्त्रीय गायिका हैं। संगीत को समर्पित विदुषी शन्नो खुराना की जिजीविषा गजब की है कि आज 98 वर्ष की उम्र में भी वे बिना नागा रियाज़ करती हैं और कहती हैं कि अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है। रामपुर सहसवान घराने की विदुषी डॉ. शन्नो खुराना की गणना उन बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न कलाकारों में होती है, जो विगत 80 वर्षों से अपने सुरीले गायन द्वारा संगीत रसिकों को रस-विभोर करने के साथ-साथ अपनी सांगीतिक सामाजिक ज़िम्मेदारियों का भी सफल निर्वाह कर रही हैं। संगीत उनका ओढ़ना-बिछौना है, संगीत उनकी आत्मा है, संगीत उनका जीवन है।
विदुषी शन्नो खुराना का जन्म 23 दिसंबर 1927 को वर्तमान राजस्थान में जोधपुर रियासत में तैनात रेलवे इंजीनियर चमन लाल कुमार और माता जमुना बाई के घर आंगन में हुआ। पांच बहनों और तीन भाइयों में से एक शन्नो खुराना का शुरू में नाम राजकुमारी रखा गया, किंतु जालंधर की एक महिला के नाम पर उनका नाम शन्नो रखा गया, जो एक अच्छे काम के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से जोधपुर आई थीं। जब शन्नो लगभग चार वर्ष की थीं, तब उनकी मां की एक रेल दुर्घटना में मृत्यु हो गई।
बालिका शन्नो को संगीत से शुरू से ही लगाव था। वह रेडियो पर रोशनआरा बेगम, हीराबाई बड़ोडेकर और नारायणराव व्यास की जादुई आवाज़ें ध्यान से सुनतीं और उन्हें गाने की कोशिश करतीं। उनकी आवाज़ भी सुरीली थी।
शन्नो खुराना जब 18 वर्ष की हुईं तो उनका विवाह डॉ. परमेश्वर लाल खुराना से हुआ, जो वायु सेना में चिकित्सक थे। विवाह के बाद नवविवाहिता शन्नो खुराना लाहौर गईं और अपने संगीत-प्रेम के विषय में अपने पति को बताया। पति डॉ. परमेश्वर लाल खुराना सहृदय व्यक्ति थे। उन्होंने बिना किसी की परवाह किए अपनी पत्नी शन्नो खुराना के शौक को परवान चढ़ाने में पूरा सहयोग करने का मन बनाया। उस समय अविभाजित भारत था और आकाशवाणी के संगीत प्रभाग का संचालन जीवनलाल मट्टू द्वारा किया जाता था।
वर्ष 1945 की शुरुआत में ही उन्होंने शन्नो खुराना की प्रतिभा को एक प्रतियोगिता में भांप लिया था। उन्होंने शन्नो खुराना को आकाशवाणी पर गाने के लिए आमंत्रित करते हुए पूछा— ‘रेडियो पे गाओगी?’ शन्नो खुराना पहली बार 1945 में लाहौर में ऑल इंडिया रेडियो के रिकॉर्डिंग स्टूडियो में गईं। वह बताती हैं कि रिकॉर्डिंग स्टूडियो में उनकी प्रस्तुति के बाद मिले पच्चीस रुपये से वह अत्यंत आह्लादित थीं।
