लवासा महाराष्ट्र की सह्याद्री पहाड़ियों में बसा एक आधुनिक और आकर्षक हिल स्टेशन है। यूरोपीय शैली की इमारतें, शांत झील, स्वच्छ सड़कें और हरियाली इसे खास बनाती हैं। शहरों की भागदौड़ से दूर यह जगह सुकून, सुंदर नज़ारों और यादगार वीकेंड का अनोखा अनुभव देती है। यहां प्रकृति, आधुनिकता और पर्यटन का संतुलित संगम सैलानियों को आकर्षित करता है खूब।
वाकई दाद देने लायक है लवासा की खूबसूरती। फिर लवासा का मतलब ही है ठाठदार। यानी लवासा का रहन-सहन किसी ठाठ-बाट से कम नहीं है। इस लिहाज़ से यह नायाब भी है, क्योंकि यहां कुदरती खूबसूरती ही नहीं, बल्कि इंसानी खूबसूरती के भी दीदार होते हैं। इसका अंदाज़-ए-सूरत हू-ब-हू इटली के शहर पोर्टोफिनो से लिया गया है। सो, लवासा को मॉडर्न सिटी के नक्शे पर बना एक हिल स्टेशन कह सकते हैं। यह 100 वर्ग किलोमीटर, यानी करीब 25,000 वर्ग एकड़ इलाके में फैला है। यह ज़रा ऊंचाई पर बसा है—करीब 2100 फुट पर।
कह सकते हैं कि आज़ादी के बाद देश का पहला हिल स्टेशन बनने का गौरव लवासा को ही मिला है। ऊटी, मसूरी, शिमला, नैनीताल, डलहौज़ी, दार्जीलिंग वगैरह देश के सभी नामी हिल स्टेशन आज़ादी से पहले बने थे और अंग्रेज़ों की देन हैं। लवासा की प्राइवेट सिटी की रूपरेखा से लेकर निर्माण तक का सारा काम एक हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी ने किया है। यह वेस्टर्न घाट की मुलशी घाटी में बसा हुआ है। लवासा का निर्माण अभी थमा नहीं है, बल्कि जारी है। यह पांच कॉलोनियों में फैला है, जिनमें से दो भूभागों का निर्माण कार्य फिलहाल चल रहा है। ली माउंट हाई स्कूल खुल चुका है। विश्वविख्यात हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट कॉलेज ‘इकोल होटलियर’ भी यहीं स्थित है। एमबीए की पढ़ाई कराने वाली ‘क्रैस्ट यूनिवर्सिटी’ का भी यहां अपना रुतबा है।
यूरोप से मिलता-जुलता
लवासा के चप्पे-चप्पे की तस्वीरें वाकई किसी यूरोपीय शहर-सी लगती हैं। साफ-सुथरी सड़कें, खाली-खाली गलियां और सुंदर नज़ारे देख-देखकर आंखों को बड़ा सुकून मिलता है। यूं भी लवासा सह्याद्री पहाड़ों के बीच बसा है। बीचों-बीच 20 किलोमीटर लंबी वरसगांव झील लवासा की छटा को चार चांद लगा देती है। झील के आसपास की सेहतमंद आबोहवा महानगरों में वापस जाने का मन नहीं होने देती। शहरों के ट्रैफिक और प्रदूषण की मार से यहां बखूबी बचा जा सकता है। लोग शहरी भागमभाग से दूर भागकर यहां डेरा डालने अक्सर आते रहते हैं। यहां के हरे-भरे ढलान देखने लायक हैं।
पर्यटन रुझान को भुनाने के लिए कई नामी-गिरामी होटल खुल चुके हैं या खुल रहे हैं। बुज़ुर्गों के लिए खास शानदार ओल्ड एज होम भी है, जो रहने लायक ही नहीं, देखने लायक भी हैं।
