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पारंपरिक खिलौनों की गौरवमयी विरासत

आर्थिकी काे संबल

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चीनी खिलौनों के आयात पर प्रतिबंध और सरकार के समर्थन से भारतीय खिलौना उद्योग को नया जीवन मिला है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों की पारंपरिक कलाएं अब पुनर्जीवित हो रही हैं। लकड़ी, मिट्टी और जरी-कारी के खिलौने वैश्विक स्तर पर पहचान पा रहे हैं।

भारतीय खिलौना उद्योग को बढ़ावा देने के सरकारी ऐलान से भारतीय खिलौना निर्माताओं का उत्साह बढ़ा है। यह जानकर हैरानी होगी कि 1.75 बिलियन अमेरिकी डॉलर के खिलौने चीन और ताइवान से भारत में आयात किए जाते हैं, जबकि हमारी खिलौना संस्कृति और परंपरा बहुत समृद्ध रही है।

महाराष्ट्र : यहां का प्राचीन भाटुकली मिनिएचर किचन टॉय सेट बच्चों में खासा लोकप्रिय रहा है। भाटुकली खिलौनों की चर्चा मराठी संत ज्ञानेश्वर द्वारा 12वीं सदी में लिखी ‘ज्ञानेश्वरी’ में भी मिलती है। पहले ये खिलौने तांबा और पीतल जैसी कीमती धातुओं से बनते थे, लेकिन महंगाई के मद्देनज़र इन्हें स्टील से भी बनाने लगे हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र के सावंतवाड़ी लकड़ी के खिलौने भी बहुत मशहूर हैं, जिन्हें आम की लकड़ी और पंगारा वृक्ष की लकड़ी से बनाया जाता है।

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उत्तर प्रदेश : आज से 20–22 साल पहले यूपी के रेलवे स्टेशनों पर लकड़ी के खिलौने खूब दिखते थे। चीनी खिलौनों के अतिक्रमण के बाद इनकी बिक्री पर बहुत बुरा असर पड़ा, लेकिन अब फिर से बनारस के वुडन टॉयज़ का भविष्य उज्ज्वल नज़र आ रहा है। इन खिलौनों का इतिहास 200 साल से ज्यादा पुराना है। यहां 500 से ज्यादा किस्म के लकड़ी के खिलौने बनते हैं। इनकी रेंज रुपये 10 से लेकर रुपये 2000 तक है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भले ही हमारे देश में इनकी बिक्री कम हो गई हो, लेकिन जापान और अमेरिका में इन्हें खूब पसंद किया जा रहा है।

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पश्चिम बंगाल : यहां बने लाख की चित्रकारी वाले एवं मिट्टी के खिलौने बहुत लोकप्रिय हैं। यहां के मूर्तिकार और खिलौना निर्माताओं की कारीगरी की तारीफ पूरी दुनिया में होती है। यहां इंसान, फल-सब्जियों, पशु-पक्षियों आदि के बिल्कुल वास्तविक दिखने वाले खिलौने व पुतले बनाए जाते हैं। साथ ही विभिन्न भगवानों की मूर्तियां बनाने में भी बंगाली कलाकारों का नाम पूरी दुनिया में विख्यात है। यहां बर्दवान जिले के नतुनग्राम में बने काठ के उल्लू खूब पसंद किए जाते हैं। पश्चिम बंगाल के पूर्व मिदनापुर जिले में दीमक के घोसले की मिट्टी से खिलौने बनते हैं। इस मिट्टी को तीन दिन तक पानी में डुबोकर रखा जाता है। फिर इससे खिलौने बनाकर गोबर के उपलों पर उन्हें पकाया जाता है। इसके बाद इन पर रंग होता है और अंत में लाख की डिज़ाइन से चित्रकारी की जाती है। यह ‘गाला पुतुल’ के नाम से प्रसिद्ध है।

कर्नाटक : यहां के रामनगर जिले के चन्नापटना में बने लकड़ी के खिलौने पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। ये खिलौने नैचुरल वेजिटेबल डाई से रंगे जाते हैं। यहां इन खिलौनों को बनाने की 200 साल पुरानी परंपरा है। लकड़ी के बने गुड्डे-गुड़िया, वाहन, पशु, विभिन्न भगवान एवं तरह-तरह के अन्य खिलौने बच्चों और बड़ों में समान रूप से लोकप्रिय हैं।

आंध्र प्रदेश : यहां के कृष्णा जिले में एक शहर है कोंडापल्ली। यहां बीते 400 सालों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी ये खिलौने बनाए जा रहे हैं। इनकी मांग दुनियाभर में है। ये टेला पोनिकी पेड़ की सॉफ्ट वुड से बने खिलौने हैं। सॉफ्ट वुड पर क्राफ्ट करके इसे आकृति देने के बाद इन पर वाटर या ऑयल कलर से डिज़ाइन की जाती है। इन खिलौनों की रेंज बहुत बड़ी है। पौराणिक आख्यानों पर आधारित दृश्य, पौराणिक पात्र, देवी-देवता, जानवर, ग्रामीण लोग और उनकी जीवनशैली, हाथी, पेन स्टैंड, सैनिक आदि खिलौने सबको खूब पसंद आते हैं।

ये भी मशहूर

तमिलनाडु की तंजावुर डॉल तंजावुर जिले में बनाई जाती हैं। ये रॉली-पॉली और बॉबलहेड डॉल्स बच्चों को खूब भाती हैं।

राजस्थान में कपड़े पर जरी या सूते की कढ़ाई के काम से बने गुड्डे-गुड़िया, घोड़े, हाथी, ऊंट, पक्षी आदि खिलौनों के साथ-साथ मिट्टी से बने खिलौने और उन पर कांच, जरी आदि का काम किए हुए खिलौने बच्चों और बड़ों को खूब पसंद आते हैं। इन्हें शोकेस में सजाने के लिए भी खूब इस्तेमाल किया जाता है।

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