वर्ष 1947 की शुरुआत में ही डॉ. परमेश्वर लाल खुराना लाहौर से दिल्ली स्थानांतरित हो गए। उन्होंने वायु सेना में चिकित्सक की नौकरी छोड़कर दिल्ली में निजी प्रैक्टिस शुरू की। देश विभाजन का दंश झेलते हुए घर शरणार्थियों से खचाखच भरा रहता था, जिनकी सेवा में शन्नो खुराना दिन-रात लगी रहती थीं। दो छोटे बच्चे और बिस्तर पर पड़ी सास की देखभाल की व्यस्तता में संगीत के रियाज़ के लिए समय ही नहीं बचता था। डॉ. परमेश्वर लाल खुराना शन्नो खुराना के संगीत के प्रति दीवानगी को समझते थे। एक दिन उन्होंने शन्नो खुराना को लगभग चेतावनी की मुद्रा में समझाया कि ‘यदि आपको अभ्यास करने के लिए समय नहीं मिला, तो आप सब कुछ खो दोगी।’ शन्नो खुराना अपने दिवंगत पति को आंखों की भीगी कोरों के साथ कृतज्ञतापूर्वक याद करती हैं।
इसी बीच खुराना दंपति की मुलाकात स्थापित सर्जन डॉ. जोशी से हुई। उनकी बेटी निर्मला जोशी, जो बाद में संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष बनीं, ने उन्हें अपने स्कूल ‘संगीत भारती’ में शास्त्रीय संगीत सिखाने के लिए आमंत्रित किया। यहीं शास्त्रीय संगीत के अन्य कलाकारों से भी शन्नो खुराना का राब्ता हुआ।
शन्नो खुराना अपने गुरु उस्ताद मुश्ताक हुसैन ख़ां को याद करते हुए बताती हैं कि 1964 में उनके देहावसान पर वह भीतर तक टूट गई थीं। वह उस्ताद मुश्ताक हुसैन ख़ां की एक सीख बहुत भावपूर्ण ढंग से बताती हैं कि उस्ताद कहा करते थे— ‘स्वर में कभी हिंदू या मुसलमान होता है क्या?’
विदुषी शन्नो खुराना विश्वविख्यात बहुमुखी गायिका तो हैं ही, भाव-प्रवण और सशक्त अभिनेत्री भी हैं। उन्हें तयशुदा रास्तों पर चलना कभी नहीं भाया। लीक से हटकर काम करना उनके स्वभाव में है। शास्त्रीय गायिका होते हुए भी उन्होंने 1956 में निर्देशक शीला भाटिया की ‘हीर रांझा’ में अभिनय करना स्वीकार किया। दिल्ली रंगमंच के लिए एकदम अनजान चेहरे वाली इस 29 वर्षीय युवती ने उस समय अपनी दमदार आवाज़, शुद्ध उच्चारण, आंखों की बेशकीमती चमक और भाव-प्रवण अभिनय से दर्शकों को इतना चकित कर दिया कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने शो के बाद उन्हें गले लगाकर कहा— ‘गजब कर दिया, लड़की।’ ‘हीर रांझा’ में ‘हीर’ की भूमिका निभाकर शन्नो खुराना सेलेब्रिटी बन गई थीं।
खुराना ने अपने कौशल को पूरी तरह शास्त्रीय ओपेरा बनाने में लगाने का फैसला किया। उन्होंने ‘सोहनी महिवाल’ पर काम करना शुरू किया, जो पंजाब की एक अन्य दुखांत प्रेम कहानी थी। उन्होंने ओपेरा में कम से कम 40 रागों को बुना, लेकिन यह शास्त्रीय ओपेरा पश्चिमी ओपेरा की तरह नहीं था। शन्नो खुराना बताती हैं कि उन्होंने ‘हर शब्द, यहां तक कि एक-एक भाव को संगीत की दृष्टि से सार्थक बनाया। शब्दों और मनोभावों के आधार पर रागों का चयन किया गया। मैं काकू-भेद (स्वर भिन्नता) की अवधारणा लेकर आई।’
शीला भाटिया की ‘हीर’ के रूप में चर्चाओं में आईं शन्नो खुराना ने 1960 और 70 के दशक के दौरान चार ऐतिहासिक शास्त्रीय संगीत ओपेरा— ‘सोहनी महिवाल’, ‘जहांआरा’, ‘चित्रलेखा’ और ‘सुंदरी’— बनाए।