लवासा एक घाटी है, जिसके चारों ओर हरे-भरे दरख्तों से लदे पहाड़ हैं और बीचों-बीच कलरव करता झील का जल। सड़कें काफ़ी हद तक खाली रहती हैं और बाज़ारों में भी खास चहल-पहल नहीं होती। सड़कों के किनारे पीले, सफेद और गुलाबी फूलों से सजे-धजे पेड़-पौधे सबका मन मोह लेते हैं। झील के किनारे खूबसूरत रंगों में रंगी बहुमंज़िला इमारतें कतार में खड़ी हैं—कहीं होटल हैं, कहीं कैफे, कहीं बैंक और कहीं रिहायशी मकान।
बोटिंग और मेरी-गो-राउंड
झील में बोटिंग का लुत्फ भी उठाया जा सकता है। खास तौर पर नन्हे-मुन्नो के लिए रेल इंजन नुमा बस ‘मेरी-गो-राउंड’ की सैर बड़ा आकर्षण है। झील के इर्द-गिर्द लोग पैदल सैर करना पसंद करते हैं। जहां तक निगाहें जाती हैं, बस मनोहर नज़ारे ही नज़र आते हैं। पास ही बच्चों के खेलने-कूदने के लिए चिल्ड्रन पार्क भी है।
इसकी तारीफ में कहा जा सकता है कि अगर कभी सपने में किसी दिलकश हिल स्टेशन को देखा हो तो लवासा उससे कहीं बेहतर लगेगा। एक अनुपम तालमेल से सजी यह पिक्चर-परफेक्ट घाटी पुरानी लगते हुए भी वर्ल्ड सिटी की तमाम खूबियों से लैस है। यहां बिताया गया वीकेंड यादगार गुलदस्ते की तरह ज़िंदगी भर खुशबू बिखेरता रहता है। एक दफा जाएंगे तो फिज़ाएं बार-बार बुलाती रहेंगी। कुल मिलाकर, लवासा एक विकासशील पर्यटन ठिकाना है।
अन्य आकर्षण भी
लवासा के अन्य आकर्षणों में टेमगढ़ बांध सबसे ऊपर है। लवासा आने-जाने वाले पर्यटक टेमगढ़ बांध देखने ज़रूर जाते हैं या जाने की इच्छा रखते हैं। बांध में गिरती जलधारा को देखना सुखद अनुभव होता है। यह बांध पुणे की पानी सप्लाई का प्रमुख स्रोत है। इसके अलावा पहाड़ों के बीच बहते वॉटरफॉल्स भी आकर्षण का केंद्र हैं। आसपास की कुदरती फिज़ाएं मन को पुलकित कर देती हैं।
हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर भी खास है। यह आयुर्वेदिक मसाज, योग क्लास और थेरैपी मसाज के लिए उत्तम है। सेंटर के चारों ओर फैली हरी-भरी घाटी तन और मन—दोनों को रिलैक्स कर देती है।
कैसे पहुंचें
लवासा महाराष्ट्र का एक हिल स्टेशन है। यह पुणे शहर से महज़ 65 किलोमीटर दूर है। मुंबई से भी लवासा जाया जा सकता है। हालांकि, सड़क मार्ग से दूरी करीब 200 किलोमीटर है। दिल्ली से उड़ान द्वारा पुणे पहुंचने में लगभग दो घंटे लगते हैं। इसके बाद सड़क मार्ग से करीब दो घंटे का सफर तय कर लवासा पहुंचा जा सकता है।
मुंबई और पुणे से राज्य परिवहन की बसें भी लवासा आती-जाती हैं। दिल्ली से ट्रेन द्वारा आने पर पुणे रेलवे स्टेशन उतरना पड़ता है। वहां से सड़क मार्ग से लवासा पहुंचा जा सकता है।
यूं तो लवासा साल भर घूमने और आराम फरमाने के लिए बेहतरीन ठिकाना है, फिर भी मई से अक्तूबर और दिसंबर से फरवरी के महीने सबसे अच्छे माने जाते हैं। झमाझम मॉनसून के दौरान लवासा की खूबसूरती अपने चरम पर होती है। मुंबई और पुणे के लोग अमूमन साप्ताहांत पर सुकून के लिए लवासा का रुख करते हैं।