खुराना का अंतिम ओपेरा ‘सुंदरी’ 1979 में प्रदर्शित हुआ। यह पंजाबी साहित्यकार भाई वीर सिंह द्वारा 1896 में लिखे सिख वीरता पर आधारित उपन्यास पर आधारित था। उस समय तक खुराना को आभास हो गया था कि रंगमंच उनकी आवाज़ और गायन को और समृद्ध कर रहा था। इस प्रस्तुति में भी उन्होंने नया प्रयोग किया। बचपन में जोधपुर में अपने घर पर प्रसिद्ध लोक गायिका अल्लाह जिलई बाई की आवाज़ में जो पुकार सुनी थी, उसका प्रयोग उन्होंने इसमें किया।
नए-नए प्रयोगों की पक्षधर शन्नो खुराना ने एक प्रस्तुति में ग़ालिब की ग़ज़ल ‘ऐ ताज़ा-वारेदान-ए-बिसात-ए-हवा-ए-दिल’ में अपने गुरु-पुत्र गुलाम तकी ख़ां को टप्पा गाने का अवसर दिया।
शन्नो खुराना बताती हैं कि उनके गुरु ठाकुर जयदेव सिंह कहते थे— ‘हम अपने संगीत का विभाजन या वर्गीकरण क्यों करें? आपने कभी सोचा कि हमारे राग-संगीत और हमारी जटिल ताल-प्रणाली का विकास कहां से हुआ? कुमार गंधर्व ने कहां से प्रेरणा ली? हमारा समृद्ध लोक-संगीत है, तो कुछ भी संगीत की सीमा से बाहर क्यों रहे?’
वर्ष 1968 में उन्होंने ‘गीतिका’ नामक एक सांस्कृतिक संस्था का गठन किया और संगीत तथा संगीतज्ञों से जुड़े अनेक मुद्दों को विभिन्न मंचों से उठाया। उन्होंने ‘भैरवी से सोहनी तक’ नामक कार्यक्रमों के माध्यम से संगीत की विभिन्न विधाओं में कार्यरत युवतियों और महिलाओं को खोज-खोजकर उन्हें राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी कला-साधना प्रस्तुत करने का स्वर्णिम अवसर प्रदान किया। इन कार्यक्रमों के माध्यम से शहनाई, हारमोनियम, सारंगी, तबला, सितार, पखावज, घटम और मृदंगम जैसी विधाओं में स्तरीय कार्य कर रही युवतियों और महिलाओं ने संगीत के क्षेत्र में अपनी अस्मिता सिद्ध की। इन कार्यक्रमों में मुख्य कलाकार भी महिलाएं होती थीं और संगत कलाकार भी महिलाएं ही होती थीं।
शन्नो खुराना ने दुर्लभ और लुप्त होते जा रहे रागों तथा उनकी रचनाओं की रिकॉर्डिंग संगीत नाटक अकादमी (दिल्ली), संगीत रिसर्च अकादमी (कोलकत्ता), फोर्ड फाउंडेशन और यूनेस्को (पेरिस) के लिए कराई। साथ ही संगीत की नई पीढ़ी को भी प्रशिक्षित किया।
केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी की रत्न सदस्यता (फैलोशिप), पंजाब संगीत नाटक अकादमी सम्मान, इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी सम्मान और ‘गोल्डन नाइटिंगेल ऑफ द ईस्ट’ (यूनेस्को) जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित डॉ. शन्नो खुराना को भारत सरकार ने पद्मश्री और पद्मविभूषण सम्मानों से नवाज़ा है। 98 वर्ष की इस आयु में भी पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त और संगीत की अनवरत साधना में व्यस्त शन्नो खुराना से बातें करना भी संगीत सुनने जैसा ही आनंददायक और हृदयस्पर्शी होता है। यह भाव अत्यंत प्रेरक हो जाता है, जब वे कहती हैं कि अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।

